तुलस्युपनिषद्
तुलस्युपनिषद्, एक लघु वैष्णव पाठ जिसमें 'यन्मूले सर्वतीर्थानि' श्लोक है; तुलसी को विष्णुप्रिया के रूप में सम्मानित करता है।
श्लोक
यह तुलसी उपनिषद् है।
श्लोक 1
अब हम तुलसी उपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। इसके ऋषि नारद हैं।
श्लोक 2
इसका छन्द अथर्वाङ्गिरा है और देवता अमृता तुलसी हैं।
श्लोक 3
सुधा बीज है, वसुधा शक्ति है, और नारायण कीलक हैं।
श्लोक 4
जो तुलसी श्यामवर्णा, श्याम शरीर धारण करने वाली, ऋग्वेद स्वरूपा, यजुर्वेद मनोरूपा, अथर्ववेद प्राणरूपा, कल्पहस्ता, पुराणों में वर्णित, अमृत से उत्पन्न, अमृतरस की मंजरी, अनन्त, अनन्त रस भोग देने वाली, वैष्णवी, विष्णु की प्रिय, मृत्यु और जन्म का नाश करने वाली, दर्शन मात्र से पापनाशिनी, स्पर्श से पावनी, प्रणाम से रोगनाशिनी, सेवन से मृत्युनाशिनी, वैकुण्ठ में अर्चन से विपत्ति हरने वाली, भक्षण से बुद्धि देने वाली, प्रदक्षिणा से दरिद्रता नाश करने वाली, मूल मिट्टी के लेपन से महापापों को नष्ट करने वाली, घ्राण तर्पण से आंतरिक मल नाश करने वाली हैं — ऐसी तुलसी को जो इस प्रकार जानता है वह वैष्णव हो जाता है।
श्लोक 5
व्यर्थ में तुलसी को न काटे। देखकर प्रदक्षिणा करे। द्वादशी को स्पर्श न करे। पर्व के दिन न तोड़े। यदि तोड़ता है तो वह विष्णु का हन्ता होता है। 'श्री तुलस्यै स्वाहा', 'विष्णुप्रियायै स्वाहा', 'अमृतायै स्वाहा' — ये मन्त्र हैं।
श्लोक 6
हम श्री तुलसी को जानते हैं, विष्णुप्रिया का ध्यान करते हैं। वह अमृता हमें प्रेरित करें।
श्लोक 7
हे अमृते! तू अमृतरूपा है, अमृतत्व देने वाली है। तू मुझे संसार से उद्धार कर, हे क्षीरसागर की कन्ये!
श्लोक 8
हे श्रीसखि! तू सदा आनन्द में रहने वाली है, मुकुन्द की सदा प्रिया है। हे दुर्लभे! तू वरद और अभय हस्तों से मुझे देख (कृपा कर)।
श्लोक 9
हे अवृक्ष वृक्षरूपा तुलसी! तू वृक्ष न होते हुए भी वृक्षरूपा है। मेरे वृक्षत्व (संसार-बन्धन) को नाश कर। हे अतुल रूपा! तू करोड़ों तुलाओं के समान है और अजर है।
श्लोक 10
हे अतुले! तेरी तुला (समता) में केवल हरि ही ठहरते हैं, अन्य नहीं। तू ही जगत की धात्री है, तू ही विष्णु की प्रिय है।
श्लोक 11
तू ही देवताओं द्वारा सेव्य है, तू ही मोक्षदायिनी है। तेरी छाया में लक्ष्मी वास करती हैं, तेरे मूल में अव्यय विष्णु रहते हैं, और चारों ओर सभी देवता, सिद्ध, चारण और नाग रहते हैं।
श्लोक 12
जिसके मूल में सब तीर्थ हैं, जिसके मध्य में ब्रह्म और देवता हैं, जिसके अग्रभाग में वेद और शास्त्र हैं, उस तुलसी को मैं नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 13
हे तुलसी! हे श्रीसखि! हे कल्याणमयी! हे पापहारिणि! हे पुण्यदायिनि! तुझे नमस्कार है, जो नारद द्वारा स्तुत हो और नारायण के मन की प्रिय हो।
श्लोक 14
हे ब्रह्मानन्द के अश्रुओं से उत्पन्न! हे वृन्दावन में निवास करने वाली! हे सब अवयवों से पूर्ण! हे अमृतोपनिषद् के रसस्वरूपा!
श्लोक 15
हे कल्याणि! तू मुझे महापापरूपी दुस्तर समुद्र से उद्धार कर। सब पापों का प्रायश्चित्त तू ही है। देवताओं, ऋषियों और पितरों की तू सदा प्रिया है।
श्लोक 16
जो विप्र श्रीतुलसी के बिना श्राद्ध करते हैं, उनका वह श्राद्ध व्यर्थ होता है और पितरों तक नहीं पहुँचता।
श्लोक 17
तुलसीपत्र को छोड़कर यदि कोई पूजा करता है, तो वह पूजा आसुरी होती है और विष्णु को प्रसन्न करने वाली नहीं होती।
श्लोक 18
यज्ञ, दान, जप, तीर्थ, श्राद्ध, देवताओं की अर्चना, तर्पण, स्नान आदि अन्य कर्म भी तुलसी के बिना न करें।
श्लोक 19
तुलसी की लकड़ी के मणियों (माला) से किया गया जप सब अर्थों को सिद्ध करने वाला है। जो कोई ऐसा नहीं जानता, वह विप्र भी श्वपच (चाण्डाल) से भी अधम है।
श्लोक 20
इस प्रकार भगवान नारायण ने ब्रह्मा से कहा, ब्रह्मा ने नारद और सनकादि से, सनकादि ने वेदव्यास से, वेदव्यास ने शुक से, शुक ने वामदेव से, वामदेव ने मुनियों से, और मुनियों ने मनुओं से कहा।
श्लोक 21
जो इस प्रकार जानता है, वह स्त्रीहत्या के पाप से मुक्त होता है, वीरहत्या से मुक्त होता है, ब्रह्महत्या से मुक्त होता है, महाभय से मुक्त होता है, महादुःख से मुक्त होता है, और देह के अन्त में वैकुण्ठ को प्राप्त करता है, वैकुण्ठ को प्राप्त करता है। यह उपनिषद् है (वैष्णव उपनिषदों में)।
श्लोक 22
इस प्रकार तुलसी उपनिषद् समाप्त हुई।
श्लोक 23
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
शुक्रवार एवं पूर्णिमा तिथि
संध्याकाल (दीप प्रज्वलन वेला)
कमल का पुष्प, खीर का भोग, पंचामृत, कुमकुम एवं शुद्ध घी का दीपक
- धन-धान्य, वैभव, पारिवारिक सुख-शांति एवं मानसिक प्रसन्नता
पृष्ठभूमि
तुलस्युपनिषद् वैष्णव परम्परा का एक छोटा संस्कृत पाठ है, जिसे उपनिषद् कहा गया है और जो संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के उपनिषद् संग्रह में है। पाठ स्वयं नारद को ऋषि, अथर्वाङ्गिरा को छन्द और अमृता तुलसी को देवता बताता है। इस पृष्ठ पर क्रमांकित इसका श्लोक 13, 'यन्मूले सर्वतीर्थानि' (मूल पाठ की अपनी संख्या में श्लोक 6, जो प्रस्तावना के बाद फिर से आरम्भ होती है), तुलसी को वह कहकर प्रणाम करता है जिसके मूल में सब तीर्थ हैं, और तुलसी-पूजन में अलग से भी पढ़ा जाता है; इसी से इस पृष्ठ का नाम पड़ा है। पाठ महापापों से शुद्धि और अंत में वैकुण्ठ की प्राप्ति का फल बताता है।
क्या आप जानते हैं?
तुलस्युपनिषद् क्या है?
यह उपनिषद् कहा गया एक लघु पाठ है, जो अपने छन्द 'अथर्वाङ्गिरा' के कारण परम्परा में अथर्ववेद से जुड़ा माना जाता है। यह पूरी तरह तुलसी को समर्पित है और उन्हें देवी तथा विष्णुप्रिया के रूप में पूजता है। यह प्रमुख उपनिषदों में नहीं गिना जाता।
तुलसी गायत्री मंत्र
क्रमांकित श्लोकों से पहले पाठ के गद्य में तुलसी के लिए गायत्री-शैली का मंत्र है, 'श्री तुलस्यै विद्महे, विष्णुप्रियायै धीमहि, तन्नो अमृता प्रचोदयात्', जिसमें उन्हें 'श्री तुलसी' और 'विष्णुप्रिया' कहा गया है।
तुलसी के नियम
पाठ में तुलसी के प्रति आदर के नियम हैं: बिना कारण न तोड़ना, देखकर प्रदक्षिणा करना, द्वादशी और पर्व के दिन न छूना। नियम तोड़ने वाले को विष्णु का अपराधी बताया गया है।
तुलसी के बिना पूजा अधूरी
पाठ कहता है कि तुलसीपत्र के बिना की गई पूजा, श्राद्ध, यज्ञ, दान या जप निष्फल या आसुरी है। इसीलिए वैष्णव पूजा में तुलसी की केंद्रीय भूमिका है।
उपदेश की परम्परा
पाठ के अनुसार नारायण ने यह ज्ञान ब्रह्मा को दिया; ब्रह्मा ने नारद और सनकादि को, फिर वेदव्यास, शुक, वामदेव और अन्य मुनियों तथा मनुओं तक यह पहुँचा।
फलश्रुति
पाठ के अनुसार इसे जानने वाला स्त्रीहत्या, वीरहत्या और ब्रह्महत्या जैसे महापापों तथा महाभय से मुक्त होता है और अंत में वैकुण्ठ पाता है।
Lakshmi
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