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Embroidered artwork for आदित्यहृदयस्तोत्रम्: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

आदित्यहृदयस्तोत्रम्

आदित्यहृदयस्तोत्रम् वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड (१०५वें सर्ग) में वर्णित ३१ श्लोकों का परम पावन सूर्य स्तोत्र है। जब रावण के विरुद्ध भीषण युद्ध में भगवान श्रीराम थककर चिंतामग्न खड़े थे, तब महर्षि अगस्त्य ने उन्हें समस्त देवताओं के आत्मा, जगन्नेत्र और पाप-ताप नाशक भगवान सूर्य की यह आराधना सिखाई थी, जिसके जप से श्रीराम ने रावण का वध कर धर्म की विजय स्थापित की।

श्लोक

ॐ अस्य श्रीआदित्यहृदयस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीअगस्त्य ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीआदित्यहृदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता ॐ बीजम् रश्मिमत इति शक्तिः ॐ तत्सवितुरित्यादिगायत्री कीलकम् सर्वशत्रुजयसिद्धये जपे विनियोगः

श्लोक 1

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् १ दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवानृषिः

श्लोक 2

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् येन सर्वानरीन्वत्स समरे विजयिष्यसि

श्लोक 3

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम्

श्लोक 4

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्

श्लोक 5

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्

श्लोक 6

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः एष देवासुरगणांल्लोकान् पाति गभस्तिभिः

श्लोक 7

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः

श्लोक 8

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः

श्लोक 9

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः

श्लोक 10

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान्

श्लोक 11

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः

श्लोक 12

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः

श्लोक 13

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः

श्लोक 14

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते

श्लोक 15

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः

श्लोक 16

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः

श्लोक 17

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः

श्लोक 18

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः

श्लोक 19

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः

श्लोक 20

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे

श्लोक 21

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः

श्लोक 22

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्

श्लोक 23

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः

श्लोक 24

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावासीदति राघव

श्लोक 25

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि

श्लोक 26

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम्

श्लोक 27

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्

श्लोक 28

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान् त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्

श्लोक 29

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धायाभ्युपागमत् सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्

श्लोक 30

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति

श्लोक 31

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

फलश्रुति
शुभ दिन व तिथि

रविवार

उत्तम मुहूर्त / समय

सूर्योदय काल एवं ब्रह्म मुहूर्त

पूजन सामग्री व अर्पण

तांबे के पात्र से जल अर्घ्य, लाल पुष्प (गुड़हल), लाल चंदन एवं अक्षत

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभफलश्रुति
  • आरोग्य, शारीरिक ऊर्जा एवं नेत्र ज्योति में वृद्धि
  • सूर्य दोष की शांति, यश, कीर्ति एवं कार्यक्षेत्र में सफलता

पृष्ठभूमि

वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में वर्णित यह स्तोत्र सूर्योपासना का परम शिरोमणि ग्रंथ है। प्रातःकाल पूर्व दिशा की ओर मुख करके इसका पाठ करने से हृदय में अद्भुत ऊर्जा का संचार होता है, नेत्र ज्योति बढ़ती है, अवसाद नष्ट होता है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

क्या आप जानते हैं?

'सर्वदेवात्मको ह्येष' का दार्शनिक रहस्य (श्लोक ७)

महर्षि अगस्त्य स्पष्ट करते हैं कि सूर्य केवल एक भौतिक तारा नहीं, अपितु 'सर्वदेवात्मक' हैं—समस्त देवताओं की समष्टि चेतना हैं, जिनकी रश्मियां संपूर्ण ब्रह्मांड को जीवन देती हैं।

सर्वेश्वरवाद का समन्वय (श्लोक ८)

श्लोक ८ में सूर्य को ही ब्रह्मा (सृष्टि), विष्णु (पालन), शिव (संहार), स्कंद और इंद्र के रूप में वर्णित किया गया है, जो यह सिद्ध करता है कि समस्त ईश्वर-स्वरूप एक ही दिव्य ज्योति के रूप हैं।

'द्वादशात्मा' बारह आदित्य (श्लोक १५)

श्लोक १५ में सूर्यदेव को 'द्वादशात्मा' कहा गया है, जो वर्ष के बारह मासों और बारह राशियों का नियमन करने वाले बारह आदित्यों (धाता, मित्र, अर्यमा, पूषा आदि) के द्योतक हैं।

श्रीराम की 'चिंता' का मानवीय पक्ष (श्लोक १)

श्लोक १ में युद्धभूमि में श्रीराम के 'चिन्ताया स्थितम्' (विचारमग्न होने) का वर्णन यह सिखाता है कि भीषण संघर्ष में महानायकों को भी आत्म-संयम और ऊर्जा के नवीनीकरण के लिए मूल स्रोत की शरण लेनी पड़ती है।

'हिरण्यरेता' नाम (श्लोक १०)

श्लोक १० में सूर्य के नामों की शृंखला में आदित्य, सविता, सूर्य, पूषा, भानु और दिवाकर के साथ उन्हें 'हिरण्यरेता' (स्वर्णिम बीज) कहा गया है, जो उन्हें जीवन और प्रकाश का स्रोत बताता है।

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