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Embroidered artwork for उच्छिष्टगणपति उच्छिष्टचाण्डालिन्युपासना पञ्चाङ्ग: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

उच्छिष्टगणपति उच्छिष्टचाण्डालिन्युपासना पञ्चाङ्ग

उच्छिष्टगणपति उच्छिष्टचाण्डालिन्युपासना पञ्चाङ्ग

उच्छिष्टगणपति पञ्चाङ्ग का आरम्भ: इसकी अनुक्रमणिका और उच्छिष्टगणपति का नवार्ण मन्त्र।

श्लोक

अनुक्रमणिका अङ्गः विषयाः उच्छिष्टगणपत्युपासना १ उच्छिष्टगणपतिपटलम् १.१ उच्छिष्टगणपतिनवार्णमन्त्रप्रयोगः १.२ उच्छिष्टगणपतिनवार्णयन्त्रम् १.३ रुद्रयामलतन्त्रे प्रयोगविशेषः १.४ द्वादशाक्षरोच्छिष्टगणेशमन्त्रप्रयोगः १.५ एकोनविंशत्यक्षरोच्छिष्टगणेशमन्त्रप्रयोगः १.६ सप्तत्रिंशदक्षरोच्छिष्टगणेशमन्त्रप्रयोगः १.७ प्रकारान्तरेणैकाधिकचत्वारिंशदक्षरभेदो रुद्रयामले १.८ मन्त्रमहोदधौ द्वात्रिंशदक्षरमन्त्रभेदः १.९ एकत्रिंशदक्षरमन्त्रभेदः २ श्रीमदुच्छिष्टगणपतिपूजापद्धतिः ३ श्रीमदुच्छिष्टगणपतिकवचम् ४ श्रीमदुच्छिष्टगणपतिसहस्रनामस्तोत्रम् ५ श्रीमदुच्छिष्टगणपतिस्तवराजः श्रीमदुच्छिष्टचाण्डालिन्युपासना उच्छिष्टचाण्डालिनीमन्त्राः उच्छिष्टचाण्डालिनीचेटकम् समाप्तेयमनुक्रमणिका श्रीगणेशाय नमः
anukramanikaa angah vishayaah ucchishtaganapatyupaasanaa 1 ucchishtaganapatipatalam 1.1 ucchishtaganapatinavaarnamantraprayogah 1.2 ucchishtaganapatinavaarnayantram 1.3 rudrayaamalatantre prayogavisheshah 1.4 dvaadashaaksharocchishtaganeshamantraprayogah 1.5 ekonavimshatyaksharocchishtaganeshamantraprayogah 1.6 saptatrimshadaksharocchishtaganeshamantraprayogah 1.7 prakaaraantarenaikaadhikacatvaarimshadaksharabhedo rudrayaamale 1.8 mantramahodadhau dvaatrimshadaksharamantrabhedah 1.9 ekatrimshadaksharamantrabhedah 2 shreemaducchishtaganapatipoojaapaddhatih 3 shreemaducchishtaganapatikavacam 4 shreemaducchishtaganapatisahasranaamastotram 5 shreemaducchishtaganapatistavaraajah shreemaducchishtacaandaalinyupaasanaa ucchishtacaandaalineemantraah ucchishtacaandaalineecetakam samaapteyamanukramanikaa shreeganeshaaya namah | 1 |

श्लोक 1

अथ श्रीमदुच्छिष्टगणपति पञ्चरत्नप्रारम्भः १. उच्छिष्टगणपतिपटलम् तत्रादौ श्रीमदुच्छिष्टगणपतिपटलं प्रारभ्यते श्रीमहादेव उवाच हस्तिपदं समुच्चार्य पिशाचीतिपदं ततः देवराजं सनेत्रं च कान्तमीशस्वरान्वितम् वह्निजायावधिर्मन्त्रस्ताराद्यः सर्वकामदः प्रणवस्थाने गमिति केचित्
atha shreemaducchishtaganapati pancaratnapraarambhah 1. ucchishtaganapatipatalam tatraadau shreemaducchishtaganapatipatalam praarabhyate shreemahaadeva uvaaca hastipadam samuccaarya pishaaceetipadam tatah devaraajam sanetram ca kaantameeshasvaraanvitam vahnijaayaavadhirmantrastaaraadyah sarvakaamadah pranavasthaane gamiti kecit | 2 |

श्लोक 2

१.१ उच्छिष्टगणपतिनवार्णमन्त्रप्रयोगः मन्त्रो यथा हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा इति नवार्णमन्त्रः
1.1 ucchishtaganapatinavaarnamantraprayogah mantro yathaa hasti pishaaci likhe svaahaa iti navaarnamantrah | 3 |

श्लोक 3

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

पञ्चाङ्ग का अर्थ है पाँच अंगों वाला ग्रन्थ। यह ग्रन्थ गणेश के तान्त्रिक रूप उच्छिष्टगणपति की उपासना के पाँच भाग एक साथ रखता है: मन्त्रों का पटल, पूजापद्धति, कवच, सहस्रनाम और स्तवराज। अन्त के कुछ खण्ड देवी उच्छिष्टचाण्डालिनी की उपासना की ओर जाते हैं। यह पृष्ठ संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के संस्करण का आरम्भ प्रस्तुत करता है: अनुक्रमणिका, पटल की प्रारम्भिक पंक्तियाँ और नवार्ण मन्त्र, जिसे ग्रन्थ ने मन्त्रमहोदधि से लिया हुआ चिह्नित किया है। अनुक्रमणिका में रुद्रयामल तन्त्र के भेदों की ओर भी संकेत है, जैसे खण्ड १.४ से १.७ में १२, १९, ३७ और ४१ अक्षरों के मन्त्र। ऐसे मन्त्र परम्परा में गुरु से सीखे जाते हैं, और यह पृष्ठ पाठ को अध्ययन और श्रद्धापूर्वक पठन के लिए प्रस्तुत करता है।

क्या आप जानते हैं?

पाँच अंग और एक देवी

अनुक्रमणिका में पटल (खण्ड १, उपखण्ड १.१ से १.९), पूजापद्धति (२), कवच (३), सहस्रनाम (४) और स्तवराज (५) हैं। उसके बाद उच्छिष्टचाण्डालिनी की उपासना, उनके मन्त्र और चेटक नामक खण्ड जोड़े गए हैं।

पहेली में कहा गया मन्त्र

पटल का आरम्भ महादेव के कथन से होता है। वे मन्त्र को सांकेतिक रूप में बताते हैं: 'हस्ति' पद बोलें, फिर 'पिशाचि', फिर देवराज और कान्त संज्ञाओं से सूचित अक्षर, श्लोक में कहे स्वरों के साथ, और अन्त में स्वाहा। अगला खण्ड मन्त्र को स्पष्ट रूप से देता है। श्लोक इसे सब कामनाएँ देने वाला कहता है, और जोड़ता है कि कुछ लोग आरम्भ के ॐ के स्थान पर 'गं' रखते हैं।

नौ अक्षर

खण्ड १.१ में मन्त्र 'हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा' दिया गया है और उसे नवार्ण, अर्थात् नौ अक्षरों का मन्त्र, कहा गया है। ये अक्षर हैं: ह, स्ति, पि, शा, चि, लि, खे, स्वा, हा।

ऋषि, छन्द और देवता

पूर्ण पाठ में इस नवार्ण मन्त्र के ऋषि कङ्कोल, छन्द विराट् और देवता उच्छिष्टगणपति हैं। आगे का न्यास इसके पदों को अंगुलियों पर रखता है: हस्ति अंगूठों पर, पिशाचि तर्जनियों पर, लिखे मध्यमाओं पर और स्वाहा अनामिकाओं पर।

ध्यान का चित्र

ध्यान श्लोक उन्हें चार भुजाओं वाले, रक्तवर्ण और त्रिनेत्र रूप में दिखाता है, जो पाश, अंकुश, मोदक का पात्र और अपना दन्त धारण किए, कमल पर विराजमान और आनन्द में मतवाले हैं। 'उच्छिष्ट' शब्द का अर्थ ही बचा हुआ है।

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