Bharat Devotion
Embroidered artwork for सर्वे भवन्तु सुखिनः – शांति का सार्वभौमिक मंत्र: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

सर्वे भवन्तु सुखिनः – शांति का सार्वभौमिक मंत्र

सर्वे भवन्तु सुखिनः – शांति का सार्वभौमिक मंत्र

सभी प्राणियों के सुख, आरोग्य और कल्याण की प्रिय प्रार्थना, कि कोई दुःखी न हो, जिसका समापन तीन बार 'शान्तिः' से होता है।

श्लोक

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः
Om Sarve Bhavantu Sukhinah Sarve Santu Niramayah

श्लोक 1

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्
Sarve Bhadrani Pashyantu Maa Kashchid Dukh Bhaag Bhavet

श्लोक 2

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
Om Shantih Shantih Shantih

श्लोक 3

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

इस प्रार्थना को प्रायः बृहदारण्यक उपनिषद् (१.४.१४) का बताया जाता है, पर उस उपनिषद् में यह नहीं मिलती। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स पर उपलब्ध बृहदारण्यक के पाठ में ये पंक्तियाँ नहीं हैं, और जिस गरुड़ पुराण का नाम किसी रूपान्तर के लिए कभी-कभी लिया जाता है, उसके संस्कृत डॉक्यूमेंट्स वाले पाठ में भी ये नहीं मिलतीं। आज जिस रूप में 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' से आरम्भ होने वाली यह प्रार्थना बोली जाती है, उसका कोई एक प्रमाणित स्रोत या रचयिता नहीं है। इसे पूजा, कक्षा और सभाओं के अन्त में बोला जाता है, और इसे सच्चे मन से कहने के लिए किसी विशेष अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं।

क्या आप जानते हैं?

सबके लिए कामना

प्रार्थना सुख, रोग-मुक्ति (निरामय), शुभ दर्शन (भद्र) और दुःख-मुक्ति माँगती है, 'सर्वे' यानी सबके लिए, बिना किसी व्यक्ति, जाति या प्राणी-भेद के।

एक प्रचलित भूल

लोकप्रिय पुस्तकें इन पंक्तियों के लिए बृहदारण्यक उपनिषद् 1.4.14 का हवाला देती हैं। उस प्रसंग में ये पंक्तियाँ नहीं हैं, इसलिए यहाँ वह दावा दोहराया नहीं गया।

ग्रन्थ क्या कहते हैं और क्या नहीं

संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के बृहदारण्यक उपनिषद् के पाठ में ये पंक्तियाँ नहीं हैं, और उसके गरुड़ पुराण के पाठ में भी नहीं, इसलिए यहाँ किसी प्राचीन स्रोत का दावा नहीं किया गया। पाठ में आज प्रचलित रूप 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' से आरम्भ होता है।

अज्ञात और सबका

इसके रचयिता ज्ञात नहीं, और यही इसकी विशेषता है: यह उन सबका है जो इसे पूजा, कक्षा या योगाभ्यास के अंत में बोलते हैं।

तीन बार शान्तिः

अंत का 'ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः' परंपरा से तीन स्तरों के विघ्नों को शांत करने के लिए माना जाता है: भौतिक, दैवी और मानसिक।

हिन्दू धर्म से और

सभी देखें