नगर में जोगी आया
भोलेनाथ का भजन
यह एक भक्ति गीत है जिसमें भगवान शिव को एक योगी (जोगी) के रूप में वर्णित किया गया है और भगवान कृष्ण की लीलाओं का भी उल्लेख है। इस भजन में गहरे आध्यात्मिक रहस्य को समझने की चुनौती दिखाई गई है।
श्लोक
शहर में एक योगी आया, पर उसके रहस्य को कोई नहीं समझ पाया।
श्लोक 1
हे भोले शिव! तुम्हारे मंदिर ऊँचे-ऊँचे हैं, तुम्हारा धाम भी ऊँचा है। हे कैलाश के वासी, हम तुम्हें प्रणाम करते हैं।
श्लोक 2
शहर में वह योगी आया, पर उसका भेद कोई न समझ पाया। तेरी माया अद्भुत है, इसे भी कोई न समझ पाया। वह यशोदा के घर आया। तेरा नाम सबसे बड़ा है, भोलेनाथ, भोलेनाथ, भोलेनाथ।
श्लोक 3
उनके अंगों पर भस्म लगी है, गले में रुण्डों की माला है, शेषनाग उनसे लिपटे हैं, ललाट पर चंद्रमा का बाँका तिलक है। उन्होंने घर-घर अलख जगाई। शहर में वह योगी आया, पर कोई भेद न समझ पाया। तेरा नाम सबसे बड़ा है, भोलेनाथ, भोलेनाथ, भोलेनाथ।
श्लोक 4
नंदरानी यशोदा भिक्षा लेकर निकलीं, सोने की थाल सजाकर। योगी ने भिक्षा माँगी और आसन ग्रहण किया, पर मेरे बालक को डरा दिया। शहर में वह योगी आया, पर कोई भेद न समझ पाया। तेरा नाम सबसे बड़ा है, भोलेनाथ, भोलेनाथ, भोलेनाथ।
श्लोक 5
मुझे तेरी दौलत और संसार की माया नहीं चाहिए। मैं तो अपने लाल कृष्ण के दर्शन के लिए आया हूँ, उनका दर्शन करा दो। शहर में वह योगी आया, पर कोई भेद न समझ पाया। तेरा नाम सबसे बड़ा है, भोलेनाथ, भोलेनाथ, भोलेनाथ।
श्लोक 6
पाँच बार परिक्रमा करके योगी ने शृंगी का नाद बजाया। सूरदास कहते हैं, मैं कन्हैया पर बलिहारी हूँ, युगों-युगों तक तेरा लाल जीवित रहे। शहर में वह योगी आया, पर कोई भेद न समझ पाया। तेरा नाम सबसे बड़ा है, भोलेनाथ, भोलेनाथ, भोलेनाथ।
श्लोक 7
शहर में वह योगी आया, पर उसका भेद कोई न समझ पाया। तेरी माया अद्भुत है, इसे भी कोई न समझ पाया। वह यशोदा के घर आया। तेरा नाम सबसे बड़ा है, भोलेनाथ, भोलेनाथ, भोलेनाथ।
श्लोक 8
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
सोमवार एवं प्रदोष काल
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्याकालीन प्रदोष वेला
बिल्वपत्र, गंगाजल, भस्म, धतूरा एवं श्वेत पुष्प
- आत्मिक शांति, समस्त पापों का नाश एवं अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति
पृष्ठभूमि
यह भजन उत्तर भारत की लोकभक्ति परंपरा का हिस्सा है, जहाँ शिव और कृष्ण भक्ति को एक साथ जोड़ा जाता है। इसे अक्सर भजन-कीर्तन में गाया जाता है, खासकर शिवरात्रि या कृष्ण जन्माष्टमी जैसे त्योहारों पर। हालाँकि इस भजन को पारंपरिक रूप से सूरदास जैसे संतों से जोड़ा जाता है, इसकी रचना का सटीक समय और रचयिता निश्चित नहीं है। इसकी पृष्ठभूमि नंद-यशोदा का ब्रज-गृह है, जिसका वर्णन भागवत पुराण के दशम स्कंध में मिलता है।
क्या आप जानते हैं?
कथा का स्रोत
यह भजन बालकृष्ण की लीला के उस लोकप्रिय प्रसंग पर आधारित है जिसमें भगवान शिव जोगी का रूप धरकर नंदरानी यशोदा के घर भिक्षा माँगने आते हैं। उनका असली उद्देश्य बालकृष्ण के दर्शन करना है। यह प्रसंग ब्रज की लोक-भक्ति परंपरा में प्रचलित है, भागवत पुराण के मूल कथानक में नहीं मिलता, और शिव-विष्णु के अभिन्न प्रेम को दर्शाता है।
रचनाकार की छाप
समापन पद "सूरदास बलिहारी कन्हैया की" में सूरदास का नाम आता है, इसलिए इसे परंपरागत रूप से महान कृष्ण-भक्त कवि सूरदास (16वीं शताब्दी) से जोड़ा जाता है। परंतु यह सम्बन्ध प्रमाणित नहीं है, इसलिए रचयिता निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है।
शिव और कृष्ण का मिलन
इस भजन में शिव (जोगी) और कृष्ण (बालक) का मिलन वर्णित है। यह हिंदू परंपरा में शैव और वैष्णव संप्रदायों के बीच सामंजस्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। शिव को "भोलेनाथ" और कृष्ण को "लाला" कहा गया है।
अलख जगाने का अर्थ
पंक्ति "घर घर अलख जगायो" में 'अलख' शब्द नाथ परंपरा से लिया गया है, जहाँ योगी अलक्ष्य (अदृश्य) परमात्मा का जाप करते हैं। यह शिव को एक नाथ-योगी के रूप में चित्रित करता है, जो उनकी वैराग्य और साधना ओर इशारा करता है।
भजन की संरचना
भजन की शुरुआत एक श्लोक से होती है जो शिव के कैलाश धाम की स्तुति करता है, फिर लीला का वर्णन आता है। बार-बार दोहराई जाने वाली पंक्ति "नगर में जोगी आया, भेद कोई समझ ना पाया" शिव की माया के रहस्य को उजागर करती है, जिसे सामान्य मनुष्य नहीं समझ सकता।
Shiva
हिन्दू धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
