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Embroidered artwork for गायत्री मन्त्र: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

गायत्री मन्त्र

गायत्री मन्त्र

गायत्री मन्त्र, ऋग्वेद ३.६२.१०: सविता, अर्थात् सूर्य के दिव्य तेज, से हमारी बुद्धि को प्रेरित और प्रकाशित करने की प्रार्थना।

श्लोक

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
Om Bhur Bhuvah Swaha Tat Savitur Varenyam Bhargo Devasya Dheemahi Dhiyo Yo Nah Prachodayat

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

रविवार

उत्तम मुहूर्त / समय

सूर्योदय काल एवं ब्रह्म मुहूर्त

पूजन सामग्री व अर्पण

तांबे के पात्र से जल अर्घ्य, लाल पुष्प (गुड़हल), लाल चंदन एवं अक्षत

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • आरोग्य, शारीरिक ऊर्जा एवं नेत्र ज्योति में वृद्धि
  • सूर्य दोष की शांति, यश, कीर्ति एवं कार्यक्षेत्र में सफलता

पृष्ठभूमि

गायत्री मन्त्र ऋग्वेद का एक ही मन्त्र है: मण्डल ३, सूक्त ६२, मन्त्र १० (३.६२.१०)। परम्परा इस सूक्त का द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र को मानती है। इसके देवता सविता हैं, अर्थात् प्रेरणा देने वाले दिव्य सूर्य, वह शक्ति जो प्रत्येक प्रभात में संसार और मन को गतिमान करती है। मन्त्र गायत्री छन्द में है, जिसमें आठ-आठ अक्षरों की तीन पंक्तियाँ होती हैं, और इसी से मन्त्र को अपना नाम मिला। ऋग्वेद में यह मन्त्र अकेला है, और उसी सूक्त के मन्त्र ११ और १२ आगे सविता की स्तुति करते हैं। जप के लिए इसके पहले ॐ और तीन व्याहृतियाँ, भूः, भुवः और स्वः, लगाई जाती हैं, जैसा इस पृष्ठ पर है। हिन्दू परिवार इसका पाठ सन्ध्या में, अर्थात् प्रातः, मध्याह्न और सायं की प्रार्थना में, करते हैं, और परम्परा में उपनयन संस्कार में बालक को सबसे पहले यही मन्त्र सिखाया जाता है। यह निर्मल बुद्धि की प्रार्थना है, और इसमें कुछ और नहीं माँगा गया।

कथा और महिमा

चौबीस अक्षरों के गायत्री छंद में रचित और ऋग्वेद 3.62.10 से लिया गया यह मंत्र सविता के तेज का आह्वान करता है, जो उच्च बुद्धि को जागृत करे।

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क्या आप जानते हैं?

शब्द-शब्द अर्थ

'तत् सवितुर्वरेण्यम्' का अर्थ है उस श्रेष्ठ (सविता) का, और 'भर्गो देवस्य' का अर्थ है देव का तेज। 'धीमहि' का अर्थ है हम ध्यान करते हैं। अन्तिम पंक्ति में 'धियो' हमारी बुद्धि या विचार हैं, और 'यो नः प्रचोदयात्' प्रार्थना है कि वे उन्हें प्रेरित और मार्गदर्शित करें।

प्रेरक सविता

'सविता' नाम 'सू' धातु से बना है, जिसका अर्थ है गति देना। प्रार्थना धन या विजय नहीं माँगती। वह माँगती है कि जो प्रकाश संसार को जगाता है, वही हमारी बुद्धि को भी जगाए।

चौबीस अक्षर

तीनों पंक्तियों में आठ-आठ अक्षर हैं, यदि 'वरेण्यम्' को उसके प्राचीन चार अक्षरों के मान से पढ़ा जाए। गायत्री छन्द से ही मन्त्र को नाम मिला है, और यह सबसे प्राचीन वैदिक छन्दों में से एक है।

ॐ और व्याहृतियाँ

ऋग्वेद का मन्त्र 'तत् सवितुः' से आरम्भ होता है। 'ॐ भूर्भुवः स्वः' जप में जोड़ा जाता है, और इन तीन शब्दों की परम्परागत व्याख्या पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग है।

उपनयन का पहला मन्त्र

उपनयन में आचार्य बालक के कान में गायत्री सबसे पहले कहते हैं। परम्परागत घरों में इसका पाठ दिन की तीनों सन्ध्याओं में होता है, और इसे प्रायः वेदमाता कहा जाता है।

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