उच्छिष्ट गणपति पूजा पद्धति
उच्छिष्टगणपति की उपासना की तान्त्रिक पद्धति का आरम्भ: पूर्वकृत्य, प्रायश्चित्त और पंचगव्य-शुद्धि का श्लोक।
श्लोक
श्रीगणेशाय नमः। अब श्रीमदुच्छिष्टगणपतिपूजापद्धति (प्रारंभ होती है)। उसमें सबसे पहले पूर्वकृत्य (प्रारंभिक कार्य)।
श्लोक 1
पुरश्चरण से तीन दिन पूर्व मुंडन (क्षौर आदि) कराकर प्रायश्चित्त के रूप में विष्णु पूजा, विष्णु तर्पण, विष्णु श्राद्ध, होम और चान्द्रायण आदि व्रत करने चाहिए। यदि व्रत में असमर्थ हों तो गोदान या द्रव्यदान करें। यदि सभी कर्मों में असमर्थ हों, तो प्रायश्चित्त स्वरूप पंचगव्य का प्राशन करना चाहिए। उसका मंत्र इस प्रकार है:
श्लोक 2
मेरे शरीर की त्वचा और अस्थियों में जो भी पाप व अशुद्धियाँ स्थित हैं, वे पंचगव्य के प्राशन से उसी प्रकार भस्म हो जाएँ जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है।
श्लोक 3
इस पावन मंत्र का पाठ करके प्रणव (ॐ) का उच्चारण करते हुए पंचगव्य का पान करना चाहिए।
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
पद्धति का अर्थ है पूजा की क्रमबद्ध विधि-पुस्तिका। यह पद्धति गणेश के रूप उच्छिष्टगणपति की तान्त्रिक परम्परा की है, और इसका आरम्भ 'पूर्वकृत्य' से होता है, अर्थात् उन प्रारम्भिक कर्मों से जो मुख्य साधना पुरश्चरण, यानी मन्त्र के दीर्घ जप-क्रम, से पहले किए जाते हैं। इस पृष्ठ का पाठ संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के संस्करण का पहला भाग है। उसमें साधक को क्षौर कराकर प्रायश्चित्त के रूप में विष्णुपूजा, विष्णुतर्पण, विष्णुश्राद्ध और होम करने का निर्देश है, साथ में चान्द्रायण जैसे व्रत भी। जो यह न कर सकें, उनके लिए गोदान या द्रव्यदान की अनुमति है, और जो कुछ भी न कर सकें, उनके लिए सबसे सरल प्रायश्चित्त है: शुद्धि के श्लोक के साथ पंचगव्य, अर्थात् गाय के पाँच उत्पादों, का प्राशन। आगे की पद्धति में उपवास का एक दिन, दस हज़ार गायत्री-जप और शिव से मार्गदर्शक स्वप्न की प्रार्थना है। ऐसे अनुष्ठान परम्परा में गुरु के निर्देशन में अपनाए जाते हैं।
क्या आप जानते हैं?
साधना से पहले की तैयारी
पहले श्लोकों में नियम है कि पुरश्चरण आरम्भ होने से तीन दिन पहले साधक प्रारम्भिक कर्म पूरे कर ले। इनमें क्षौर, विष्णुपूजा, विष्णुतर्पण, विष्णुश्राद्ध, होम और चान्द्रायण व्रत गिनाए गए हैं।
सीढ़ी जैसा प्रायश्चित्त
पाठ कई विकल्प देता है। व्रत सम्भव न हो तो गोदान या द्रव्यदान, और इनमें से कुछ भी सम्भव न हो तो पंचगव्य का पान। नियम साधक की सामर्थ्य के अनुसार झुकता है।
पंचगव्य
इस शब्द का अर्थ है गाय के पाँच उत्पाद: दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर। इस पाठ में यह शुद्धि का अनुष्ठान है, भोजन नहीं। साधक श्लोक पढ़कर ॐ का उच्चारण करते हुए इसे पीता है।
शुद्धि का श्लोक
श्लोक ३ प्रार्थना करता है कि शरीर में, त्वचा और अस्थि तक, जो भी दोष स्थित है, वह पंचगव्य के प्राशन से वैसे ही जल जाए जैसे अग्नि ईंधन को जलाती है। यह अन्तःशुद्धि की प्रार्थना है।
स्रोत में आगे क्या है
इस खण्ड के बाद संस्कृत डॉक्यूमेंट्स का पाठ पूर्व दिन के उपवास, दस हज़ार गायत्री-जप, ऋषि विश्वामित्र, गायत्री छन्द और देव सविता को जल-तर्पण, तथा शिव से १०८ बार की प्रार्थना की ओर बढ़ता है कि स्वप्न में बताएँ कि साधना सफल होगी या नहीं।
Ganesh
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