श्रीपुरुषसूक्तम्
पुरुषसूक्त (ऋग्वेद १०.९०): विराट् पुरुष का वैदिक स्तोत्र, जिसके यज्ञ से लोकों और वेदों की उत्पत्ति बताई गई है।
श्लोक
अब पुरुषसूक्त का आरंभ होता है।
श्लोक 1
हे प्रभु, हम आपकी कल्याणकारी कृपा की प्रार्थना करते हैं, जिससे हमारे यज्ञ की सिद्धि हो, यज्ञ के रक्षक का कल्याण हो, और हम सबको दिव्य शांति एवं मंगल प्राप्त हो।
श्लोक 2
समस्त मनुष्यों का कल्याण हो, औषधियाँ और उपचार बलपूर्वक ऊपर उठकर प्रभावी हों, हमारे द्विपाद (मनुष्यों) का कल्याण हो, और हमारे चतुष्पाद (पशुओं) का भी मंगल हो।
श्लोक 3
हे ईश्वर, आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक—तीनों प्रकार की शांतियाँ हम सबको प्राप्त हों।
श्लोक 4
परमब्रह्म परमात्मा की जय हो।
श्लोक 5
वे विराट पुरुष सहस्रों सिरों वाले, सहस्रों नेत्रों वाले और सहस्रों चरणों वाले हैं।
श्लोक 6
उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी को चारों ओर से व्याप्त करके अपने अनंत प्रभाव से उसे दस अंगुल ऊपर तक यानी उससे परे भी असीम रूप से अतिक्रमण कर रखा है।
श्लोक 7
यह संपूर्ण दृश्य और अदृश्य जगत—जो भूतकाल में था, जो वर्तमान में है और जो भविष्य में होगा—सब कुछ वही परम पुरुष ही है।
श्लोक 8
वे परमात्मा अमरत्व (मोक्ष) के भी स्वामी हैं, और जो जीव अन्न के उपभोग से संसार में वृद्धि को प्राप्त होता है, उससे भी परे वे सर्वोपरि हैं।
श्लोक 9
उनकी महिमा असीम है, और वे परम पुरुष इस संपूर्ण ब्रह्मांड से भी कहीं अधिक महान एवं व्यापक हैं।
श्लोक 10
संपूर्ण भूत-प्राणी उनके केवल एक पाद (चौथाई भाग) के अंतर्गत आते हैं, जबकि उनके अमृतमय और दिव्य रूप के तीन पाद अप्राकृत आकाश (दिवि) में स्थित हैं।
श्लोक 11
वे परम पुरुष अपने तीन पादों से ऊपर दिव्य धाम में स्थित हैं, और उनका एक पाद इस संसार में बार-बार नाना रूपों में प्रकट होता है।
श्लोक 12
तत्पश्चात वे परमात्मा इस संपूर्ण ब्रह्मांड में, खाने वाले (जीवों) और न खाने वाले (जड़ पदार्थों) दोनों के ही रूप में सर्वत्र व्याप्त हो गए।
श्लोक 13
उन परम पुरुष से ही संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण करने वाली विराट शक्ति उत्पन्न हुई, और उस विराट से पुनः समस्त लोक-लोकांतार और प्रजाओं के रचयिता पुरुष का प्रार्दुभाव हुआ।
श्लोक 14
वे जब सृष्टि के रूप में प्रकट हुए, तो अपनी व्यापकता में वे पृथ्वी के पीछे (पूर्व) और आगे (उत्तर आदि दिशाओं में) सब ओर से बढ़ गए।
श्लोक 15
जिस समय देवताओं ने उन पुरुष रूपी हविष्य (समर्पण) के द्वारा यज्ञ का विस्तार किया।
श्लोक 16
उस महान यज्ञ में वसंत ऋतु घी (आज्य) बनी, ग्रीष्म ऋतु समिधा (ईंधन) बनी, और शरद ऋतु हवि (आहुति) बनी।
श्लोक 17
उस यज्ञ में सात परिधियाँ (सुरक्षा की दीवारें) थीं और इक्कीस प्रकार की समिधाएँ निश्चित की गईं।
श्लोक 18
जब देवगण यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे, तब उन्होंने उस परम पुरुष को ही यज्ञीय पशु के रूप में (सांकेतिक रूप से) अर्पित किया।
श्लोक 19
आदि में प्रकट हुए उस पुरुष रूपी यज्ञ को देवताओं ने पवित्र कुशा पर वेदी के आगे अभिषिक्त किया।
श्लोक 20
उस यज्ञीय पुरुष के माध्यम से देवताओं, साध्यगणों और ऋषियों ने यज्ञ का संपादन किया।
श्लोक 21
उस सर्वाहुति रूप महान यज्ञ से जो घृत और दूध का मिश्रण (पृषदाज्य) उत्पन्न हुआ।
श्लोक 22
उससे वायु के अधीन रहने वाले, वन में विचरने वाले वन्य पशु और ग्राम में रहने वाले पालतू पशु उत्पन्न किए गए।
श्लोक 23
उसी सर्वहुत यज्ञ से ऋग्वेद और सामवेद प्रकट हुए।
श्लोक 24
उसी यज्ञ से समस्त छंद उत्पन्न हुए और यजुर्वेद की भी उत्पत्ति हुई।
श्लोक 25
उसी से घोड़े और वे सभी पशु उत्पन्न हुए जिनके दोनों तरफ दाँत होते हैं।
श्लोक 26
उसी यज्ञ से गायें उत्पन्न हुईं और उसी से बकरियाँ तथा भेड़ें भी प्रकट हुईं।
श्लोक 27
संतों और विचारकों ने जब उस परम पुरुष के अंगों का विभाजन किया, तो उन्होंने उसे किस प्रकार कल्पित किया?
श्लोक 28
उनका मुख क्या था, उनकी दोनों भुजाएँ क्या थीं, और उनकी दोनों जंघाएँ तथा चरण क्या कहे जाते हैं?
श्लोक 29
ब्राह्मण उस (पुरुष) के मुख से उत्पन्न हुए, क्षत्रिय उसकी भुजाओं से बने।
श्लोक 30
उसकी जाँघों से वैश्य उत्पन्न हुए और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुआ।
श्लोक 31
चन्द्रमा उसके मन से उत्पन्न हुआ, सूर्य उसकी आँखों से उत्पन्न हुआ।
श्लोक 32
उसके मुख से इन्द्र और अग्नि उत्पन्न हुए, प्राण से वायु उत्पन्न हुई।
श्लोक 33
उसकी नाभि से अन्तरिक्ष उत्पन्न हुआ, सिर से द्युलोक प्रकट हुआ।
श्लोक 34
पैरों से भूमि, कानों से दिशाएँ उत्पन्न हुईं; इस प्रकार उन्होंने लोकों की रचना की।
श्लोक 35
मैं इस महान् पुरुष को जानता हूँ, जो सूर्य के समान तेजस्वी है और अंधकार के पार है।
श्लोक 36
वह धीर पुरुष सब रूपों को जानकर, नामों को रचकर, उनका वर्णन करते हुए विराजमान है।
श्लोक 37
विधाता ने उसे (पुरुष को) पूर्व दिशा में प्रकट किया, और शक्र (इन्द्र) ने चारों दिशाओं में जानकर उसकी स्थापना की।
श्लोक 38
उस (पुरुष) को इस प्रकार जानने वाला मनुष्य इसी लोक में अमृत (मोक्ष) को प्राप्त होता है; उस (परम पद) को प्राप्त करने का कोई अन्य मार्ग नहीं है।
श्लोक 39
देवताओं ने यज्ञ के द्वारा यज्ञ (पुरुष) का यजन किया; वे ही प्रथम धर्म (कर्म) थे।
श्लोक 40
वे महिमावान् देवगण स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं, जहाँ प्राचीन साध्य देवता निवास करते हैं।
श्लोक 41
ॐ, भगवान् नारायण को नमस्कार है।
श्लोक 42
यह उत्तरनारायण (स्तोत्र) है।
श्लोक 43
वह (पुरुष) जल से, पृथ्वी के रस से और विश्वकर्मा से उत्पन्न हुआ।
श्लोक 44
त्वष्टा उस (पुरुष) के रूप को रचता है; वह पुरुष ही सब कुछ है, जो आदि में उत्पन्न हुआ।
श्लोक 45
मैं इस महान् पुरुष को जानता हूँ, जो सूर्य के समान तेजस्वी है और अंधकार से परे है।
श्लोक 46
उस (पुरुष) को इस प्रकार जानने वाला मनुष्य इसी लोक में अमृत (मोक्ष) को प्राप्त होता है; उस (परम पद) को प्राप्त करने का कोई अन्य मार्ग नहीं है।
श्लोक 47
प्रजापति गर्भ के भीतर विचरण करते हैं; वे अजन्मे होते हुए भी अनेक रूपों में प्रकट होते हैं।
श्लोक 48
धीर पुरुष उस (प्रजापति) के मूल स्रोत (योनि) को जानते हैं; वे विद्वान् मरीचियों (प्रकाश किरणों) के पद (लोक) की इच्छा करते हैं।
श्लोक 49
जो देवताओं के लिए तपता है (प्रकाश देता है), जो देवताओं का पुरोहित है।
श्लोक 50
जो देवताओं से पहले उत्पन्न हुआ, उस तेजस्वी ब्रह्म (परमात्मा) को नमस्कार है।
श्लोक 51
देवताओं ने आदि में ब्रह्म-तेज (रुच) को उत्पन्न करते हुए यह कहा।
श्लोक 52
जो ब्राह्मण इस प्रकार (इस तत्त्व को) जानता है, उसके वश में देवता होते हैं।
श्लोक 53
ह्री (लज्जा) और लक्ष्मी तुम्हारी पत्नियाँ हैं; अहोरात्र (दिन-रात) तुम्हारे पार्श्व (बगल) हैं।
श्लोक 54
नक्षत्र तुम्हारा रूप हैं; अश्विनीकुमार तुम्हारा मुख हैं। इष्ट (यज्ञ) को मैं जानता हूँ, उस (पुरुष) को मैं जानता हूँ, सबको मैं जानता हूँ।
श्लोक 55
ॐ, हम उस कल्याणकारी (परमात्मा) को चुनते हैं। यज्ञ के लिए मार्ग हो, यज्ञपति (यजमान) के लिए मार्ग हो। दैवी स्वस्ति (कल्याण) हमारे लिए हो।
श्लोक 56
मनुष्यों के लिए कल्याण हो। ऊर्ध्व (उत्तम) औषधि (उपाय) प्राप्त हो। द्विपद (मनुष्य) के लिए सुख हो, चतुष्पद (पशु) के लिए सुख हो।
श्लोक 57
ॐ, शांति, शांति, शांति।
श्लोक 58
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह पुरुषसूक्त ऋग्वेद के दसवें मण्डल (सूक्त ९०) का एक अत्यंत प्रसिद्ध वैदिक स्तोत्र है। इसमें सृष्टि के आदि पुरुष (ब्रह्मांडीय पुरुष) का वर्णन है, जिसके विभिन्न अंगों से संपूर्ण ब्रह्मांड, देवता, वेद और चार वर्ण उत्पन्न हुए। इस सूक्त का पाठ प्रायः यज्ञों, विशेषकर विष्णु या नारायण की पूजा में, तथा श्राद्ध और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। यह वैदिक साहित्य के सबसे गूढ़ और महत्वपूर्ण सूक्तों में से एक माना जाता है। स्थान-निर्देश: ऋग्वेद १०.९० (सोलह मंत्र); शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयि संहिता के अध्याय ३१ (मंत्र १–१६) में भी। यहाँ स्वर-चिह्नों सहित यजुर्वेदीय पाठ-रूप है, जिसमें आरम्भ-अन्त के शान्तिपाठ और उत्तरनारायण के मंत्र जुड़े हैं।
क्या आप जानते हैं?
मूल स्रोत
यह स्तोत्र ऋग्वेद के 10वें मंडल के 90वें सूक्त से लिया गया है। इसमें 16 मंत्र हैं, लेकिन यहाँ उत्तरनारायणम् के साथ विस्तारित रूप प्रस्तुत है। यह वैदिक साहित्य के सबसे प्रसिद्ध और रहस्यमय स्तोत्रों में से एक है।
पुरुष का वर्णन
पुरुष को सहस्रशीर्षा (हजार सिरों वाला), सहस्राक्ष (हजार आँखों वाला) और सहस्रपात् (हजार पैरों वाला) बताया गया है। वह सम्पूर्ण ब्रह्मांड को व्याप्त करता है और फिर भी उससे परे है — "अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्" (दस अंगुल अर्थात् सीमित स्थान से भी अधिक)।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति
इस स्तोत्र में वर्णित है कि देवताओं ने पुरुष का यज्ञ (बलिदान) किया, जिससे समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई। इस यज्ञ से ऋचाएँ, साम, यजुः, छंद, घोड़े, गाय, बकरी-भेड़ आदि उत्पन्न हुए। यह एक रूपक है जो ब्रह्मांड की एकता और विविधता को समझाता है।
वर्ण व्यवस्था
पुरुष के विभिन्न अंगों से चार वर्णों की उत्पत्ति बताई गई है — ब्राह्मण (मुख से), राजन्य/क्षत्रिय (बाहुओं से), वैश्य (जाँघों से) और शूद्र (पैरों से)। यह सामाजिक संरचना का एक प्रतीकात्मक वर्णन है, न कि जन्मगत भेदभाव का समर्थन।
आध्यात्मिक संदेश
स्तोत्र के अंत में कहा गया है कि जो इस पुरुष को जान लेता है, वह अमृत (मोक्ष) प्राप्त करता है। "नान्यः पन्था अयनाय विद्यते" — इसके अलावा मोक्ष का कोई अन्य मार्ग नहीं है। यह उपनिषदों के एकत्व के दर्शन का आधार है।
Vishnu
हिन्दू धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
