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विष्णु सहस्रनाम — ध्यान श्लोक

विष्णु सहस्रनाम — ध्यान श्लोक

विष्णु सहस्रनाम का आरंभिक ध्यान-श्लोक: श्वेत वस्त्रधारी, चतुर्भुज, प्रसन्नमुख विष्णु का ध्यान, सब विघ्नों की शांति के लिए।

श्लोक

ध्यानम् एवं मंगलाचरण

१०८ नामों के पाठ से पूर्व देव स्वरूप का पावन ध्यान एवं बीज मन्त्र।

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये
Shuklambara Dharam Vishnum Shashi Varnam Chaturbhujam Prasanna Vadanam Dhyayet Sarva Vighnopa Shantaye

सहस्रनाम स्तोत्रम् (एक सहस्र दिव्य नाम)

सर्वोच्च परब्रह्म परमात्मा के एक सहस्र दिव्य नामों से अलंकृत पावन स्तोत्र।

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

विष्णु सहस्रनाम, विष्णु के सहस्र नाम, महाभारत के अनुशासन पर्व (अध्याय 149) में भीष्म युधिष्ठिर को सिखाते हैं। मुद्रित संस्करणों में इसके पहले पूर्वपीठिका के श्लोक दिए जाते हैं, जिनका आरंभ इसी ध्यान-श्लोक से होता है; इनका प्रार्थना रूप में पाठ होता है, पर ये पाठ-परंपरा के जोड़े हुए श्लोक हैं, भीष्म के उपदेश का भाग नहीं। यह श्लोक अलग से और गणेश पूजा में भी पढ़ा जाता है, और इसके रचयिता अज्ञात हैं।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Maharishi Vedavyasa · प्राचीन वैदिक ऋषि · पौराणिक प्राचीन काल

परंपरागत रूप से चारों वेदों के संकलनकर्ता तथा महाभारत (जिसके अंतर्गत भगवद्गीता आती है) एवं पुराणों के रचयिता माने जाते हैं — जिससे वे संपूर्ण हिंदू ग्रंथ-परंपरा में सर्वाधिक उद्धृत रचनाकारों में से एक हैं, जो दर्शन, महाकाव्य कथा, एवं भक्ति साहित्य तक विस्तृत है।

क्या आप जानते हैं?

स्थान

स्तोत्र निधि के सहस्रनाम पाठ में यह श्लोक पूर्वपीठिका का श्लोक 1 है, जो सहस्र नाम शुरू होने से पहले पढ़ा जाता है।

अर्थ

साधक को श्वेत वस्त्र (शुक्लाम्बरधरम्), चन्द्र जैसे वर्ण (शशिवर्णम्), चार भुजाओं (चतुर्भुजम्) और प्रसन्न मुख (प्रसन्नवदनम्) वाले विष्णु का ध्यान करने को कहा गया है, सब विघ्नों की शांति के लिए (सर्वविघ्नोपशान्तये)।

आगे के श्लोक

इसी पूर्वपीठिका का श्लोक 2 विष्वक्सेन की शरण लेता है, जिनके गणों में गजमुख आदि सदा विघ्न दूर करते हैं। श्लोक 3 और 4 व्यास जी को नमन करते हैं। यह समूह पाठक को नामों से पहले तैयार करता है।

प्रतीक

श्वेत वस्त्र और चन्द्र जैसा वर्ण पवित्रता तथा शांति के सूचक हैं। चार भुजाओं में परंपरा के अनुसार शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं।

छंद

यह बत्तीस अक्षरों का श्लोक है जिसकी चार पंक्तियों में आठ-आठ अक्षर हैं, अनुष्टुप् छंद, जिसमें महाभारत का अधिकांश भाग रचा गया है।

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