आखिलन्देश्वरि ष्तोत्रम्
यह एक दिव्य स्तोत्र है जो देवी अखिलाण्डेश्वरी की स्तुति करता है। इसमें उनके विभिन्न रूपों, बीज मंत्रों और गुणों का वर्णन है, और इसे सुख-समृद्धि तथा कल्याण के लिए पढ़ा जाता है।
श्लोक
हे अखिलांडेश्वरी! आप ओंकार रूपी सागर के मध्य में निवास करती हैं, तीन मार्गों (गंगा) में प्रवाहित होती हैं, और ओंकार बीज का स्वरूप हैं। ओंकार द्वारा सुख प्रदान करने वाली, मंगल करने वाली, ओंकार के बिंदु को प्रिय मानने वाली, ओंकार में जगदंबिका (जगन्माता) स्वरूपिणी, चंद्रकला धारण करने वाली, और ओंकार रूपी पीठ पर विराजमान होने वाली देवी! मैं आपका दास हूँ, आपके दोनों चरणकमलों में वंदना करता हूँ।
श्लोक 1
हे अखिलांडेश्वरी! आप ह्रींकार रूपी सागर के वर्णों के मध्य निवास करती हैं, और ह्रींकार वर्ण का ही स्वरूप हैं। ह्रींकार रूपी सागर में सुंदर चंद्रकला धारण करने वाली, और ह्रींकार के नाद (ध्वनि) को प्रिय मानने वाली, ह्रींकार में त्रिपुरा की ईश्वरी (त्रिपुरेश्वरी), उत्तम चरित्र वाली, और ह्रींकार रूपी पीठ पर विराजमान होने वाली देवी! मैं आपका दास हूँ, आपके दोनों चरणकमलों में वंदना करता हूँ।
श्लोक 2
हे अखिलांडेश्वरी! आपका मुखमंडल श्रीचक्र अंकित आभूषणों से देदीप्यमान है, हे श्री राजराजेश्वरी! श्रीकंठ (शिव) के शरीर के आधे भाग (वामभाग) में निवास करने वाली, और श्री जंबुनाथ (शिव) को अत्यंत प्रिय देवी! श्रीकांत (विष्णु) की बहन, शुद्ध मन वाली, और श्रीबिंदुपीठ को प्रिय मानने वाली देवी! मैं आपका दास हूँ, आपके दोनों चरणकमलों में वंदना करता हूँ।
श्लोक 3
हे अखिलांडेश्वरी! मस्तक पर कस्तूरी के तिलक से सुशोभित, कलयुग के पापों का नाश करने वाली, और क्लींकार बीज का स्वरूप देवी! कल्याण करने वाली, जगदीश्वरी, भगवती, और कदंब वन में निवास करना पसंद करने वाली, कामाक्षी, सब की ईश्वरी, मंगल करने वाली, और क्लींकार रूपी पीठ पर विराजमान होने वाली देवी! मैं आपका दास हूँ, आपके दोनों चरणकमलों में वंदना करता हूँ।
श्लोक 4
हे अखिलांडेश्वरी! नाद (ध्वनि) में निवास करने वाली, नारद, तुम्बुरु आदि द्वारा स्तुत, नारायणी, मंगलमयी देवी! अनेक प्रकार के आभूषण, हार और नूपुर (पायल) धारण करने वाली, और नाक के हीरे से देदीप्यमान होने वाली, अनेक भक्तों द्वारा पूजित चरणकमलों वाली, सिंह (हाथी के शत्रु) पर विराजमान होने वाली देवी! मैं आपका दास हूँ, आपके दोनों चरणकमलों में वंदना करता हूँ।
श्लोक 5
हे अखिलांडेश्वरी! श्यामल शरीर वाली, करोड़ों शरद ऋतु के चंद्रमा के समान उज्ज्वल मुखमंडल वाली, सिद्धांत मार्ग को प्रिय मानने वाली देवी! शांत स्वरूप, शरद ऋतु के समान शीतल और दिव्य विग्रह वाली, मंगल करने वाली, शास्त्र और छह दर्शनों (षड्दर्शन) की ज्ञाता, शर्वाणी (शिवपत्नी), परमात्मा स्वरूपिणी, परशिवा, और प्रत्यक्ष सिद्धि प्रदान करने वाली देवी! मैं आपका दास हूँ, आपके दोनों चरणकमलों में वंदना करता हूँ।
श्लोक 6
हे अखिलांडेश्वरी! मंगलमयी, मधुरता को प्रिय मानने वाली, मधुमती, और मंगलसूत्र से सुशोभित देवी! अपनी महिमा सुनना पसंद करने वाली, उत्तम संतान की माता, वात्सल्यमयी, माहेश्वरी, और चिन्मयी (चेतनारूपिणी)! मांधाता जैसे प्रमुख राजर्षियों द्वारा पूजित चरणकमलों वाली, और मंत्रसिद्धि प्रदान करने वाली देवी! मैं आपका दास हूँ, आपके दोनों चरणकमलों में वंदना करता हूँ।
श्लोक 7
हे अखिलांडेश्वरी! परम तत्व स्वरूपिणी, सर्वोत्कृष्ट से भी उत्कृष्ट, ज्योतिर्मयी, और चिन्मयी (चेतनारूपिणी)! नाद में नादमयी, सदाशिव स्वरूपिणी, और तत्व का वास्तविक सार स्वरूप! शब्दब्रह्म स्वरूपिणी, चराचर जगत में व्याप्त रहने वाली, और वेदांत का स्वरूप देवी! मैं आपका दास हूँ, आपके दोनों चरणकमलों में वंदना करता हूँ।
श्लोक 8
हे देवी! कदंब के वृक्ष के मूल में निवास करने वाली, मंगल धारण करने वाली, पर्वतराज की पुत्री, और शंकरी (शिवपत्नी)! हमारा मंगल कीजिए।
श्लोक 9
हे देवी! जो लोग आपका ध्यान करते हुए शुक्रवार के दिन इन दस श्लोकों का पाठ करते हैं, वे धन, दीर्घायु, आरोग्य (अच्छा स्वास्थ्य) और संतान का सुख प्राप्त करते हैं।
श्लोक 10
इस प्रकार श्री अखिलांडेश्वरी स्तोत्र समाप्त होता है।
श्लोक 11
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र शाक्त परंपरा का एक प्रसिद्ध स्तोत्र है, जो देवी अखिलाण्डेश्वरी को समर्पित है। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स का पाठ इसे स्तोत्रार्णव 08-01 से बताता है और किसी रचयिता का नाम नहीं देता। तीसरे श्लोक में 'जम्बुनाथ' का उल्लेख इसे जम्बुकेश्वरम की देवी अखिलाण्डेश्वरी से जोड़ता है। इसका पाठ शुक्रवार (भृगुवार) को किया जाता है, क्योंकि इससे धन, आयु, आरोग्य और पुत्र-संपदा की प्राप्ति मानी गई है। इसमें 'ॐ', 'ह्रीं', 'क्लीं' जैसे बीज मंत्रों का समावेश है।
क्या आप जानते हैं?
रचना का स्वरूप
यह स्तोत्र देवी अखिलाण्डेश्वरी की स्तुति में है, जिन्हें तीसरे श्लोक के 'जम्बुनाथ' संकेत से जम्बुकेश्वरम (तिरुवानैकावल) की देवी माना जाता है। प्रत्येक श्लोक में एक बीज मंत्र (जैसे ‘ओंकार’, ‘ह्रींकार’, ‘क्लींकार’) से शुरुआत होती है और अंत में ‘दासोऽहं तव पादपद्मयुगलं वन्देऽखिलाण्डेश्वरि’ पंक्ति दोहराई गई है।
बीज मंत्रों का महत्व
पहले दो श्लोकों में ‘ओंकार’ और ‘ह्रींकार’ बीज मंत्रों का उपयोग है, जो तंत्र साधना में देवी के विभिन्न पहलुओं को जगाने के लिए माने जाते हैं। तीसरे श्लोक में ‘श्रीचक्र’ और ‘श्रीराजराजेश्वरी’ जैसे नामों से देवी को श्रीविद्या परंपरा से जोड़ा गया है।
देवी के विविध रूप
स्तोत्र में देवी को ‘कामाक्षी’, ‘श्यामाङ्गी’, ‘शर्वाणी’, ‘माहेश्वरी’ आदि नामों से संबोधित किया गया है, जो उनके सौम्य, उग्र और सर्वव्यापी स्वरूपों को दर्शाते हैं। पाँचवें श्लोक में ‘नारद-तुम्बुरु’ जैसे देवर्षियों द्वारा स्तुत होने का उल्लेख है।
फलश्रुति का संदेश
अंतिम दो श्लोक (९-१०) में वर्णित है कि जो भक्त भृगु नक्षत्र के दिन (शुक्रवार या विशेष तिथि) इस दशक (दस श्लोकों) का पाठ करता है, उसे धन, दीर्घायु, आरोग्य और पुत्र-संपदा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र को नियमित पाठ के लिए विशेष फलदायी बताता है।
तत्त्वमयी वर्णन
आठवें श्लोक में देवी को ‘तत्त्वमयी’, ‘नादमयी’, ‘शब्दब्रह्ममयी’ और ‘वेदान्तरूपात्मिके’ कहा गया है, जो उन्हें सृष्टि के मूल तत्त्वों, ध्वनि और वेदांत के सार के रूप में स्थापित करता है। यह श्लोक अद्वैत दर्शन के साथ देवी की एकता को दर्शाता है।
Devi
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