Bharat Devotion
Embroidered artwork for धर्मशान्तिपथः: Embroidered Jain ahimsa palm with a gold wheel, white marble temples and lotuses at dawn

धर्मशान्तिपथः

धर्मशान्तिपथः

इदं हिन्दीभाषया रचितं भक्तिगीतम् अस्ति यत् श्रोतारं सद्गुणकरुणान्तःशान्तियुक्तजीवनं प्रति मार्गदर्शयति। यत् शिक्षयति यथा स्वार्थकामनाः परिहर्तव्याः, सर्वेषु प्राणिषु दयाव्यवहारः कर्तव्यः, सुखदुःखयोः स्थैर्यं धार्यम्, अहिंसासत्यमार्गः अनुसर्तव्यः इति।

पद्यानि

जिसने राग द्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया सब जीवों को मोक्षमार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो१
Jisne Raag Dvesh Kaamaadik Jeete Sab Jag Jaan Liya. Sab Jeevon Ko Mokshamaarg Ka Nisprih Ho Updesh Diya. Buddh, Veer, Jin, Hari, Har, Brahma, Ya Usko Svaadheen Kaho. Bhakti-Bhav Se Prerit Ho Yeh Chitt Usi Mein Leen Raho.

श्लोकः 1

विषयों की आशा नहिं जिनके साम्य-भाव धन रखते हैं निज-परके हित-साधन में जो निश-दिन तत्पर रहते हैं स्वार्थ-त्याग की कठिन तपस्या बिना खेद जो करते हैं ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुःख समूह को हरते हैं२
Vishyon Ki Aasha Nahin Jinke Saamya-Bhav Dhan Rakhte Hain. Nij-Parke Hit-Saadhan Mein Jo Nish-Din Tatpar Rahte Hain. Svaarth-Tyaag Ki Kathin Tapsya Bina Khed Jo Karte Hain. Aise Gyani Saadhu Jagat Ke Dukh Samooh Ko Harte Hain.

श्लोकः 2

रहे सदा सत्संग उन्हीं का ध्यान उन्हीं का नित्य रहे उन्हीं जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे नहीं सताऊँ किसी जीव को झूठ कभी नहिं कहा करूँ परधन-वनिता पर न लुभाऊँ, संतोषामृत पिया करूँ३
Rahe Sada Satsang Unheen Ka Dhyan Unheen Ka Nitya Rahe. Unheen Jaisi Charya Mein Yeh Chitt Sada Anurakt Rahe. Nahin Sataoon Kisi Jeev Ko Jhooth Kabhi Nahin Kaha Karoon. Pardhan-Vanita Par Na Lubhaoon, Santoshaamrit Piya Karoon.

श्लोकः 3

अहंकार का भाव न रक्खूँ नहीं किसी पर क्रोध करूँ देख दूसरों की बढ़ती को कभी न ईर्ष्या-भाव धरूँ रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य-व्यवहार करूँ बने जहाँ तक इस जीवन में औरों का उपकार करूँ४
Ahankaar Ka Bhav Na Rakhoon Nahin Kisi Par Krodh Karoon. Dekh Doosron Ki Badhti Ko Kabhi Na Eershya-Bhav Dharoon. Rahe Bhavna Aisi Meri, Saral-Satya-Vyavhaar Karoon. Bane Jahaan Tak Is Jeevan Mein Auron Ka Upkaar Karoon.

श्लोकः 4

मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों पर नित्य रहे दीन-दुःखी जीवों पर मेरे उर से करुणा-स्रोत बहे दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग-रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे साम्यभाव रक्खूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे५
Maitreebhav Jagat Mein Mera Sab Jeevon Par Nitya Rahe. Deen-Dukhi Jeevon Par Mere Ur Se Karuna-Srot Bahe. Durjan-Kroor-Kumaarg-Raton Par Kshobh Nahin Mujhko Aave. Saamyabhav Rakhoon Main Un Par, Aisi Parinati Ho Jaave.

श्लोकः 5

गुणी जनों को देख हृदय में मेरे प्रेम उमड़ आवे बने जहाँ तक उनकी सेवा करके यह मन सुख पावे होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं द्रोह न मेरे उर आवे गुण-ग्रहण का भाव रहे नित दृष्टि न दोषों पर जावे६
Guni Janon Ko Dekh Hriday Mein Mere Prem Umad Aave. Bane Jahaan Tak Unki Seva Karke Yeh Man Sukh Paave. Hooon Nahin Kritaghn Kabhi Main Droh Na Mere Ur Aave. Gun-Grahan Ka Bhav Rahe Nit Drishti Na Doshon Par Jaave.

श्लोकः 6

कोई बुरा कहो या अच्छा लक्ष्मी आवे या जावे लाखों वर्षों तक जीऊँ या मृत्यु आज ही आ जावे अथवा कोई कैसा भी भय या लालच देने आवे तो भी न्याय-मार्ग से मेरा कभी न पग डिगने पावे७
Koi Bura Kaho Ya Achha Lakshmi Aave Ya Jaave. Laakhon Varshon Tak Jeeoon Ya Mrityu Aaj Hi Aa Jaave. Athva Koi Kaisa Bhi Bhay Ya Laalach Dene Aave. To Bhi Nyaay-Maarg Se Mera Kabhi Na Pag Digne Paave.

श्लोकः 7

होकर सुख में मग्न न फूले दुख में कभी न घबरावे पर्वत-नदी-श्मशान भयानक अटवी से नहीं भय खावे रहे अडोल-अकम्प निरंतर यह मन दृढ़तर बन जावे इष्ट-वियोग-अनिष्ट-योग में सहन-शीलता दिखलावे८
Hokar Sukh Mein Magn Na Phoole Dukh Mein Kabhi Na Ghabraave. Parvat-Nadi-Shmashaan Bhayaanak Atvi Se Nahin Bhay Khaave. Rahe Adol-Akamp Nirantar Yeh Man Dridhtar Ban Jaave. Isht-Viyog-Anisht-Yog Mein Sahan-Sheelta Dikhlaave.

श्लोकः 8

सुखी रहें सब जीव जगत के कोई कभी न घबरावे बैर-पाप अभिमान छोड़ जग नित्य नये मंगल गावें घर-घर चर्चा रहे धर्म की दुष्कृत दुष्कर हो जावे ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना मनुज-जन्म-फल सब पावें९
Sukhi Rahein Sab Jeev Jagat Ke Koi Kabhi Na Ghabraave. Bair-Paap Abhimaan Chhod Jag Nitya Naye Mangal Gaavein. Ghar-Ghar Charcha Rahe Dharm Ki Dushkrit Dushkar Ho Jaave. Gyan-Charit Unnat Kar Apna Manuj-Janm-Phal Sab Paavein.

श्लोकः 9

ईति भीति व्यापे नहिं जग में वृष्टि समय पर हुआ करे धर्मनिष्ठ होकर राजा भी न्याय प्रजा का किया करे रोग मरी दुर्भिक्ष न फैले प्रजा शांति से जिया करे परम अहिंसा-धर्म जगत में फैल सर्व हित किया करे१०
Eeti Bheeti Vyaape Nahin Jag Mein Vrishti Samay Par Hua Kare. Dharmnishth Hokar Raaja Bhi Nyaay Praja Ka Kiya Kare. Rog Mari Durbhiksh Na Faile Praja Shaanti Se Jiya Kare. Param Ahinsa-Dharm Jagat Mein Fail Sarv Hit Kiya Kare.

श्लोकः 10

फैले प्रेम परस्पर जग में मोह दूर ही रहा करे अप्रिय कटुक कठोर शब्द नहिं कोई मुख से कहा करे बनकर सब ‘युगवीर’ हृदय से, देशोन्नति-रत रहा करें वस्तु-स्वरूप-विचार खुशी से, सब दुख संकट सहा करें११
Faile Prem Paraspar Jag Mein Moh Door Hi Raha Kare. Apriya Katuk Kathor Shabd Nahin Koi Mukh Se Kaha Kare. Bankar Sab 'Yugveer' Hriday Se, Deshonnati-Rat Raha Karein. Vastu-Svaroop-Vichaar Khushi Se, Sab Dukh Sankat Saha Karein.

श्लोकः 11

Worship Guidelines & Chanting Benefits (Phalashruti)

Auspicious Day

प्रतिदिनं अथवा शुभतिथौ

Best Time (Muhurta)

ब्राह्मे मुहूर्ते सन्ध्याकाले च

Sacred Offerings

घृतदीपः, धूपः, शुद्धपुष्पं, जलं च

Spiritual Benefits (Phalashruti)
  • मानसिकशान्तिः, आत्मोन्नतिः, मङ्गलमयवातावरणम्

पृष्ठभूमिः

इदं दिगम्बरजैनपरम्परायाः हिन्दीभक्तिगीतम् (भजनम्) अस्ति, यत् प्रार्थनायां ध्याने वा प्रायः गीयते। अहिंसा, समत्वम्, सर्वप्राणिदया इत्यादीन् जैनमूल्यान् प्रतिबिम्बयति। शान्तसद्गुणमनस्कतां पोषयितुं पारम्परिकतया श्लोकाः पठ्यन्ते, नैतिकजीवनाध्यात्मिकप्रगतिं प्राधान्येन निर्दिशति विस्तृतजैनभक्तिसाहित्यस्य अंशाः एते।

अस्य पाठस्य विषये

रचयिता: Jugal Kishore Mukhtar 'Yugvir'

ज्ञातव्य-विशेषः

सार्वभौमिक मुनिः

प्रथमश्लोके जानपूर्वकं बुद्धवीरजिनहरिहरब्रह्मणः नामानि उल्लिख्यन्ते – यानि बौद्धजैनहैन्द्रपरम्पराः व्याप्नुवन्ति – इदं दर्शयितुं यत् आदर्शमुनिः कस्यापि एकस्य सम्प्रदायस्यातीतः अस्ति; भक्तः तस्मिन् सार्वभौमिके आदर्शे मनः स्थिरं कर्तुं प्रेर्यते।

जैनसम्बन्धः

श्लोकेषु अहिंसा, साम्यभावः, परधनपरदारानभिलाषः इति बलदानं जैननैतिकोपदेशान् स्फुटं प्रतिबिम्बयति, प्रथमश्लोके 'जिन' (जेतृ) इति पदं प्रत्यक्षं जैनपरम्परायाः स्वप्रबुद्धगुरूणां नाम्नि निर्दिशति।

वैयक्तिकव्रतम्

श्लोकाः ३–६ वैयक्तिकं आचारसंहितां निर्मान्ति – न कदापि मिथ्या वदेत्, न कदापि हिंसां कुर्यात्, न परसमृद्धेः ईर्ष्येत्, सदा सद्गुणिनः सेवेत – अमूर्तं दर्शनं सामान्यगृहस्थाय व्यावहारिकं दैनन्दिनं शासनं परिणमयन्ति।

सर्वावस्थासु स्थैर्यम्

श्लोकः ७ नाटकीयं प्रतिज्ञां करोति – यदि स्तुतिर्वा निन्दा, सम्पद्वा दारिद्र्यम्, लक्षवर्षाणि जीवनं वा अद्य मृत्युः, भयं वा मोहः सम्भवेत्, तथापि भक्तः धर्ममार्गात् न कदापि चलिष्यति इति प्रतिजानाति।

आदर्शलोकः

अन्तिमश्लोकाः काल्पनिकं दृश्यं चित्रयन्ति – समये वर्षणम्, न्यायी राजा, रोगदुर्भिक्षाभावः, सार्वभौमं प्रेम, राष्ट्रोन्नतये कार्यरतानां 'युगवीराणां' राष्ट्रम् – इति दर्शयन्ति यत् वैयक्तिकभक्तिः स्वाभाविकतया सामाजिकराष्ट्रियकल्याणं प्रति विस्त्रियते।

कर्तृहस्ताक्षरम्

अन्तिमश्लोके 'युगवीर' इति नाम कवि-सन्तस्य युगलकिशोरबिर्ला (१८८३–१९६७) इत्यस्य छद्मनाम, यः प्रसिद्धः भारतीयः उद्योगपतिः परोपकारी च आसीत्, यः अनेन नाम्ना भक्तिकाव्यम् अलिखत्, आध्यात्मिकादर्शान् भारतप्रगतेः दर्शनेन संयोज्य।

Mahavira सम्पूर्णा स्तुतिः पाठाश्च

Mahavira

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जैनधर्मःतः अधिकम्

सर्वं पश्यत