ष्रि आखिलन्दनयिक डन्दक
यह एक दिव्य स्तोत्र है जो देवी अखिलाण्डनायिका (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की स्वामिनी) की स्तुति करता है। इसमें उनकी अलौकिक सुंदरता, शक्ति और कृपा का वर्णन किया गया है तथा उनकी शरण में जाने का भाव व्यक्त किया गया है।
श्लोक
मेरे मन-मंदिर में विराजमान, कदंब के फूलों के कर्णभूषणों से सुशोभित, मधुर वीणा बजाकर आनंद प्रदान करने वाली, हाथ में तोता धारण करने वाली, पुष्ट वक्षस्थल वाली और तीनों लोकों का कल्याण करने वाली भगवती की जय हो।
श्लोक 1
हे जगदंबा, शिव-प्रिया, जंबूनाथ शिव के हृदय में आनंद भरने वाली, कामदेव को पुनर्जीवित करने वाले सौंदर्य से युक्त, कावेरी नदी के मध्य में विराजमान, चंपक, अशोक, चंदन आदि वृक्षों से घिरी हुई और ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र आदि देवों द्वारा पूजित देवी! आपकी जय हो।
श्लोक 2
मैं उन भगवती की वंदना करता हूँ जो समस्त लोकों की रक्षा करती हैं, जिनके चरणकमल देवगणों द्वारा पूजित हैं, जिनकी जंघाएँ केले के वृक्ष के समान सुंदर हैं, जिनकी नाभि गहरी, कमर पतली, वक्षस्थल पुष्ट है, जो हाथों में वर और अभय मुद्रा धारण किए हुए हैं, जिनका कंठ मंगलसूत्र से सुशोभित है, जिनका मुख चंद्रमा के समान प्रदीप्त है तथा जो मोती की नथ और अमूल्य आभूषणों से सुसज्जित हैं।
श्लोक 3
हे वेद और योगियों के मन द्वारा भी अप्राप्य परमानंदस्वरूपिणी माँ! आपकी कृपा पाने वाले कभी भयभीत नहीं होते। आपके ही भय से वायु चलती है, सूर्य और अग्नि प्रज्वलित होते हैं, तथा शेषनाग पृथ्वी को धारण करते हैं। हे देवी, मुझे सदैव सत्पथ पर चलने की बुद्धि प्रदान करें और मेरे समस्त पापों का नाश करें।
श्लोक 4
जो आपके चरणकमलों की सेवा करता है, राजागण भी उसका सम्मान करते हैं। उसके घर में लक्ष्मी और जिह्वा पर सरस्वती का वास होता है। हे अखिलांडेश्वरी! आपकी कृपा मिलने के बाद संसार में क्या दुर्लभ है? मैंने एक अज्ञानी बालक की भांति यह स्तुति प्रारंभ की है, मेरी भूलों को क्षमा कर मुझ दीन-दुखी की रक्षा करें।
श्लोक 5
शिव सूर्य दीक्षित गुरु के पुत्र भास्कर द्वारा रचित यह अखिलांडेश्वरी दंडक स्तोत्र सभी को सदैव आनंद प्रदान करे।
श्लोक 6
इस प्रकार कवि भास्कर द्वारा रचित श्री अखिलांडेश्वरी दंडक समाप्त होता है।
श्लोक 7
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र 'अखिलाण्डनायिका दण्डक' के नाम से प्रसिद्ध है और इसके रचयिता भास्कर कवि हैं, जो शिवसूर्य दीक्षित गुरु के पुत्र थे। इसकी रचना संस्कृत भाषा में दण्डक छंद में की गई है, जो एक लंबी और लयबद्ध पद्य शैली है। यह स्तोत्र प्रमुख रूप से शाक्त परंपरा में देवी की उपासना के लिए प्रयोग किया जाता है और इसे प्रार्थना व ध्यान के समय गाया या पढ़ा जाता है।
क्या आप जानते हैं?
रचयिता और रचना
इस दण्डक के रचयिता भास्कर कवि हैं, जो शिवसूर्यदीक्षित गुरु के पुत्र थे। यह कृति अखिलाण्डनायिका (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की स्वामिनी) की स्तुति में रची गई है।
काव्य-रूप
'दण्डक' एक विशिष्ट संस्कृत काव्य-शैली है जिसमें लम्बे समास और नियमित लय होती है। इसे पढ़ने में एक लयबद्ध प्रवाह होता है, और इसमें अलंकारों की भरमार होती है।
विषय-वस्तु और चित्रण
इन छह श्लोकों में देवी के सौन्दर्य, आभूषणों, और शक्तियों का अत्यंत सुंदर वर्णन है। उदाहरण के लिए, प्रथम श्लोक में देवी के कदम्ब-पुष्पों से सजे कर्णफूल, वीणा की ध्वनि और हाथ पर शारिका (मैना) का उल्लेख है।
दार्शनिक महत्व
देवी को सच्चिदानन्द स्वरूप और शिव की शक्ति बताया गया है। चौथे श्लोक में कहा गया है कि उनकी कृपा से ही सब कुछ चलता है, और वे भक्तों को बुद्धि प्रदान करती हैं।
स्तोत्र का समापन
पाँचवें श्लोक में कवि अपनी त्रुटियों के लिए विनम्र क्षमा-याचना करता है। छठे श्लोक में बताया गया है कि इस दण्डक की रचना भास्कर कवि ने की है और यह देवी को प्रसन्न करने के लिए रची गई है।
Devi
हिन्दू धर्म से और
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एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
