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Embroidered artwork for आखिलन्देश्वरि ष्तोत्रम्: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

आखिलन्देश्वरि ष्तोत्रम्

आखिलन्देश्वरि ष्तोत्रम्

यह एक दिव्य स्तोत्र है जो देवी अखिलाण्डेश्वरी की स्तुति करता है। इसमें उनके विभिन्न रूपों, बीज मंत्रों और गुणों का वर्णन है, और इसे सुख-समृद्धि तथा कल्याण के लिए पढ़ा जाता है।

श्लोक

ओङ्कारार्णवमध्यगे त्रिपथगे ओङ्कारबीजात्मिके ओङ्कारेण सुखप्रदे शुभकरे ओकारबिन्दुप्रिये ओङ्कारे जगदम्बिके शशिकले ओङ्कारपीठस्थिते दासोऽहं तव पादपद्मयुगलं वन्देऽखिलाण्डेश्वरि
onkaaraarnavamadhyage tripathage onkaarabeejaatmike onkaarena sukhaprade shubhakare okaarabindupriye onkaare jagadambike shashikale onkaarapeethasthite daaso'ham tava paadapadmayugalam vande'khilaandeshvari | 1 |

श्लोक 1

ह्रीङ्कारार्णववर्णमध्यनिलये ह्रीङ्कारवर्णात्मिके ह्रीङ्काराब्धिसुचारुचान्द्रकधरे ह्रीङ्कारनादप्रिये ह्रीङ्कारे त्रिपुरेश्वरी सुचरिते ह्रीङ्कारपीठस्थिते दासोऽहं तव पादपद्मयुगलं वन्देऽखिलाण्डेश्वरि
hreenkaaraarnavavarnamadhyanilaye hreenkaaravarnaatmike hreenkaaraabdhisucaarucaandrakadhare hreenkaaranaadapriye hreenkaare tripureshvaree sucarite hreenkaarapeethasthite daaso'ham tava paadapadmayugalam vande'khilaandeshvari | 2 |

श्लोक 2

श्रीचक्राङ्कितभूषणोज्ज्वलमुखे श्रीराजराजेश्वरि श्रीकण्ठार्धशरीरभागनिलये श्रीजम्बुनाथप्रिये श्रीकान्तस्य सहोदरे सुमनसे श्रीबिन्दुपीठप्रिये दासोऽहं तव पादपद्मयुगलं वन्देऽखिलाण्डेश्वरि
shreecakraankitabhooshanojjvalamukhe shreeraajaraajeshvari shreekanthaardhashareerabhaaganilaye shreejambunaathapriye shreekaantasya sahodare sumanase shreebindupeethapriye daaso'ham tava paadapadmayugalam vande'khilaandeshvari | 3 |

श्लोक 3

कस्तूरीतिलकोज्ज्वले कलिहरे क्लीङ्कारबीजात्मिकेकल्याणो जगदीश्वरी भगवती कादम्बवासप्रिये कामाक्षी सकलेश्वरी शुभकरे क्लीङ्कारपीठस्थिते दासोऽहं तव पादपद्मयुगलं वन्देऽखिलाण्डेश्वरि
kastooreetilakojjvale kalihare kleenkaarabeejaatmikekalyaano jagadeeshvaree bhagavatee kaadambavaasapriye kaamaakshee sakaleshvaree shubhakare kleenkaarapeethasthite daaso'ham tava paadapadmayugalam vande'khilaandeshvari | 4 |

श्लोक 4

नादे नारदतुम्बुरादिविनुते नारायणी मङ्गले नानालङ्कृतहारनूपुरधरे नासामणीभासुरे नानाभक्तसुपूज्यपादकमले नागारिमध्यस्थले दासोऽहं तव पादपद्मयुगलं वन्देऽखिलाण्डेश्वरि
naade naaradatumburaadivinute naaraayanee mangale naanaalankritahaaranoopuradhare naasaamaneebhaasure naanaabhaktasupoojyapaadakamale naagaarimadhyasthale daaso'ham tava paadapadmayugalam vande'khilaandeshvari | 5 |

श्लोक 5

श्यामाङ्गी शरदिन्दुकोटिवदने सिद्धान्तमार्गप्रिये शान्ते शारदविग्रहे शुभकरे शास्त्रादिषड्दर्शने शर्वाणी परमात्मिके परशिवे प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे दासोऽहं तव पादपद्मयुगलं वन्देऽखिलाण्डेश्वरि
shyaamaangee sharadindukotivadane siddhaantamaargapriye shaante shaaradavigrahe shubhakare shaastraadishaddarshane sharvaanee paramaatmike parashive pratyakshasiddhiprade daaso'ham tava paadapadmayugalam vande'khilaandeshvari | 6 |

श्लोक 6

माङ्गल्ये मधुरप्रिये मधुमती माङ्गल्यसूत्रोज्ज्वले माहात्म्यश्रवणे सुते सुतमयी माहेश्वरी चिन्मयि मान्धाप्रमुखादिपूजितपदे मन्त्रा सिद्धिप्रदे दासोऽहं तव पादपद्मयुगलं वन्देऽखिलाण्डेश्वरि
maangalye madhurapriye madhumatee maangalyasootrojjvale maahaatmyashravane sute sutamayee maaheshvaree cinmayi maandhaapramukhaadipoojitapade mantraa siddhiprade daaso'ham tava paadapadmayugalam vande'khilaandeshvari | 7 |

श्लोक 7

तत्त्वे तत्त्वमयी परात्परमयि ज्योतिर्मयी चिन्मयि नादे नादमयी सदाशिवमयी तत्त्वार्थसारामयि शब्दब्रह्ममयी चराचरमयी वेदान्तरूपात्मिके दासोऽहं तव पादपद्मयुगलं वन्देऽखिलाण्डेश्वरि
tattve tattvamayee paraatparamayi jyotirmayee cinmayi naade naadamayee sadaashivamayee tattvaarthasaaraamayi shabdabrahmamayee caraacaramayee vedaantaroopaatmike daaso'ham tava paadapadmayugalam vande'khilaandeshvari | 8 |

श्लोक 8

कदम्बवृक्षमूले त्वं वासिनि शुभधारिणि धरधरसुते देवि मङ्गलं कुरु शङ्करि
kadambavrikshamoole tvam vaasini shubhadhaarini dharadharasute devi mangalam kuru shankari | 9 |

श्लोक 9

ध्यात्वा त्वां देवि दशकं ये पठन्ति भृगोर्दिने तेषां च धनमायुष्यमारोग्यं पुत्रसम्पदः
dhyaatvaa tvaam devi dashakam ye pathanti bhrigordine teshaam ca dhanamaayushyamaarogyam putrasampadah | 10 |

श्लोक 10

इति श्री अखिलाण्डेश्वरीस्तोत्रं सम्पूर्णम्
iti shree akhilaandeshvareestotram sampoornam | 11 |

श्लोक 11

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह स्तोत्र शाक्त परंपरा का एक प्रसिद्ध स्तोत्र है, जो देवी अखिलाण्डेश्वरी को समर्पित है। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स का पाठ इसे स्तोत्रार्णव 08-01 से बताता है और किसी रचयिता का नाम नहीं देता। तीसरे श्लोक में 'जम्बुनाथ' का उल्लेख इसे जम्बुकेश्वरम की देवी अखिलाण्डेश्वरी से जोड़ता है। इसका पाठ शुक्रवार (भृगुवार) को किया जाता है, क्योंकि इससे धन, आयु, आरोग्य और पुत्र-संपदा की प्राप्ति मानी गई है। इसमें 'ॐ', 'ह्रीं', 'क्लीं' जैसे बीज मंत्रों का समावेश है।

क्या आप जानते हैं?

रचना का स्वरूप

यह स्तोत्र देवी अखिलाण्डेश्वरी की स्तुति में है, जिन्हें तीसरे श्लोक के 'जम्बुनाथ' संकेत से जम्बुकेश्वरम (तिरुवानैकावल) की देवी माना जाता है। प्रत्येक श्लोक में एक बीज मंत्र (जैसे ‘ओंकार’, ‘ह्रींकार’, ‘क्लींकार’) से शुरुआत होती है और अंत में ‘दासोऽहं तव पादपद्मयुगलं वन्देऽखिलाण्डेश्वरि’ पंक्ति दोहराई गई है।

बीज मंत्रों का महत्व

पहले दो श्लोकों में ‘ओंकार’ और ‘ह्रींकार’ बीज मंत्रों का उपयोग है, जो तंत्र साधना में देवी के विभिन्न पहलुओं को जगाने के लिए माने जाते हैं। तीसरे श्लोक में ‘श्रीचक्र’ और ‘श्रीराजराजेश्वरी’ जैसे नामों से देवी को श्रीविद्या परंपरा से जोड़ा गया है।

देवी के विविध रूप

स्तोत्र में देवी को ‘कामाक्षी’, ‘श्यामाङ्गी’, ‘शर्वाणी’, ‘माहेश्वरी’ आदि नामों से संबोधित किया गया है, जो उनके सौम्य, उग्र और सर्वव्यापी स्वरूपों को दर्शाते हैं। पाँचवें श्लोक में ‘नारद-तुम्बुरु’ जैसे देवर्षियों द्वारा स्तुत होने का उल्लेख है।

फलश्रुति का संदेश

अंतिम दो श्लोक (९-१०) में वर्णित है कि जो भक्त भृगु नक्षत्र के दिन (शुक्रवार या विशेष तिथि) इस दशक (दस श्लोकों) का पाठ करता है, उसे धन, दीर्घायु, आरोग्य और पुत्र-संपदा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र को नियमित पाठ के लिए विशेष फलदायी बताता है।

तत्त्वमयी वर्णन

आठवें श्लोक में देवी को ‘तत्त्वमयी’, ‘नादमयी’, ‘शब्दब्रह्ममयी’ और ‘वेदान्तरूपात्मिके’ कहा गया है, जो उन्हें सृष्टि के मूल तत्त्वों, ध्वनि और वेदांत के सार के रूप में स्थापित करता है। यह श्लोक अद्वैत दर्शन के साथ देवी की एकता को दर्शाता है।

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