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Embroidered artwork for माण्डूक्योपनिषद्: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

माण्डूक्योपनिषद्

माण्डूक्योपनिषद् (अथर्ववेद): ओंकार, चेतना की तीन अवस्थाओं और मौन चतुर्थ अवस्था तुरीय पर बारह मंत्र।

श्लोक

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः भद्रं नो अपि वातय मनः ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

श्लोक 1

हरिः ॐ ओमित्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव

श्लोक 1

सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात्

श्लोक 2

जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः

श्लोक 3

स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः

श्लोक 4

यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम् सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः

श्लोक 5

एष सर्वेश्वरः एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्

श्लोक 6

नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः

श्लोक 7

सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति

श्लोक 8

जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽऽप्तेरादिमत्त्वाद् वाऽऽप्नोति ह वै सर्वान् कामानादिश्च भवति य एवं वेद

श्लोक 9

स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षाद् उभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद

श्लोक 10

सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदꣳ सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद

श्लोक 11

अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद

श्लोक 12

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

फलश्रुति
शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभफलश्रुति
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

मुक्तिकोपनिषद् में भगवान श्रीराम हनुमान जी से कहते हैं—'मुमुक्षुओं को मोक्ष प्राप्ति के लिए केवल माण्डूक्योपनिषद् ही पर्याप्त है' (माण्डूक्यमेकमेवालं मुमुक्षूणां विमुक्तये)। आचार्य गौड़पाद ने इसी उपनिषद् पर अपनी अमर 'माण्डूक्यकारिका' लिखकर अद्वैत दर्शन की सुदृढ़ आधारशिला रखी थी। स्थान-निर्देश: अथर्ववेद-परम्परा; मुक्तिका-क्रम की १०८ उपनिषदों में छठी; एक ही अध्याय (अध्याय १) में बारह मंत्र (मंत्र १–१२), जिनसे पहले यहाँ शान्तिपाठ दिया गया है। आगे के मंत्र-क्रमांक (तुरीय पर मंत्र ७, मौन अमात्र ओंकार पर मंत्र १२) परम्परागत गणना के हैं। गौड़पाद की चार प्रकरणों वाली कारिका अलग ग्रन्थ है और इन श्लोकों में सम्मिलित नहीं।

क्या आप जानते हैं?

'माण्डूक्यमेकमेवालम्' की महत्ता

मुक्तिकोपनिषद् में भगवान श्रीराम स्पष्ट कहते हैं कि मोक्ष के अभिलाषी साधकों के लिए केवल माण्डूक्योपनिषद् का सम्यक् ज्ञान ही भवबंधन काटने के लिए पूर्ण रूप से समर्थ है।

ओंकार (अ-उ-म) का त्रिविध स्वरूप

ओंकार के तीन वर्ण मानव चेतना के तीन स्तरों को प्रकट करते हैं: 'अ' स्थूल जाग्रत संसार (वैश्वानर) का, 'उ' सूक्ष्म स्वप्न लोक (तैजस) का, और 'म' कारण सुषुप्ति (प्राज्ञ) का प्रतीक है।

अमात्र और शांत तुरीय (मंत्र १२)

ओंकार का वास्तविक रहस्य उच्चारण के बाद का मौन (अमात्र) है—वह शांत और निराकार पृष्ठभूमि, जिस पर समस्त ध्वनियां और विचार उत्पन्न होकर विलीन हो जाते हैं; यही तुरीय अवस्था है।

तुरीय की 'नेति-नेति' मीमांसा (मंत्र ७)

मंत्र ७ विश्व दर्शन में अद्वैत चेतना की सर्वोच्च व्याख्या है, जहाँ विशुद्ध आत्मा को 'नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं...' कहकर समस्त सांसारिक द्वैत और सीमाओं से परे सिद्ध किया गया है।

गौड़पादाचार्य का 'अजातिवाद'

माण्डूक्योपनिषद् पर आधारित गौड़पाद की 'माण्डूक्यकारिका' ने अद्वैत दर्शन में 'अजातिवाद' की स्थापना की—अर्थात् परम सत्य में कभी कोई उत्पत्ति या विकार हुआ ही नहीं; केवल अखंड आत्म-चेतना ही सत्य है।

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