शालिवक्त्रपुरालय धन्वन्तरि स्तोत्रम्
बारह श्लोकों का धन्वन्तरि स्तोत्र, जिसमें दिव्य वैद्य हरि से रोग और कष्ट से पीड़ितों की रक्षा की प्रार्थना है।
श्लोक
यह शालिवक्त्रपुरालय धन्वन्तरि स्तोत्र है। हे भिषग्वर, हे रमाकान्त, हे शालिवक्त्रपुर के स्वामी, मुझे जो राग और रोग आदि से ग्रस्त हूँ, रक्षा करो, हे धन्वन्तरि, हे हरे।
श्लोक 1
हे शङ्ख, चक्र, अमृत-कुम्भ और जलौका धारण करने वाले माधव, हे करुणा के सागर, मेरी शीघ्र रक्षा करो, हे धन्वन्तरि, हे हरे।
श्लोक 2
हे सबके आधार गोविन्द, हे सब पीड़ाओं को दूर करने वाले, हे महाविष्णु, मुझ व्याकुल को रक्षा करो, हे धन्वन्तरि, हे हरे।
श्लोक 3
हे श्याम वर्ण वाले, हे सदा आनन्दमय, हे शालितुण्डपुर के ईश्वर, हे विश्वबन्धु, मुझ विपन्न को रक्षा करो, हे धन्वन्तरि, हे हरे।
श्लोक 4
हे जनार्दन, हे जगन्नाथ, हे कमल-नेत्र, हे ज्वर को हरने वाले, हे प्रणतों पर दयालु, मुझ शरणागत को रक्षा करो, हे धन्वन्तरि, हे हरे।
श्लोक 5
हे सनातन, हे गुणों के निवास, हे सब रोगों के समूह का अन्त करने वाले, हे कृपा के सागर, मुझ रुजा से पीड़ित को रक्षा करो, हे धन्वन्तरि, हे हरे।
श्लोक 6
हे शान्त, हे शालिमुखागार के स्वामी, हे शरद चन्द्रमा के समान मुख वाले, हे सुख के सागर, मुझ निःस्व को रक्षा करो, हे धन्वन्तरि, हे हरे।
श्लोक 7
हे अमृत पान करने वालों के स्वामी, हे विश्व के क्लेशों का नाश करने वाले, हे केशव, हे हाथ में अमृत धारण करने वाले, मुझ संतप्त को रक्षा करो, हे धन्वन्तरि, हे हरे।
श्लोक 8
हे वासुदेव, हे हृषीकेश, हे व्याधियों के समूह का नाश करने वाले, हे वनमाली, मुझ दीन को रक्षा करो, हे धन्वन्तरि, हे हरे।
श्लोक 9
हे नारायण, हे दया के सागर, हे शालिमुखालय के नाथ, हे पद्मनाभ, हे मुरारे, मेरी रक्षा करो, हे धन्वन्तरि, हे हरे।
श्लोक 10
हे रोगों से पीड़ितों को अभय देने वाले, हे सौजन्य के समुद्र, हे वैद्यराज के स्वरूप, हे कल्याण के भण्डार, हे लक्ष्मी के पति, मेरी रक्षा करो, हे धन्वन्तरि, हे हरे, हे मुरारे।
श्लोक 11
हे क्षीरसागर के नाथ, हे शङ्ख, चक्र, अमृत और जलौका धारण करने वाले, हे दया से आर्द्र, हे शालिमुखालय के ईश, हे सब रोगों को हरने वाले, हे भिषग्वर, निरन्तर मेरी रक्षा करो, हे धन्वन्तरि, हे हरे, हे मुरारे।
श्लोक 12
इस प्रकार शालिवक्त्रपुरालय धन्वन्तरि स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।
श्लोक 13
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र विष्णु के अवतार, दिव्य वैद्य धन्वन्तरि की स्तुति और प्रार्थना है, जो रोग-निवारण, आरोग्य और कष्ट-मुक्ति के लिए पढ़ा जाता है। शीर्षक में उन्हें 'शालिवक्त्रपुरालय' (शालिवक्त्रपुर-निवासी) कहा गया है; पाठ में यह स्थान शालितुण्डपुर और शालिमुख नाम से भी आता है, पर स्रोत यह नहीं बताता कि कौन-सा मन्दिर अभिप्रेत है, इसलिए यहाँ कोई स्थान निश्चित नहीं किया गया। रचयिता का नाम नहीं मिलता। स्थान-निर्देश: संस्कृत डॉक्यूमेंट्स का पाठ 'धन्वन्तरि स्तोत्र ४', बारह श्लोक। भक्त इसे धन्वन्तरि जयन्ती पर या बीमारी में शंख, चक्र, अमृत-कुम्भ और जलौका धारण करने वाले करुणामय वैद्य से प्रार्थना के रूप में पढ़ते हैं।
क्या आप जानते हैं?
स्तोत्र का नाम और स्थान
यह स्तोत्र 'शालिवक्त्रपुरालय धन्वन्तरि स्तोत्रम्' कहलाता है, अर्थात् शालिवक्त्रपुर-निवासी धन्वन्तरि की स्तुति। पाठ में शालितुण्डपुर और शालिमुख रूप भी आते हैं, पर वह किसी मन्दिर की पहचान नहीं कराता, इसलिए यहाँ स्थान निश्चित नहीं किया गया।
धन्वन्तरि का स्वरूप
धन्वन्तरि को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। स्तोत्र में उन्हें शंख, चक्र, सुधाकुम्भ (अमृत का घड़ा) और जलुका (जोंक) धारण करते हुए वर्णित किया गया है – जोंक प्राचीन आयुर्वेदिक रक्तमोक्षण चिकित्सा का प्रतीक है। उन्हें 'भिषग्वर' (श्रेष्ठ वैद्य) और 'रमाकान्त' (लक्ष्मीपति) भी कहा गया है।
स्तोत्र की संरचना
बारह श्लोक प्रायः एक ही ढर्रे पर हैं: कई विशेषणों से धन्वन्तरि का आह्वान, भक्त की व्यथा का उल्लेख (जैसे 'रागरोगादिभूतम्', 'व्याकुलम्', 'विपन्नम्') और अन्त में 'पाहि धन्वन्तरे हरे' की टेक। पहले दस श्लोक अनुष्टुप् छन्द में हैं; ११वाँ और १२वाँ लम्बे छन्दों में।
रोगों से मुक्ति की प्रार्थना
स्तोत्र में विशेष रूप से शारीरिक रोगों (ज्वर, व्याधि, सर्वामय) और मानसिक क्लेशों (राग, आर्ति) से मुक्ति माँगी गई है। भक्त स्वयं को 'विपन्न', 'व्याकुल', 'रुजार्त' और 'निःस्व' बताते हुए धन्वन्तरि से करुणा और आश्रय की प्रार्थना करता है।
चिकित्सा और आध्यात्मिकता का समन्वय
धन्वन्तरि को केवल शारीरिक रोगों का ही नहीं, बल्कि आसक्ति (राग) जैसे आध्यात्मिक रोगों का भी नाशक माना गया है। स्तोत्र में 'रागरोग' शब्द से यह संकेत मिलता है कि वे समस्त प्रकार के दुःखों – शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक – से मुक्ति दिलाने वाले हैं। यह आयुर्वेद और भक्ति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
Vishnu
हिन्दू धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
