श्रीमद् अखिलाण्डदेवी-जम्बुकेश्वर स्तुतिः
अखिलाण्डदेवी और भगवान जम्बुकेश्वर की चार श्लोकों की संस्कृत स्तुति, जिसकी रचना शृंगेरी के जगद्गुरु ने की और जो तिरुवानैक्कावल मंदिर से जुड़ी है।
श्लोक
हे संपूर्ण ब्रह्मांड की देवी, करुणा की सागर, जंबुकेश्वर की पुण्य स्वरूपिणी माता! मुझसे हज़ारों अपराध होने पर भी मुझ पर प्रसन्न होइए।
श्लोक 1
मैं उन देवी अखिलांडेश्वरी को प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने अपने ऊपरी दो कमल समान हाथों में सुनहरे कमल पुष्प धारण किए हैं और निचले दो हाथों से वरद एवं अभय मुद्राएं प्रदर्शित करती हैं।
श्लोक 2
मैं अपने हृदय में क्षमा की सागर उन देवी की आराधना करता हूँ, जो जंबुनाथ (भगवान शिव) के मन रूपी कमल के लिए प्रातःकालीन सूर्य की किरण के समान हैं, जिन्होंने पूर्व में शंबूक जैसे जीवों का भी उद्धार किया, जिन्होंने अपने शरीर में शंख और पर्वत को क्रमशः सुंदर ग्रीवा और वक्ष के रूप में धारण किया है, और जो जल एवं पृथ्वी स्वरूपा हैं।
श्लोक 3
मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ जो जंबु (जामुन) वृक्ष के मूल में निवास करती हैं, जिनकी ग्रीवा का सौंदर्य दीप्तिमान शंख के गर्व को भी हर लेता है, जो जल और पृथ्वी का रूप हैं, तथा जो शंबूक आदि भक्तों को वरदान प्रदान करती हैं।
श्लोक 4
इस प्रकार शृंगेरी के श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानंदशिवाभिनवनृसिंहभारती स्वामी जी द्वारा रचित 'श्रीमदखिलांडदेवीजंबुकेश्वरस्तुतिः' संपूर्ण होती है।
श्लोक 5
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
सोमवार एवं प्रदोष काल
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्याकालीन प्रदोष वेला
बिल्वपत्र, गंगाजल, भस्म, धतूरा एवं श्वेत पुष्प
- आत्मिक शांति, समस्त पापों का नाश एवं अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र अखिलाण्डदेवी (अखिलाण्डेश्वरी) और भगवान जम्बुकेश्वर की चार श्लोकों की संक्षिप्त स्तुति है, जो तिरुचिरापल्ली के निकट तिरुवानैक्कावल के जम्बुकेश्वर मंदिर के अधिष्ठाता देव हैं। इसका समापन-पद शृंगेरी शारदा पीठ के जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती को रचयिता बताता है। पंचभूत स्थलों में जम्बुकेश्वर जल-तत्त्व के शिव हैं, और कहा जाता है कि शिवलिंग के नीचे मीठे जल का स्रोत है। स्तुति पहले माता से क्षमा माँगती है, फिर उनके रूप और जम्बू-वृक्ष के मूल में निवास करने वाले प्रभु की महिमा गाती है।
क्या आप जानते हैं?
रचयिता
समापन-पद श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती को रचयिता बताता है। वे शृंगेरी शारदा पीठ के 33वें जगद्गुरु थे, जिन्होंने 1879 से 1912 तक पीठ का दायित्व सँभाला और विद्वान तथा भक्त के रूप में जाने गए।
स्तोत्र का विषय
इस स्तुति में अखिलाण्डदेवी (सम्पूर्ण ब्रह्मांड की स्वामिनी) और जल-तत्त्व के शिव जम्बुकेश्वर की एक साथ वंदना है। उनका मंदिर तमिलनाडु के तिरुवानैक्कावल में है।
मंदिर का संबंध
जम्बुकेश्वर मंदिर पंचभूत स्थलों में से एक है और जल का प्रतिनिधित्व करता है। कहा जाता है कि शिवलिंग के नीचे मीठे जल का स्रोत है, और जम्बू (जामुन) का वृक्ष मंदिर का पवित्र वृक्ष है।
देवी का वर्णन
श्लोक 2 में कवि उन देवी को प्रणाम करता है जिन्होंने ऊपर के दो हाथों में स्वर्णिम कमल धारण किए हैं, और नीचे के दो हाथों में वर और अभय मुद्रा है। यह दिव्य माता का पारंपरिक स्वरूप है।
ध्वनि-क्रीड़ा
श्लोक 3 और 4 की अनेक पंक्तियाँ 'अम्बु' ध्वनि पर समाप्त होती हैं, जैसे जम्बू, शम्बू, कम्बू और अम्बू। अम्बु का अर्थ जल भी है, इसलिए यह ध्वनि मंदिर के जल-तत्त्व का स्मरण कराती है।
