कर्पूरगौरम् स्तोत्र (भगवान शिव की प्रार्थना)
शिव की स्तुति का एक संस्कृत श्लोक: कपूर के समान गौर, करुणा के अवतार, जो भवानी सहित हृदय-कमल में सदा विराजते हैं।
श्लोक
हे शिव! आप कपूर के समान गौरवर्ण हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के साररूप हैं, तथा शेषनाग को हार के रूप में धारण करते हैं। आप सदा अपने भक्तों के हृदय-कमल में निवास करते हैं, ऐसे भगवान शिव, माता पार्वतीसहित, आपको मैं नमन करता हूँ।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
सोमवार एवं प्रदोष काल
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्याकालीन प्रदोष वेला
बिल्वपत्र, गंगाजल, भस्म, धतूरा एवं श्वेत पुष्प
- आत्मिक शांति, समस्त पापों का नाश एवं अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति
पृष्ठभूमि
कर्पूरगौरम् शिव और भवानी को समर्पित एक संस्कृत श्लोक है, जिसे घरों और मंदिरों में शिव पूजा तथा आरती के समय गाया जाता है। इसके रचयिता और मूल ग्रंथ की पुष्टि नहीं होती। इसे प्रायः शिव यजुर्मंत्र कहा जाता है और कहीं-कहीं आदि शंकराचार्य से जोड़ा जाता है, परंतु कोई ऐसा ग्रंथ नहीं मिला जो इनमें से किसी दावे को सिद्ध करे। इसलिए इसे एक श्रद्धेय पारंपरिक प्रार्थना के रूप में ही ग्रहण करना उचित है।
क्या आप जानते हैं?
स्रोत
इस श्लोक का मूल ग्रंथ अभी तक प्रमाणित नहीं हुआ है। यह सामान्य पाठ के श्लोक-संग्रहों में, जैसे संस्कृत डॉक्युमेंट्स के संग्रह में, बिना रचयिता के मिलता है। इसे शिव पंचाक्षर स्तोत्र या शिव महिम्न स्तोत्र का अंश बताना ठीक नहीं है; वे अलग रचनाएँ हैं।
शब्दार्थ
कर्पूरगौरम् यानी कपूर के समान श्वेत, करुणावतारम् यानी करुणा के अवतार, संसारसारम् यानी संसार के सार, और भुजगेन्द्रहारम् यानी सर्पराज को हार रूप में धारण करने वाले।
हृदय-कमल में वास
'सदा वसन्तं हृदयारविन्दे' श्लोक को ध्यान बना देता है: साधक शिव को दूर नहीं, अपने भीतर विराजमान देखता है।
भवानी सहित
अंतिम चरण भव (शिव) को भवानी (पार्वती) के साथ नमन करता है, यानी शिव की उपासना शक्ति के साथ की जाती है।
छंद
इसकी प्रत्येक पंक्ति में ग्यारह अक्षर हैं और छंद उपजाति है, जो इंद्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा के मेल से बनता है।
Shiva
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