ष्रि ःअनुमत्स्तव
यह एक भक्ति स्तोत्र है जिसमें भगवान हनुमान के पराक्रम, रामभक्ति, ज्ञान और आशीर्वाद का वर्णन है। इसे सद्गुरु श्री त्यागराज स्वामी की शिष्या पुष्पा ने रचा है।
श्लोक
ॐ। श्री राम की जय हो। ॐ सद्गुरु श्री त्यागराज स्वामी को बारंबार नमस्कार है। ॐ, हम आंजनेय (हनुमान) को जानें। हम रामदूत का ध्यान करें। वे हमें सत्कर्मों की ओर प्रेरित करें।
श्लोक 1
मैं पवनपुत्र, वीर, अत्यंत बलवान, बल प्रदान करने वाले, समुद्र लांघने वाले, विशालकाय हनुमान को नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 2
मैं अतुलनीय प्रभाव वाले उन आंजनेय को नमस्कार करता हूँ, जो अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ, आरोग्य तथा बुद्धि प्रदान करते हैं।
श्लोक 3
मैं उन पवनपुत्र को नमस्कार करता हूँ, जो महान भक्तों में अग्रगण्य हैं, हाथ जोड़कर प्रार्थना करने में श्रेष्ठ हैं, और उत्कृष्ट राग तथा लय के यज्ञ को जानने वाले हैं।
श्लोक 4
मैं उन मारुति को नमस्कार करता हूँ, जो रामभक्ति के आनंद में निमग्न हैं, भक्ति सागर को पार करने वाले हैं और नाम-ध्यान द्वारा समाधि में स्थित हैं।
श्लोक 5
मैं उन महावीर को नमस्कार करता हूँ, जो सीता और राम के अत्यंत प्रिय हैं, सीता के हृदय के दुख को शांत करने वाले हैं, और सीता-राम के प्रति परम निष्ठावान हैं।
श्लोक 6
मैं उन पवनपुत्र को नमस्कार करता हूँ, जो वाक्-चातुर्य में निपुण हैं, प्रखर बुद्धि वाले हैं, तथा वाणी, शब्द और स्वर में मधुरता रखने वाले हैं।
श्लोक 7
मैं उन वायुपुत्र को नमस्कार करता हूँ, जो गीत के मधुर स्वर में आनंद लेते हैं, जिनका गला आनंद के आंसुओं से रुँध जाता है, और जो अत्यंत मधुर गाते हैं।
श्लोक 8
मैं उन रामभक्त को नमस्कार करता हूँ, जो रामनाम रूपी फल का सेवन करते हैं, नाम-संकीर्तन में तल्लीन रहते हैं और त्यागराज की कृतियों से प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 9
मैं उन वंदनीय हनुमान को नमस्कार करता हूँ, जो नौ व्याकरणों के ज्ञाता हैं, तत्वज्ञान के पंडित हैं, और इन नौ स्तुतियों में सदा उपस्थित रहते हैं।
श्लोक 10
मैं उन प्रभु को नमस्कार करता हूँ, जो गुरु श्री त्यागराज स्वामी की शिष्या पुष्पा पर कृपा करते हैं, कष्टों का निवारण करते हैं और समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं।
श्लोक 11
मैं उन हनुमान को नमस्कार करता हूँ, जो वानरों में श्रेष्ठ रत्न हैं, रामभक्ति रूपी रस के सागर हैं, श्लोक और संगीत की प्रेरणा देने वाले हैं, तथा परमानंद एवं मंगल स्वरूप हैं।
श्लोक 12
रामदूत का मंगल हो, कपीश (वानरराज) का परम मंगल हो। भक्तिपूर्वक वंदनीय आंजनेय का मंगल हो।
श्लोक 13
इस प्रकार सद्गुरु श्री त्यागराज स्वामी की शिष्या एवं भक्ता पुष्पा द्वारा रचित यह स्तुति समाप्त होती है।
श्लोक 14
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
मंगलवार एवं शनिवार
प्रातःकाल अथवा संध्या समय
सिंदूर, चमेली का तेल, तुलसी माला, बूंदी/लड्डू एवं पान का बीड़ा
- अपार बल, साहस, भयमुक्ति एवं नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र भगवान हनुमान की स्तुति में रचा गया है। इसे सद्गुरु श्री त्यागराज स्वामी की शिष्या पुष्पा ने लिखा है। यह भक्ति परंपरा का एक अंग है और प्रायः हनुमान जी की कृपा, बल, बुद्धि तथा रामभक्ति की महिमा का गुणगान करने के लिए पढ़ा जाता है। इसका पाठ संकटों के निवारण और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है।
क्या आप जानते हैं?
रचयिता
यह स्तोत्र सद्गुरु श्री त्यागराज स्वामी की शिष्या पुष्पा द्वारा रचित है। अंतिम श्लोक में 'त्यागराजगुरुस्वामिशिष्यापुष्पा' का स्पष्ट उल्लेख है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि यह एक भक्त महिला की रचना है।
हनुमान गायत्री
प्रारंभ में 'ॐ आञ्जनेयाय विद्महे, रामदूताय धीमहि, तन्नो यजः प्रचोदयात्' मंत्र है, जो हनुमान की गायत्री है। यह गायत्री मंत्र की तर्ज पर रचित है और हनुमान को आंजनेय (अंजनी पुत्र) और रामदूत (राम के दूत) के रूप में संबोधित करता है।
अष्टसिद्धियों का वरदान
दूसरे श्लोक में हनुमान को 'अणिमाद्यष्टसिद्धिं च आरोग्यबुद्धिदायिनम्' कहा गया है, अर्थात वे अणिमा आदि आठ सिद्धियों के दाता हैं और आरोग्य तथा बुद्धि प्रदान करते हैं। यह हनुमान के योगिक और तांत्रिक महत्व को दर्शाता है।
संगीत और काव्य में निपुण
सातवें श्लोक में हनुमान को 'गीतसुस्वरसानन्दं आनन्दबाष्पकण्ठिनम्' कहा गया है, जो दर्शाता है कि वे मधुर गीत गाते हैं और आनंद के आंसुओं से उनका कंठ भर जाता है। यह हनुमान को एक कलाप्रेमी और संगीतज्ञ के रूप में चित्रित करता है।
नव व्याकरणों का ज्ञान
नौवें श्लोक में 'नवव्याकरणाभिज्ञं' कहकर हनुमान को नौ व्याकरणों का ज्ञाता बताया गया है। यह संस्कृत व्याकरण की विभिन्न शाखाओं (जैसे पाणिनि, कातंत्र आदि) में उनकी पारंगतता को इंगित करता है, जो उनकी विद्वता को रेखांकित करता है।
Hanuman
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