निर्भय तपस्वी और वन के दस्यु
गामणि जातक
उपनिषद् का शांति मंत्र 'सह नाववतु': गुरु और शिष्य साथ मिलकर रक्षा, पोषण, बल और वैर-रहित अध्ययन की प्रार्थना करते हैं।
सभी प्राणियों के सुख, आरोग्य और कल्याण की प्रिय प्रार्थना, कि कोई दुःखी न हो, जिसका समापन तीन बार 'शान्तिः' से होता है।