सृष्टि का मूल स्पंदन, मांडूक्य उपनिषद् और तुरीय अवस्था का रहस्य
शुद्ध चेतना, आत्म-साक्षात्कार एवं परमानंद की अवस्था
दिव्य ज्योति की शाश्वत चिनगारी
वेदांत का सर्वोच्च, अनंत सत्य
ईशावास्योपनिषद्, यजुर्वेद ४०: अठारह मन्त्र, जो सब में ईश्वर को देखना, त्याग से भोग करना और ज्ञान को कर्म के साथ जोड़ना सिखाते हैं।
माण्डूक्योपनिषद् (अथर्ववेद): ओंकार, चेतना की तीन अवस्थाओं और मौन चतुर्थ अवस्था तुरीय पर बारह मंत्र।