हनुमान बाहुक (श्री हनुमान जी की पीड़ा-निवारक स्तुति)
यह गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित एक शक्तिशाली स्तुति है, जिसमें वे अपनी असहनीय बांह की पीड़ा से मुक्ति के लिए हनुमान जी से प्रार्थना करते हैं और उनकी वीरता, करुणा और शक्ति का वर्णन करते हैं।
श्लोक
समुद्र पार करने वाले, सीता की चिंता हरने वाले, सूर्य के समान बालक-सदृश शरीर वाले, विशाल भुजाओं वाले, भयानक मूर्ति में काल के भी काल प्रतीत होने वाले।
श्लोक 1
गहन वन को जलाने वाले, निःसंकोच लंका को जलाने वाले, टेढ़ी भुजाओं वाले राक्षसों के बल और अहंकार का दमन करने वाले पवनपुत्र।
श्लोक 2
तुलसीदास कहते हैं कि सेवकों के लिए सुलभ, सेवक के हित में सदा निकट रहने वाले, गुणों का गान करने, नमस्कार करने, स्मरण करने, जप करने वाले के सब कठिन संकटों का शमन करने वाले।
श्लोक 3
सोने के पर्वत के समान कांति वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तीव्र तेज वाले, घन शरीर वाले, विशाल वक्ष वाले, प्रचंड भुजदंड वाले, वज्र के समान कठोर नख वाले।
श्लोक 4
पिंगल नेत्र वाले, टेढ़ी भौंह वाले, भयानक जीभ और दाँतों वाले मुख वाले, बंदर के समान केश वाले, कठोर लंगूर वाले, दुष्टों के दल के बल क नाश करने वाले।
श्लोक 5
तुलसीदास कहते ह क जिसके हृदय म पवनपुतर क विकट मूरति बसती ह, उस पुरुष क पास सताप और पाप सवप्न म भी नही आते।
श्लोक 6
पंचमुख, षण्मुख, भृंगी आदि प्रमुख योद्धा, असुर और देवता, सबको युद्ध में सामना करने में समर्थ वीर।
श्लोक 7
विकट वीर, कीर्ति-पदावली का बखान करने वाले, वेद और बंदीजन जिनकी प्रतिज्ञा पूर्ण होने का वर्णन करते हैं।
श्लोक 8
जिनके गुणों को रघुनाथ कहते हैं, जिनके बल से विपुल जल से भरा संसार-समुद्र झूर जाता है।
श्लोक 9
दोनों दलों का दमन करने वाले कौन हैं? तुलसी कहते हैं – पवनपुत्र, जो उत्तम राजपुत वीर ह।
श्लोक 10
हनुमान सूर्य क पास पढने गए, सूर्य ने मन में अनुमान लगाकर बाल-क्रीड़ा से फेर-फार किया।
श्लोक 11
पिछले पगन (पैरो) स आकाश म गमन करने वाले, मन मग्न हुए, क्रम में भ्रम नहीं हुआ, यह कपि की बाल-क्रीड़ा है।
श्लोक 12
इस कौतुक को देखकर लोकपाल, हरि, हर, ब्रह्मा – सबकी आँखों में चकाचौंध हो गई, चित्तों में भारी आश्चर्य हुआ।
श्लोक 13
यह बल क्या वीर-रस का, क्या धीरज का, क्या साहस का? तुलसी कहते हैं – यह सबका सार शरीर धारण किये हुए है।
श्लोक 14
महाभारत म अजुण क रथ पर कपिराज हनुमान ने ध्वजा बनकर गर्जना की, सुनकर कौरवराज का दल हलचल मचा बैठा।
श्लोक 15
द्रोण और भीष्म ने कहा कि समीरपुत्र महावीर हैं, जिनका बल वीर-रस के जल-निधि के समान है।
श्लोक 16
बंदर का स्वभाव – बाल-क्रीड़ा में भूमि और सूर्य के लिए छलाँग लगाना, फिर भी आकाश-तल से कम नहीं हुए।
श्लोक 17
सिर नवाकर, हाथ जोड़कर सब योद्धा देखते हैं – हनुमान को देखना जगजीवन का फल है।
श्लोक 18
समुद्र को गाय के खुर के चिह्न जैसा बनाकर, होलिका की तरह लंका में आग लगाई, अत्यंत निडर होकर पर-पुर में हलचल मचा दी।
श्लोक 19
द्रोण नामक पर्वत को खेल ही खेल में उखाड़कर, गेंद की तरह कपि ने खेल दिखाया, फल की तरह वह गिरा।
श्लोक 20
संकटों का समाज और असमंजस हुआ रामराज में, परंतु वह कार्य जो युगों का था, पलभर में करतलगत हो गया।
श्लोक 21
साहसी और समर्थ, तुलसी के स्वामी, जिनकी बाँह है, लोकपालों के पालन के लिए फिर से स्थिर भूमि हुई।
श्लोक 22
जैसे कछुए की पीठ पर पैरों की गाड़ लगाकर, नापकर पात्र भरकर समुद्र का सारा जल भर लिया।
श्लोक 23
राक्षसों के दमन के लिए वे दुर्ग बन गए, बड़ी मछली के वासस्थान और छोटी मछलियों के थल के समान।
श्लोक 24
कुंभकर्ण, रावण और मेघनाद जैसे ईंधन के लिए तुलसी का प्रताप उनका प्रबल अनल बन गया।
श्लोक 25
भीष्म कहते हैं – मेरे अनुमान में हनुमान के समान तीनों कालों और तीनों लोकों में महाबल वाला और कोई नहीं।
श्लोक 26
हे राम के दूत, हे पवन के सुपुत्र, हे अंजनीनंदन, तुम्हारा प्रताप अत्यंत सूर्य के समान है।
श्लोक 27
सीता की चिंता का नाश करने वाले, पाप-दोष का दमन करने वाले, शरण आये हुए अवनि की रक्षा करने वाले, लखन के प्राणों के समान प्रिय।
श्लोक 28
दशमुख रावण के दुःसह दरिद्र को दर करने के लिए ये प्रकट हुए – तीनों लोकों की एकमात्र आश्रय, तुलसी के अनुसार वह निधान है।
श्लोक 29
ज्ञानी, गुणी, बलवान, सेवा में सावधान, सुजान स्वामी – हृदय में ऐसे हनुमान को धारण करो।
श्लोक 30
दहन करने वाले, दोनों दलों का दमन करने वाले, भुवन में विदित बल वाले, वेद जिनका यश गाते हैं, और देव बंदियों को छुड़ाने वाले।
श्लोक 31
पाप, ताप और तिमिर तथा तुहिन के विघटन में प्रवीण, सेवक रुपी कमल के लिए सुखदायक प्रभातकालीन सूर्य के समान।
श्लोक 32
लोक और परलोक में शोक नहीं, स्वप्न में भी शोक नहीं – तुलसी के हृदय में एक ही ओर (हनुमान) का भरोसा है।
श्लोक 33
राम के प्यारे दास, बामदेव का निवास, और उनका नाम कलियुग में कल्पवृक्ष के समान है – केसरी-नंदन का।
श्लोक 34
महाबल की सीमा, महाभीम, महा-यशस्वी, महावीर – ये रघुवीर के द्वारा चुने गए हैं।
श्लोक 35
वज्र से भी कठोर शरीर वाले, रण में जोर से गरजने वाले, करुणा-युक्त मन वाले, धार्मिक और धीर।
श्लोक 36
दुर्जन के लिए काल के समान भयंकर, सज्जन के लिए पालक, और स्मरण करने पर तुलसी की पीर का हरण करने वाले।
श्लोक 37
सीता को सुख देने वाले, रघुनायक के प्यारे, सेवकों के सहायक, साहसी पवनपुत्र।
श्लोक 38
जैसे सृजन के लिए ब्रह्मा, पालन के लिए हरि, संहार के लिए हर, और जीवित करने के लिए अमृतपान।
श्लोक 39
धारण करने के लिए पृथ्वी, अंधकार दूर करने के लिए सूर्य, सुखाने के लिए अग्नि, और पोषण के लिए चंद्रमा।
श्लोक 40
दुर्जनों को दुःख देने के लिए, भक्तों को संतोष देने के लिए, और मलीनता को माँग लेने के लिए उत्तम मोदक के समान।
श्लोक 41
आर्त की आर्ति को निवारण करने के लिए तीनों पुरों में – तुलसी का स्वामी हठीला हनुमान है।
श्लोक 42
सेवक को शरण जानकर जानकी तक को (राम) का लज्जित मानना पड़े, शूलपाणि भी अनुकूल होकर नतमस्तक होते हैं।
श्लोक 43
देवी-देव-दानव दयालु होकर हाथ जोड़ते हैं, फिर बेचारे राजा-रंक की तो क्या बात?
श्लोक 44
जागते, सोते, बैठे, बोलते – सभी अवस्थाओं में उनके हर्ष-विषाद-राग-द्वेष; जो कोई उनके विरुद्ध अनर्थ करे, वह एक आँक (पल) में समर्थ है।
श्लोक 45
सब दिन अच्छा बीते और वह जहाँ-तहाँ फले-फूले, जिसके हृदय में हनुमान की हाँक का भरोसा है।
श्लोक 46
उसके लिए शिव और शूलपाणि अनुकूल हैं, सब लोकपाल, लक्ष्मण, राम, जानकी भी अनुकूल हैं।
श्लोक 47
लोक और परलोक का शोक तीनों लोक म दूर – तुलसी कहते हैं – दूसरे किसी वीर की चाह क्या?
श्लोक 48
केसरी-नंदन बंदीछोर के प्रसाद से सब सिद्ध होते हैं। कपि की निर्मल कीर्ति और करुणा का भंडार है।
श्लोक 49
जैसे कृपालु मुनि-सिद्ध बालक को पालते हैं, वैसे ही वे उसकी रक्षा करते हैं जिसके हृदय में हनुमान की हाँक हुलसती है।
श्लोक 50
करुणा के निधान, बल-बुद्धि के निधान, आनंद-महिमा के निधान, गुण-ज्ञान के निधान हो।
श्लोक 51
बामदेव-रूप हो, राजा राम के स्नेही हो, नाम लेते-देते अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष (चारों पुरुषार्थ) हो।
श्लोक 52
अपने प्रभाव से, सीतानाथ के सुभाव-शील से, और लोक-वेद-विधि के विद्वान हनुमान हो।
श्लोक 53
मन से, वचन से और कर्म से – तीनों प्रकार से – तुलसी तुम्हारा है, हे सुजान स्वामी।
श्लोक 54
मन से अगम, शरीर से सुगम किये कपीश ने – महाराज के कार्य के लिए समाज और साज सजाए हैं।
श्लोक 55
देवों के बंदीछोड़ने वाले, रण में गरजने वाले, केसरी-नंदन, युग-युग जगत में तेरी कीर्ति विराजमान है।
श्लोक 56
वीर बड़े जोर के हो, तुलसी की ओर ज़रा भी जोर लगाओ तो सुनकर साधु सकुचाते हैं, दुष्ट गण गाजते हैं।
श्लोक 57
हे अंजनीकुमार, तुलसी की बिगड़ी बना दो – जैसे आपके प्रसाद से होता आया है।
श्लोक 58
हे हनुमान! सदा जनों के मन में वास करने वाले शिरोमणि हो। मैं किसका बिगाड़ या सँवार सकता हूँ? किस कारण तुम मुझसे खीझते हो? मैं तो तुम्हारा हूँ।
श्लोक 59
स्वामी-सेवक के नाते मैंने तुमसे हाथ जोड़ा – वहाँ तुलसी का कोई उपाय नहीं। दोष बता देने से आगे के लिए होशियार हो जाऊँगा, मगर मन तो हारा हुआ है।
श्लोक 60
जिसे तुमने स्थापित किया, उसे महेश भी नहीं उठा सकता। तुम्हारे पाले हुए गरीबनिवाज शत्रुओं के हृदय में शूल की तरह चुभते हैं।
श्लोक 61
तुलसी कहते हैं – संकट और शोच सब नाम लेते ही मकड़ी के जाले की तरह फट जाते हैं। बूढ़े हो गए, बार-बार हाथ जोड़ते हैं, या हार कर बहुत झुक गए – फिर भी आपने पाला।
श्लोक 62
आपने समुद्र पार किया, बड़े-बड़े वीरों को दल दिया, लंका को जलाया जैसे टेढ़े वृक्ष को। रण में सिंह की तरह हैं, शत्रु-हाथी को चीर-फाड़ करने वाले छैल-छबीले।
श्लोक 63
आपके समान समर्थ स्वामी की सेवा करके तुलसी दुःख-दोष को दवानल की तरह सहन करता है? हे वानर! आपकी शक्ति बढ़ी है, दुष्ट-खेचरों को चिड़िया की तरह लपेट कर क्यों नहीं ले जाते?
श्लोक 64
आपने अक्ष का मर्दन किया, वन में आग लगाई, दशानन का मुख भी न देखा; मेघनाद, अकम्पन, कुंभकर्ण जैसे हाथी को सिंह ने मारा।
श्लोक 65
राम के प्रताप-रूपी हुताशन के लिए आप दहन-समीर हैं; पाप, शाप और तीनों तापों से तुलसी के लिए सदा रक्षक हैं।
श्लोक 66
जगत जानता है हनुमान के प्रसाद को। हे मन! अनुमान करके, हे बलि! बोल को मत भूलो।
श्लोक 67
सेवा के योग्य तुलसी से कभी चूक हुई हो, तो हे कपि! अपने स्वामी-सुलभाव को संभारो।
श्लोक 68
मुझे अपराधी जानकर हजारों प्रकार से दंड दीजिए, पर जो मोदक की तरह मरता है उसे कठोरता से मत मारिए।
श्लोक 69
हे साहसी पवनपुत्र, हे रघुवीर के दुलारे, मेरी बाँह की पीड़ा को महावीर जल्दी दूर कीजिए।
श्लोक 70
बालक को देखकर, हे बलि! आपने बच्चे की तरह अपना लिया। दीनबंधु ने बिना उपाधि के निराली दया की।
श्लोक 71
हे प्रभु! तुलसी का भरोसा आप पर है, आप ही का बल है, आशा आप ही से है, मुझे अपना दास ही समझिए।
श्लोक 72
कलि भयंकर है, किसे निहाल नहीं किया? हे बली! अपने पैर को माथे पर रखकर देखो, फिर उस पीड़ा का निवारण करो।
श्लोक 73
हे केसरी-नंदन! रण में गरजने वाले! प्रबल वीर! बाँह की पीड़ा को सिंहिका की तरह पछाडकर मार डालिये।
श्लोक 74
जो गिरे को उठाते और स्थापित करते हैं, और जो स्थापित को उठा सकते हैं – हे केसरी-कुमार! अपने बल को संभालें।
श्लोक 75
राम-दूत राम के गुलामों के लिए कल्पवृक्ष हैं। मुझ जैसे निर्धन का एकमात्र सहारा आप ही हैं।
श्लोक 76
हे स्वामी! आप समर्थ हैं – तुलसी के सिर पर आप ही हैं। यदि वह बिना अपराध क दुखी ह, तो हे वीर! बांधकर मार ही डालिए।
श्लोक 77
आपकी बाँह बड़ी पोखरी है, हे बलि! जलचर पीड़ा के लिए, मकड़ी की तरह पकड़कर उसका मुख विदार कर दीजिए।
श्लोक 78
राम का स्नेह, राम का साहस, लक्ष्मण, सीता, राम की भक्ति – ये सब शोक-संकट का निवारण करते हैं।
श्लोक 79
आनंद-मंगल, रोग-सागर को देखकर हार गए हैं – हे जीव! जाम्बवंत का भरोसा तुम पर अत्यधिक भारी है।
श्लोक 80
हे कृपालु हनुमान! तुलसी प्रेम-पर्वत से कूदना चाहता है, तो आप सुथल-सुबेल पर बैठकर विचार किजए।
श्लोक 81
हे महावीर बांकुरे! मेरी बांह क पीड़ा क यों नही लंकिनी क तरह लात-घात ही स मरोड़कर मार देत?
श्लोक 82
लोक और परलोक, तीनों लोक म आपक समान समरथ कोई दिखने म नही आत – चारों तरफ देिखए (विचार किजए)।
श्लोक 83
कर्म, काल, लोकपाल, अग (सब चर), जग (जीव), जीवजाल – हे नाथ! ये सब आपके हाथ में हैं – अपनी महिमा क विार कीिजए।
श्लोक 84
हे प्रभु! मैं आपका विशिष्ट दास हूं। मेरे हृदय म आपका वास है। तुलसी कहता है – मुझे दीन-देव को बुहत दुःखी देखा जाता है।
श्लोक 85
बाँह का शूल वृक्ष के मूल की तरह और कपीकछु क बेल क तरह उपजा है। हे कपि! इसे खेल-खेल म िखाड दीिजए।
श्लोक 86
कर्मरूरी भयानक कंस के भरोसेपर बैठी बकी बकभगिनी किसी से क्या डरेगी?
श्लोक 87
यह बड़ी भयानक बाल-घातिनी है, कही नहीं जा सकती। बाँहबल वाली छबीले और छोटे को भी छर दगी।
श्लोक 88
इसने (पीड़ा) सवयं बनावट-बेश बनाकर आई है, विचार कर देखो – यह सबका पाप दूर करके गुनी (हनुमान) के पाले में पड़ेगी।
श्लोक 89
हे कपि-नाथ! तुलसी की बाँह की पीड़ा को उसी प्रकार मारो जैसे पूतना पिशाचिनी को मारा – आपके मारने से वह मरेगी।
श्लोक 90
यह पीड़ा भाल की है? काल की है? क्रोध की है? त्रिदोष की है? यह भयानक वेदना पाप, ताप, और छल-छाँह की है।
श्लोक 91
कर्मों की कुटिलता से? या यंत्र-मंत्र-बूटी से? उस पापिनी को निकालो जो मन के मैल से उपन्न हुई है।
श्लोक 92
वह सजा पाएगी। मैं तुझे नम्र हाकर सच कहता हूँ – हे बावरी! तू कपिनाथ की वाणी को पहचानकर न हो (दूर हो जा)।
श्लोक 93
हनुमान की दुहाई, बलवान की दुहाई, महावीर की शपथ – जो बाँह की पीड़ा रहे।
श्लोक 94
सिंहिका को बलपूर्वक मारकर, सुरसा को छल से सुधारकर, लंकिनी को पछाड़कर और वाटिका को उजाड़कर आपने कठिनाइयों को हरा।
श्लोक 95
लंका को जलाकर, बार-बार मकड़ी को फाड़कर, राक्षस-दल को धूलि-धूसरित कर डाला है।
श्लोक 96
यमकातरी को तोड़कर, मंदोदरी को कठोरता से लाकर, रावण की रानी और मेघनाद की माता को भी वश में किया।
श्लोक 97
बाँह की पीड़ा के भार को महावीर ने निपट रखा – अब किसका संकोच और तुलसी क शोच का भारी बोझ कहाँ रहा?
श्लोक 98
हे वीर! आपक बालक्रीड़ा सुनकर धीर भी सहमत ह जात – इंद, सूय ओर राहु शरीर क सुध भूल बैठे।
श्लोक 99
आपकी बाँह में लोकपाल सब शोक-रहित होकर रहते हैं – आपका नाम लेते ही किसी की आर्ति नही रहती।
श्लोक 100
साम, दान, भेद, दंड – और वेद-वेदांत क सिधि – सब कपिनाथ के हाथ में है – चोर और साहु दोनों क चोटी (नियंत्रण)।
श्लोक 101
आलस, क्रोध और परिहास करके सिखाना है – पर इतने दिनों से तुलसी की बाँह की पीड़ा बनी हुई है।
श्लोक 102
टुकड़ों के लिये घर-घर कंगाल फिरता हुआ – हे कृपालु नतपाल! मुझे बालक की तरह पाल-पोष दीजिए।
श्लोक 103
अंजनीकुमार वीर! आपने (मेरी) सभांल कि है – आपने मेरा भरोसा नही छोडिगा।
श्लोक 104
आज तो सब प्रकार से समर्थ परीखा है – हे कपिराज! मैं सच कहता हूं – तीनों लोक म आपके समान कोइ नही।
श्लोक 105
दास को दंड सहन करना – परिहास के रुप में – जैसे चिरी का मरना बालकों का खेल है।
श्लोक 106
अपने ही पापों से, त्रिताप से या शाप से बांह की पीड़ा बढ़ी है, जो सही नही जाती।
श्लोक 107
अनेक औषध, जंर-मंर, टोटके आदि किये, देवता भी मनाए गए पर वे बाद हुए – यह पीड़ा अधिक बढ़ती है।
श्लोक 108
करतार (ब्रह्मा), भरतार (विष्णु), हरतार (शिव); कर्म और काल – इस जगजाल में ऐसा कौन ह जो इसकी (पीड़ा) क अवहेलना कर?
श्लोक 109
हे रामदूत! तुलसी तेरा चेरा है और तू मेरा कहलाता है। हे वीर! तेरी यह ढील मुझे पीड़ा से भी अधिक पीड़ित कर रही ह।
श्लोक 110
राम क दूत, पवन क सुपुत्र, समरथ हाथ-पांव वाल, असहाय के सहायक।
श्लोक 111
तेरी बांकी बीर-पदावली वेदों में गाई जाती है। रावण जैसा योद्धा मुट्ठी के प्रहार से मारा गया।
श्लोक 112
इतने बड़े समरथ सवामी क पसाद स – आज वचन, मन और काय स सव क सवक शोभित ह।
श्लोक 113
बा हुकी थोड़ी सी पीड़ा ने तुलसी क बड़ी गलानी (परेशानी) पैदा कर दी – यह कौन सा पाप? कौन सा क्रोध? या प्रगट प्रभा का लोप?
श्लोक 114
देवी-देव, दनुज, मनुज, मुनि, सिद्ध, नाग, छोटे-बड़े सब जीव – चेतन और अचेतन।
श्लोक 115
पूतना, पिशाची, राक्षसियाँ, राक्षस, वाम (बायें मार्ग वाले) – सब रामदूत की आज्ञा को माथे पर मानते हैं।
श्लोक 116
घोर यंत्र-मंत्र, कूट-कपट, कुरोग, योग – हनुमान की दुहाई सुनकर वे अपने निवास को छोड़ देते हैं।
श्लोक 117
क्रोध को (इस पीड़ा पर) कीजिए, तुलसी को प्रबोध दीजिए, और उन्हें शुद्ध/समाप्त कीजिए जो दोष-दुख देते हैं।
श्लोक 118
तेरे बल से वानरों ने रावण से रण जीता। तेरे ही प्रहार से राक्षस घर-घर के हो गए।
श्लोक 119
तेरे बल से रामराज में सब देवताओं के कार्य सिद्ध हुए; सब समाज और साज रघुवर के लिए सज गए।
श्लोक 120
तेरा गुणगान सुनकर देवता पुलकित होते हैं – ब्रह्मा, विष्णु, शिव के नेत्रों में जल भर आता है।
श्लोक 121
हे कपिनाथ! तुलसी के माथे पर हाथ फिराओ – जब तक तुलसी दुखी दिखता है, तब तक तुम कनिष्ठ क्यों कहलाओगे?
श्लोक 122
जो तेरे टुकड़े पर पलता है, यदि चूक भी हो तो उसे मौन (दंड) मत दो। हे दयालु! अत्यंत तुच्छ मैं तुम्हारी ओर देखता हूँ।
श्लोक 123
हे भोरानाथ! जो भोर में ही थोड़े से दोषों पर क्रोध करते हो – वैसे ही मुझे पोषो, संतोष दो, स्थापित करो, और अपने को अवहेलित न करो।
श्लोक 124
तू जल है और मैं जलचर (मछली) – तू माता है और मैं बच्चा! नहीं, हे सवामी! इस बात को बिना विलंब समझो – आप ही मेरे अवलंब हों।
श्लोक 125
बालक को विकल जानकर, मेरे प्रेम को पहिचानकर – तुलसी की बाँह पर अपनी लंबी पूँछ फिराओ।
श्लोक 126
रोगों, कुयोगों, कुलोगों ने ऐसे घेर लिया है जैसे दिन में बादलों का घटा धक्का देकर आ गिरी हो।
श्लोक 127
पीड़ा का पानी बरसता है, जवासा के समान जलन होती है – बिना क्रोध के दोष और धूम-मूल-मलिनाई है।
श्लोक 128
हे करुणानिधान हनुमान महाबलवान! देखकर हंसकर, हाँक लगाकर, फूंक मारकर – इन (रोग-रूपी) सेनाओं क उड़ा दिया।
श्लोक 129
तुलसी कुरोग और राड-राक्षस ने लगभग खा लिया था, पर केसरी-नंदन वीर ने बड़ी बहादुरी से बचा लिया।
श्लोक 130
हे राम के दास हनुमान! तुम सदा मेरे गोसाईं और सुमति देने वाले, और अनुकूल रहो।
श्लोक 131
तुमने मुझ बालक को एक अक्षर की तरह पाला – जैसे पिता-माता मंगल और आनंद मूल स पालत ह।
श्लोक 132
बांह की वेदना ने बाँह को चिल्लाने वाल बना दिा ह – मैं आर्त होकर पुकारता हूं, आनंद भूल गया हूँ।
श्लोक 133
हे श्रीरघुवीर! मेरी पीड़ा दूर करो – ताकि मैं आपक दरबार म लटकत हुआ लूला न रहं।
श्लोक 134
काल की कराल-लता या कर्म की कठोरत क प्रभाव? या पाप क प्रभाव क सुभाव – बावरा जैसा।
श्लोक 135
यह वेदना रात-दिन बुरी तरह सही नही जाती। उसी बांह क पकड़ा ह जो पवनदुलारे ने पकड़ा।
श्लोक 136
हे तुलसी (भक्त)! तुम्हार लगाया हुआ वृक्ष (तुलसी) मलीन ह गय – उसे जल (कृपा) से सींचो – वह तीनों तापों से झुलस रहा ह।
श्लोक 137
भूत-प्रेतों की, अपनी, और पराई समस्याओं – हे कृपानिधान! सब की रीत आप जानत ह – राम आपके हैं।
श्लोक 138
पाँव की पीड़ा, पेट की पीड़ा, बांह की पीड़ा, मुँह की पीड़ा – सारा शरीर जर्जर और पीड़ामय ह।
श्लोक 139
देव, भूत, पितर, कर्म, दुष्ट, काल, ग्रह – सबन मुझ पर दावानल के समान सताप दिया ह।
श्लोक 140
मैं तो बाल्यकाल से ही बिना मोल क बिक चुक हूं – मेरे ललाट पर रामनाम की ओट (लेख) लिख दी ह।
श्लोक 141
हे कुंभज (द्रोणपुत्र) के किंकर (दास)! मैं विकल होकर गोखुर जैसे छोटे गड्ढे में डूब रहा हूँ। हाय रामराय! ऐसी हाल कब हुई?
श्लोक 142
बाहुक (रोग), सुबाहु, नीच, लीचर, मरीच – ये मिलकर – मुँह की पीड़ा, केतुजा, कुरोग, जातुधान – ये सब हैं।
श्लोक 143
मैंने रामनाम का जप और जागरण प्रेमपूर्वक किया है – तो काल, दूत, भूत क्या मेरे मान क कह सकत ह?
श्लोक 144
राम और लक्ष्मण दो अक्षर – जिनका प्रभाव पूर्ण है और जगत को जगाने वाल ह – इनक स्मरण करो जो सहायक ह।
श्लोक 145
हे तुलसी! सभालो – ताड़का-सहारी भारी योदा (हनुमान) ने बाणवान होकर बरगद जैसा बनाकर बेध दिया है।
श्लोक 146
बाल्यकाल म मन सीधा था – राम क सम्मुख हुआ, राम नाम लेत और माँगकर टुकड़े खाकर जीता था।
श्लोक 147
फिर संसार क रीित म पड़ गया, पर राम स पवित्र प्ेम बना रहा; मोहवश बैठा रहा – इसने मेरी तरकीब तोड़ दी।
श्लोक 148
खोटे-खोटे आचरण करते हुए भी (राम ने) अपनाया। हे अंजनीकुमार! मैं राम के पवित्र हाथों से शोधा गया हूँ।
श्लोक 149
तुलसी गोसाईं (हनुमान) के हो गया, बुरे दिन भूल गया – उसक फल अब पा रहा हूँ, अंत म परिपाक (पूर्ण भोग) है।
श्लोक 150
अन्न-वस्त्र से हीन, भयानक विषाद में लीन, दीन-दुबला देखकर कोई हाय-हाय (दया) नहीं करता।
श्लोक 151
तुलसी कहते हैं – रघुनाथ ने अनाथ को सनाथ किया – अपने स्वभाव के अनुसार फल दिया, जो शील के सागर हैं।
श्लोक 152
नीच होकर इसमें पति पाकर भरहायिगो (बिगड़ गया?) – प्रभु-भजन को वचन-मन-काया से त्याग दिया।
श्लोक 153
इसलिए शरीर क घोर यातना क माध्यम स पीसा जाता ह – फूट-फूटकर रामराय का लोन (नमक/आँसू) निकलता है।
श्लोक 154
जगत म जानकी-जीवन (राम) क दास कहलाकर जीता हूं, और मरने क लिए वाराणसी और गंगा का जल (इच्छा) है।
श्लोक 155
तुलसी के दोनों हाथों में मोदक (प्रसाद) है – जिसके हैं, उसके जीते-मरे कोई बच्चा भी चिंता नहीं करत।
श्लोक 156
मुझे लोग राम का झूठा-साँचा भक्त कहते हैं – मेरे मन में यह नहीं कि मैं हर का या हरि का हूँ – मैं तो केवल राम का हूँ।
श्लोक 157
शरीर से भारी और दुःसह पीड़ा से व्यथित होकर मैं सो गया – रघुबीर के बिना यह दूर नहीं हो सकती।
श्लोक 158
सीतापति और सहायक हनुमान सदा मेरे साथ हैं – हितकारी उपदेश के लिए महेश (शिव) के समान गुरु हैं।
श्लोक 159
मन, वचन, काया से शरण आपके चरनों म – आपके भरोसे मैं देवताओं को भी नहीं जानता – मैं तो आपके ही सहारे हूँ।
श्लोक 160
रोग, भूतजनित उपाधि, या किसी दुर्जन क – तुलसी क सेवक जानकर समाधि (मुक्ति) दें।
श्लोक 161
हे कपिनाथ! रघुनाथ! भोलानाथ (शिव)! भूतनाथ (शिव)! रोग-समुद्र को गाय के खुर के गड्ढे जितना क्यों नहीं कर डालते?
श्लोक 162
हनुमान सुजान से, रामराय से, कृपानिधान शंकर से – सावधान होकर सुनएं।
श्लोक 163
हर्ष-विषाद, राग-रोष, गुण-दोष से भरी यह सृष्टि ब्रह्मा ने रची – संसार में ऐसी दिखती है।
श्लोक 164
माया, जीव, काल और कर्म के स्वभाव से यह सब है, पर करैया राम ही हैं – वेद यह साँची बात कहते हैं, मन में गुनो।
श्लोक 165
'आपसे क्या नहीं हो सकता?' – यह मुझे समझाइए। मैं तो मौन ही रहूँगा, और जो ब्यो (बीज) है उसे समझ लीजिए।
श्लोक 166
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
मंगलवार एवं शनिवार
प्रातःकाल अथवा संध्या समय
सिंदूर, चमेली का तेल, तुलसी माला, बूंदी/लड्डू एवं पान का बीड़ा
- अपार बल, साहस, भयमुक्ति एवं नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा
पृष्ठभूमि
यह हनुमान जी की स्तुति का एक प्रसिद्ध पाठ है, जिसे 'हनुमान बाहुक' कहा जाता है। यह भक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी) द्वारा रचित माना जाता है, जो भगवान राम के परम भक्त थे। ऐसी परंपरा है कि तुलसीदास जी ने इसकी रचना अपनी बांह की पीड़ा (बाहु-पीड़ा) से मुक्ति पाने के लिए हनुमान जी की शरण में जाकर की थी। इसलिए इसे विशेष रूप से शारीरिक और मानसिक कष्टों से राहत पाने के लिए, प्रार्थना और पाठ के रूप में प्रयोग किया जाता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Goswami Tulsidas · मध्यकालीन भक्ति कवि-संत · 16वीं शताब्दी, अवध एवं वाराणसी
संस्कृत एवं अवधी भाषा के कवि-संत, जो रामायण की अवधी पुनर्रचना रामचरितमानस के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। परंपरा के अनुसार वाराणसी में बसने से पूर्व उन्होंने वर्षों कठिनाई एवं भटकन का सामना किया, जहाँ उन्होंने हनुमान चालीसा एवं विनय पत्रिका सहित अपनी अधिकांश अन्य प्रमुख रचनाएं राम एवं हनुमान को भक्ति-अर्पण के रूप में रचीं।
क्या आप जानते हैं?
रचना
यह तुलसीदास द्वारा रचित 'हनुमान बाहुक' है, जो हनुमानजी की स्तुति और अपनी पीड़ा के निवेदन का अद्भुत संगम है।
शारीरिक पीड़ा का चित्रण
तुलसीदास ने गंभीर बाँह के दर्द का वर्णन किया है, जिसे वे 'बाँहपीर' कहते हैं, और इसे दूर करने के लिए हनुमानजी से प्रार्थना करते हैं। यह रचना व्यक्तिगत दुख को ईश्वर के समक्ष रखने का एक सशक्त उदाहरण है।
बाललीलाओं का उल्लेख
तुलसीदास ने हनुमानजी के बाल रूप का सुंदर चित्रण किया है, जैसे बालरवि के समान वर्ण वाले, सूर्य के समान तेजस्वी रूप का स्मरण। ये प्रसंग बताते हैं कि उनकी शक्ति बचपन से ही अद्वितीय थी।
रामकाज में सहायक
रचना में बार-बार इस बात पर बल दिया गया है कि हनुमानजी ने राम के कार्य को सिद्ध करने के लिए सिंधु पार किया, लंका जलाई और असंख्य कठिनाइयों को पार किया। वे 'रामदूत' और 'रघुबीर' के सबसे बड़े सहायक हैं।
वात्सल्य और दीनता
तुलसीदास स्वयं को एक बालक और दीन सेवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो अपने प्रभु से प्रेम, दया और क्षमा की याचना करते हैं। चौंतीसवें छंद में वे हनुमानजी से अपनी बाँह पर 'लामीलूम फेरने' (पूँछ फेरने) का आग्रह करते हैं, जिसमें एक बालक के प्रति स्नेह और सुरक्षा का भाव है।
सभी संकटों के निवारण का आश्वासन
रचना के अंत में स्पष्ट विश्वास है कि हनुमानजी की शरण में आने वाले पर कोई संकट, पाप या रोग हावी नहीं हो सकता। तुलसीदास ने हनुमानजी को सबसे बड़ा रक्षक माना है।
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