शुक्लाम्बरधरं विष्णुं ध्यान श्लोक
श्वेत वस्त्रधारी, चन्द्रवर्ण, चतुर्भुज, प्रसन्नमुख प्रभु का ध्यान-श्लोक, जो पूजा या अध्ययन से पहले सब विघ्न शांत करने के लिए पढ़ा जाता है।
श्लोक
श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चंद्रमा के समान श्वेत वर्ण वाले, चार भुजाओं वाले, प्रसन्न मुख वाले भगवान विष्णु का ध्यान करें, सभी विघ्नों के शांत होने के लिए।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
शुक्लाम्बरधरं पूजा, अध्ययन और नए कार्य के आरंभ में पढ़ा जाता है, और कई घरों में यह गणेश-प्रार्थनाओं में सबसे पहले आता है क्योंकि यह सब विघ्नों की शांति माँगता है। यह विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र की पूर्वपीठिका के श्लोक 1 के रूप में भी छपा मिलता है, जिसे महाभारत के अनुशासन पर्व (अध्याय 149) में भीष्म सिखाते हैं; ये पूर्वपीठिका के श्लोक पाठ-परंपरा में जुड़े हैं, भीष्म के उपदेश का भाग नहीं। इसके रचयिता अज्ञात हैं और कोई एक शास्त्रीय स्रोत प्रमाणित नहीं हुआ।
क्या आप जानते हैं?
दो परंपराएँ
यही श्लोक स्तोत्र निधि के सामान्य गणेश श्लोकों में सबसे पहले आता है और विष्णु सहस्रनाम की पूर्वपीठिका में भी है। यहाँ इसे विघ्न-निवारण का सामान्य आवाहन माना गया है।
विशेषण
शुक्लाम्बरधरम् यानी श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, शशिवर्णम् यानी चन्द्र जैसे वर्ण वाले, चतुर्भुजम् यानी चार भुजाओं वाले और प्रसन्नवदनम् यानी प्रसन्न मुख वाले। श्वेत रंग और चाँदनी पवित्रता तथा शीतल शांति का संकेत हैं।
'विष्णुं' क्यों?
विष्णु शब्द 'विष्' धातु से है, जिसका अर्थ है व्याप्त होना। इस अर्थ में श्लोक सर्वव्यापी प्रभु को संबोधित करता है और हर परंपरा इस श्वेतवस्त्र रूप में अपने इष्ट को देखती है, गणेश जी को भी।
शांति की प्रार्थना
'सर्वविघ्नोपशान्तये' यानी सब विघ्नों की शांति के लिए, इसका उद्देश्य बताता है: कोई वरदान नहीं, बल्कि आरंभ से पहले शांत मन और साफ़ मार्ग।
स्रोत अनिश्चित
लोकप्रिय लेखन में इस श्लोक के लिए कई पुराणों के नाम लिए जाते हैं, पर किसी की पुष्टि नहीं हो सकी, इसलिए यहाँ कोई मूल स्रोत नहीं बताया गया।
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