Bharat Devotion
Embroidered artwork for श्री रुद्राष्टकम (तुलसीदास कृत): Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

श्री रुद्राष्टकम (तुलसीदास कृत)

श्री रुद्राष्टकम (तुलसीदास कृत)

रुद्राष्टकम्: शिवजी की स्तुति के आठ संस्कृत छन्द और फल बताने वाला नौवाँ श्लोक, तुलसीदास के रामचरितमानस (उत्तरकाण्ड, दोहा 107 के बाद) में।

श्लोक

श्रीरुद्राष्टकं तुलसीदासकृतम् नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्
Shri Rudrashtakam Tulsidas Kritam Namamishamishana Nirvanaroopam Vibhum Vyapakam Brahma Veda Svaroopam Nijam Nirgunam Nirvikalpam Nireeham Chidakasham Akashavasam Bhajeham

श्लोक 1

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम्
Nirakaram Omkara Moolam Tureeyam Gira Gyana Goteetam Isham Gireesham Karalam Mahakala Kalam Kripalam Gunagara Samsara Param Natoham

श्लोक 2

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं मनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम् स्फुरन्मौलिकल्लोलिनीचारुगङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा
Tusharadri Samkasha Gauram Gabheeram Manobhoota Koti Prabha Shree Shareeram Sphuran Mauli Kallolini Charu Ganga Lasad Bhala Balendu Kanthe Bhujanga

श्लोक 3

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि
Chalat Kundalam Bhroo Sunetram Vishalam Prasannaananam Neelakantham Dayalam Mrigadhisha Charmambaram Mundamalam Priyam Shankaram Sarvanatham Bhajami

श्लोक 4

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशमखण्डमजं भानुकोटिप्रकाशम् त्रयःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्
Prachandam Prakrishtam Pragalbham Paresham Akhandam Ajam Bhanu Koti Prakasham Trayah Shoola Nirmoolanam Shoolapanim Bhajeham Bhavani Patim Bhava Gamyam

श्लोक 5

कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी चिदानन्दसन्दोहमोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी
Kalateeta Kalyana Kalpanta Kari Sada Sajjana Ananda Data Purari Chidananda Sandoha Mohapahari Praseeda Praseeda Prabho Manmathari

श्लोक 6

न यावदुमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्
Na Yavad Umanatha Padaravindam Bhajanteha Loke Pare Va Naranam Na Tavat Sukham Shanti Santapa Nasham Praseeda Prabho Sarva Bhootadhivasam

श्लोक 7

न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् जराजन्मदुःखौघतातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीशशम्भो
Na Janami Yogam Japam Naiva Poojam Natoham Sada Sarvada Shambhu Tubhyam Jara Janma Dukhaugha Tatapyamanam Prabho Pahi Aapanna Mamisha Shambho

श्लोक 8

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति
Rudrashtakam Idam Proktam Viprena Hara Toshaye Ye Pathanti Nara Bhaktya Tesham Shambhuh Praseedati

श्लोक 9

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

सोमवार एवं प्रदोष काल

उत्तम मुहूर्त / समय

प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्याकालीन प्रदोष वेला

पूजन सामग्री व अर्पण

बिल्वपत्र, गंगाजल, भस्म, धतूरा एवं श्वेत पुष्प

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • आत्मिक शांति, समस्त पापों का नाश एवं अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति

पृष्ठभूमि

रुद्राष्टकम् तुलसीदास के अवधी रामचरितमानस के भीतर आया शिवजी का संस्कृत स्तोत्र है, उत्तरकाण्ड में दोहा 107 (ख) के बाद। वहाँ काकभुशुण्डि बताते हैं कि उनके गुरु, एक ब्राह्मण, ने शिष्य के लिए क्षमा माँगने हेतु इन आठ छन्दों से शिवजी की स्तुति की और नौवें श्लोक में कहा कि जो इसे पढ़ता है उस पर शम्भु प्रसन्न होते हैं। परम्परा से इसे तुलसीदास (लगभग 1532 से 1623) की रचना माना जाता है; यह भुजंगप्रयात छन्द में है और सोमवार तथा महाशिवरात्रि को शिवपूजन में पढ़ा जाता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Goswami Tulsidas · मध्यकालीन भक्ति कवि-संत · 16वीं शताब्दी, अवध एवं वाराणसी

संस्कृत एवं अवधी भाषा के कवि-संत, जो रामायण की अवधी पुनर्रचना रामचरितमानस के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। परंपरा के अनुसार वाराणसी में बसने से पूर्व उन्होंने वर्षों कठिनाई एवं भटकन का सामना किया, जहाँ उन्होंने हनुमान चालीसा एवं विनय पत्रिका सहित अपनी अधिकांश अन्य प्रमुख रचनाएं राम एवं हनुमान को भक्ति-अर्पण के रूप में रचीं।

क्या आप जानते हैं?

रचयिता

यह स्तोत्र परम्परा से रामचरितमानस के संत-कवि तुलसीदास (लगभग 1532 से 1623) की रचना माना जाता है। कथा में इसे काकभुशुण्डि के गुरु बोलते हैं, जबकि रचना तुलसीदास की मानी जाती है; पाठ का शीर्षक भी 'तुलसीदासकृतम्' है।

संरचना

श्रीरुद्राष्टकम् में आठ छन्द (अष्टक) हैं, भुजंगप्रयात छन्द में, प्रत्येक चरण में बारह अक्षर; उसके बाद फल बताने वाला नौवाँ श्लोक अनुष्टुप् में है। सातवाँ छन्द ('न यावदुमानाथपादारविन्दं') विशेष प्रसिद्ध है।

महत्व

नौवाँ श्लोक कहता है कि जो भक्ति से इसे पढ़ते हैं उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं। भक्तों के लिए यह दया की प्रार्थना है और आठवें छन्द में बताए जन्म, जरा तथा मृत्यु के दुःखों से राहत की याचना है।

मुख्य विषय

छन्द 1 और 2 में शिव निराकार, सर्वव्यापी और वाणी तथा ज्ञान से परे तत्त्व हैं। छन्द 3 और 4 में वे हिम-से गौर हैं, उनके मस्तक पर चन्द्रकला, जटाओं में गंगा, कंठ में सर्प, बाघम्बर और मुण्डमाला है; इस प्रकार स्तोत्र निर्गुण और सगुण दोनों दृष्टियों को साथ रखता है।

अवधी महाकाव्य में संस्कृत

तुलसीदास ने रामचरितमानस अवधी में लिखा, पर यह स्तोत्र संस्कृत में है और कथा के उस स्थान पर आता है जहाँ गुरु शिवजी से प्रार्थना करते हैं। इसके संस्कृत छन्द आसपास की लोकभाषा की कथा से अलग एक शास्त्रीय गरिमा रखते हैं।

Shiva की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

Shiva

Shiva के सभी पाठ देखें →

हिन्दू धर्म से और

सभी देखें