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Embroidered artwork for ऋणमोचक मङ्गल स्तोत्र: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

ऋणमोचक मङ्गल स्तोत्र

ऋणमोचक मङ्गल स्तोत्र

स्कन्दपुराण का बारह श्लोकों का मङ्गल (मंगल ग्रह) स्तोत्र, जिसमें ऋण, दरिद्रता और मंगल-जनित कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना है।

श्लोक

ऋणमोचकमङ्गलस्तोत्रम् श्रीगणेशाय नमः
rinamocakamangalastotram shreeganeshaaya namah | 1 |

श्लोक 1

मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः स्थिरासनो महाकायः सर्वकर्माविरोधकः
mangalo bhoomiputrashca rinahartaa dhanapradah sthiraasano mahaakaayah sarvakarmaavirodhakah | 2 |

श्लोक 2

लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः
lohito lohitaakshashca saamagaanaam kripaakarah dharaatmajah kujo bhaumo bhootido bhoominandanah | 3 |

श्लोक 3

अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः वृष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः
angaarako yamashcaiva sarvarogaapahaarakah vrishteh kartaa'pahartaa ca sarvakaamaphalapradah | 4 |

श्लोक 4

एतानि कुजनामानि नित्यं यः श्रद्धया पठेत् ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्
etaani kujanaamaani nityam yah shraddhayaa pathet rinam na jaayate tasya dhanam sheeghramavaapnuyaat | 5 |

श्लोक 5

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्
dharaneegarbhasambhootam vidyutkaantisamaprabham kumaaram shaktihastam ca mangalam pranamaamyaham | 6 |

श्लोक 6

स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पापि भवति क्वचित्
stotramangaarakasyaitatpathaneeyam sadaa nribhih na teshaam bhaumajaa peedaa svalpaapi bhavati kvacit | 7 |

श्लोक 7

अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय
angaaraka mahaabhaaga bhagavanbhaktavatsala tvaam namaami mamaasheshamrinamaashu vinaashaya | 8 |

श्लोक 8

ऋणरोगादिदारिद्र्यं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा
rinarogaadidaaridryam ye caanye hyapamrityavah bhayakleshamanastaapaa nashyantu mama sarvadaa | 9 |

श्लोक 9

अतिवक्र दुराराध्य भोगमुक्त जितात्मनः तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्
ativakra duraaraadhya bhogamukta jitaatmanah tushto dadaasi saamraajyam rushto harasi tatkshanaat | 10 |

श्लोक 10

विरिञ्चिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः
virincishakravishnoonaam manushyaanaam tu kaa kathaa tena tvam sarvasattvena graharaajo mahaabalah | 11 |

श्लोक 11

पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः ऋणदारिद्र्यदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः
putraandehi dhanam dehi tvaamasmi sharanam gatah rinadaaridryaduhkhena shatroonaam ca bhayaattatah | 12 |

श्लोक 12

एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम् महतीं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा
ebhirdvaadashabhih shlokairyah stauti ca dharaasutam mahateem shriyamaapnoti hyaparo dhanado yuvaa | 13 |

श्लोक 13

इति श्रीस्कन्दपुराणे भार्गवप्रोक्तं ऋणमोचकमङ्गलस्तोत्रं सम्पूर्णम्
iti shreeskandapuraane bhaargavaproktam rinamocakamangalastotram sampoornam | 14 |

श्लोक 14

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह स्तोत्र स्कन्दपुराण के अन्तर्गत भार्गव (भृगुवंशी ऋषि) द्वारा प्रोक्त माना जाता है। इसे मङ्गल (मंगल ग्रह) की उपासना के लिए रचा गया है, जो ऋणों से मुक्ति और धन-समृद्धि प्रदान करने वाले माने जाते हैं। परम्परा में इसे मंगलवार या मङ्गल की अशुभ अवस्था में पढ़ने का विधान है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो ऋण या आर्थिक संकट से ग्रस्त हों। स्थान-निर्देश: पुष्पिका है 'इति श्रीस्कन्दपुराणे भार्गवप्रोक्तं ऋणमोचकमङ्गलस्तोत्रं सम्पूर्णम्', अर्थात् स्कन्दपुराण में भार्गव द्वारा कहा गया; इसमें पुराण के खण्ड का नाम नहीं है। श्लोक ५ मङ्गल को शक्ति (भाला) धारण करने वाले कुमार के रूप में प्रणाम करता है, जो स्कन्द-कार्तिकेय की प्रतिमा-परम्परा है, इसीलिए मुरुगन का पृष्ठ जोड़ा गया है।

क्या आप जानते हैं?

स्त्रोत का स्रोत

यह ऋणमोचक मंगल स्तोत्र स्कन्दपुराण के भार्गव संवाद में आता है। भार्गव अर्थात भृगुवंशी ऋषि द्वारा कहा गया (प्रोक्त) बताया जाता है। यह स्तोत्र मंगल ग्रह (अंगारक) को समर्पित है और ऋणों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।

मंगल के विविध नाम

इस स्तोत्र में मंगल के अनेक नामों का उल्लेख है—भूमिपुत्र, लोहित, लोहिताक्ष, धरात्मज, कुज, भौम, अंगारक, आदि। प्रत्येक नाम उनके स्वरूप या गुण को दर्शाता है, जैसे 'लोहित' का अर्थ लाल रंग, और 'भूमिपुत्र' पृथ्वी से उत्पन्न होना।

स्तोत्र का फल

जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करता है, उस पर कभी ऋण नहीं रहता और वह शीघ्र धन प्राप्त करता है। साथ ही, मंगलजनित पीड़ा (जैसे क्रोध, दुर्घटना) भी उसे स्पर्श नहीं करती।

मंगल की शक्ति

स्तोत्र में मंगल को 'ग्रहराज' और 'महाबल' कहा गया है। वे ब्रह्मा, इंद्र और विष्णु जैसे देवताओं से भी अधिक सामर्थ्यवान बताए गए हैं। प्रसन्न होने पर वे राज्य देते हैं और क्रुद्ध होने पर तत्क्षण हर लेते हैं।

स्तोत्र की रचना

यह स्तोत्र 12 श्लोकों में विभाजित है। अंतिम श्लोक में कहा गया है कि जो इन 12 श्लोकों से पृथ्वीपुत्र मंगल की स्तुति करता है, वह महान संपत्ति प्राप्त करता है और युवा तथा धनवान बनता है।

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