सब कुछ नारायण को समर्पित करने की प्रार्थना
यह एक संस्कृत प्रार्थना है जिसमें भक्त अपने सभी कर्मों—शरीर, वाणी, मन, इंद्रियाँ, बुद्धि और स्वभाव से किए गए हर काम—को भगवान नारायण को समर्पित करता है।
श्लोक
शरीर, वाणी, मन, इन्द्रियों, बुद्धि और प्रकृति के स्वभाव से जो कुछ भी मैं करता हूँ, वह सब परम पुरुष नारायण को समर्पित करता हूँ।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह श्लोक भारतीय वैष्णव परंपरा का एक महत्वपूर्ण प्रार्थना-भाग है, जिसे अक्सर पूजा या ध्यान के अंत में बोला जाता है। इसका प्रयोग भक्तों द्वारा अपने सभी कार्यों को ईश्वर को अर्पित करने के भाव से किया जाता है, और यह कर्मयोग की भावना को दर्शाता है। यह किसी विशिष्ट ग्रंथ से नहीं, बल्कि मौखिक परंपरा से आया है और सदियों से विभिन्न वैष्णव संप्रदायों में प्रचलित है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Maharishi Vedavyasa · प्राचीन वैदिक ऋषि · पौराणिक प्राचीन काल
परंपरागत रूप से चारों वेदों के संकलनकर्ता तथा महाभारत (जिसके अंतर्गत भगवद्गीता आती है) एवं पुराणों के रचयिता माने जाते हैं — जिससे वे संपूर्ण हिंदू ग्रंथ-परंपरा में सर्वाधिक उद्धृत रचनाकारों में से एक हैं, जो दर्शन, महाकाव्य कथा, एवं भक्ति साहित्य तक विस्तृत है।
क्या आप जानते हैं?
स्रोत
यह श्लोक श्रीमद्भागवतम् 11.2.36 से मिलता है, जो नवयोगेन्द्रों में से एक ऋषि हवि द्वारा राजा निमि को दिए गए उपदेश का भाग है। यह एक प्रार्थना है जिसमें भक्त अपने सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित करता है।
अर्थ
इस श्लोक का सार है कि व्यक्ति अपने शरीर, वाणी, मन, इंद्रियों, बुद्धि और प्रकृति के स्वभाव से जो कुछ भी करता है, वह सब परमात्मा नारायण को अर्पित कर देता है। यह पूर्ण समर्पण का भाव दर्शाता है।
प्रयोग
यह श्लोक प्रायः पूजा, ध्यान या भोजन से पहले बोला जाता है, ताकि सभी क्रियाएं ईश्वर को समर्पित हो जाएं। यह कर्मयोग का एक सरल लेकिन गहन उदाहरण है।
संरचना
श्लोक में सात प्रकार के करणों (साधनों) का उल्लेख है – काय, वाक्, मन, इंद्रियां, बुद्धि, आत्मा और प्रकृति का स्वभाव। यह दर्शाता है कि मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व को ईश्वर को अर्पित किया जा सकता है।
महत्व
यह श्लोक 'शरणागति' (सर्वसमर्पण) के सिद्धांत को स्पष्ट करता है, जो भक्ति और वेदांत दोनों में महत्वपूर्ण है। आदि शंकराचार्य ने इसे अपने प्रवचनों में विशेष रूप से प्रसिद्ध किया।
