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श्रीसुब्रह्मण्यपञ्चरत्नम्

श्रीसुब्रह्मण्यपञ्चरत्नम्

सुब्रह्मण्य पञ्चरत्नम्: भगवान सुब्रह्मण्य (मुरुगन) की स्तुति के पाँच श्लोक और फल बताने वाला एक अन्तिम श्लोक, प्रत्येक शरण की प्रार्थना पर समाप्त।

श्लोक

श्रीसुब्रह्मण्यपञ्चरत्नम् २ षडाननं चन्दनलेपिताङ्गं महोरसं दिव्यमयूरवाहनम् रुद्रस्य सूनुं सुरलोकनाथं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये
Shree Subrahmanya Pancharatnam 2 Shadaananam Chandanalepitaangam Mahorasam Divyamayooravaahanam Rudrasya Soonum Suralokanaatham Brahmanyadevam Sharanam Prapadye

श्लोक 1

जाज्वल्यमानं सुरवृन्दवन्द्यं कुमार धारातट मन्दिरस्थम् कन्दर्परूपं कमनीयगात्रं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये
Jaajwalyamaanam Suravrindavandyam Kumaara Dhaaraatata Mandirastham Kandarparoopam Kamaneeyagaatram Brahmanyadevam Sharanam Prapadye

श्लोक 2

द्विषड्भुजं द्वादशदिव्यनेत्रं त्रयीतनुं शूलमसी दधानम् शेषावतारं कमनीयरूपं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये
Dwishadbhujam Dwaadashadivyanetram Trayeetanum Shoolamasee Dadhaanam Sheshaavataaram Kamaneeyaroopam Brahmanyadevam Sharanam Prapadye

श्लोक 3

सुरारि घोराहवशोभमानं सुरोत्तमं शक्तिधरं कुमारम् सुधार शक्त्यायुध शोभिहस्तं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये
Suraari Ghoraahavashobhamaanam Surottamam Shaktidharam Kumaaram Sudhaara Shaktyaayudha Shobhihastam Brahmanyadevam Sharanam Prapadye

श्लोक 4

इष्टार्थसिद्धिप्रदमीशपुत्रं मिष्टान्नदं भूसुर कामधेनुम् गङ्गोद्भवं सर्वजनानुकूलं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये
Ishtaarthasiddhipradameeshaputram Mishtaannadam Bhoosura Kaamadhenum Gangodbhavam Sarvajanaanukoolam Brahmanyadevam Sharanam Prapadye

श्लोक 5

यः श्लोकपञ्चमिदं पठतीह भक्त्या ब्रह्मण्यदेव विनिवेशित मानसः सन् प्राप्नोति भोगमखिलं भुवि यद्यदिष्ट- मन्ते स गच्छति मुदा गुहसाम्यमेव इति श्रीसुब्रह्मण्यपञ्चरत्नं समाप्तम्
Yah Shlokapanchamidam Pathateeha Bhaktyaa Brahmanyadeva Viniveshita Maanasah San Praapnoti Bhogamakhilam Bhuvi Yadyadishtam Ante Sa Gacchati Mudaa Guhasaamyameva Iti Shree Subrahmanya Pancharatnam Samaaptam

श्लोक 6

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

श्री सुब्रह्मण्य पञ्चरत्न स्तोत्र शिवपुत्र भगवान सुब्रह्मण्य, यानी मुरुगन, कार्तिकेय और स्कन्द, की स्तुति के पाँच श्लोकों का स्तोत्र है। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स पर 'सुब्रह्मण्यपञ्चरत्नम् २' नाम से उपलब्ध इस पाठ में रचयिता का नाम नहीं है, और आदि शंकराचार्य द्वारा रचित होने का कथन उस स्रोत से समर्थित नहीं है। पंचरत्न का अर्थ पाँच रत्न है। प्रत्येक श्लोक में उनके स्वरूप का वर्णन है और अन्त में 'ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये' की टेक आती है; छठा श्लोक पाठ का फल बताता है। इसका पाठ पूजा में, विशेषकर दक्षिण भारत में, होता है।

क्या आप जानते हैं?

शीर्षक का अर्थ

पंचरत्नम् का अर्थ पाँच रत्न है, यानी पाँच श्लोकों का स्तोत्र। प्रत्येक श्लोक 'ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये' पर समाप्त होता है, जिससे यह छोटी किन्तु पूर्ण प्रार्थना बनती है।

सुब्रह्मण्य कौन हैं?

वे शिवपुत्र कार्तिकेय हैं, जिन्हें मुरुगन, स्कन्द और गुह भी कहते हैं, और देवताओं के सेनापति हैं। श्लोक 1 उन्हें 'सुरलोकनाथ' कहता है।

छह मुख

स्तोत्र 'षडाननं' से आरम्भ होता है, यानी छह मुख वाले। परम्परा कहती है कि कृत्तिकाओं द्वारा पाले गए छह शिशु एक बालक बन गए जिसके छह मुख थे।

गंगा से उद्भव

श्लोक 5 उन्हें 'गङ्गोद्भवं' कहता है, उस कथा की स्मृति में कि शिव का तेज अग्नि और गंगा द्वारा सरकंडों के वन तक पहुँचा, जहाँ उनका जन्म हुआ।

आयुध और वाहन

श्लोक 1 में दिव्य मयूर वाहन, श्लोक 3 में शूल और असि, तथा श्लोक 4 में शक्ति आयुध का उल्लेख है, जिसे तमिल में वेल कहते हैं।

बारह भुजाएँ, बारह नेत्र

श्लोक 3 उन्हें 'द्विषड्भुजं' बारह भुजाओं और बारह दिव्य नेत्रों वाला तथा 'शेषावतारं', यानी शेषनाग का अवतार, कहता है।

फलश्रुति

अन्तिम श्लोक के अनुसार जो इन पाँच श्लोकों का भक्तिपूर्वक पाठ करता है उसे पृथ्वी पर इष्ट भोग मिलते हैं और अन्त में वह 'गुहसाम्य', यानी गुह के समान स्थिति, प्राप्त करता है।

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