सुब्रह्मण्य अष्टोत्तरशत नामावली
यह भगवान सुब्रह्मण्य (कार्तिकेय) के 108 नामों की एक स्तुति है, जिसका पाठ भक्ति, ध्यान और मंगलकामनाओं के लिए किया जाता है।
श्लोक
ध्यानम् एवं मंगलाचरण
१०८ नामों के पाठ से पूर्व देव स्वरूप का पावन ध्यान एवं बीज मन्त्र।
(जो) अजन्मे, शान्त, नित्य युवा, करुणा के धाम, तथा मुकुट, हार, बाजूबन्द और मणि-कुण्डलों से सुशोभित हैं।
श्लोक ध्यान 1
(जो) छह मुख वाले, बारह भुजाओं वाले, शूल आदि अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले, सदा मुस्कुराते मुख वाले, प्रसन्न मूर्ति वाले, और विद्वानों द्वारा स्तुत हैं।
श्लोक ध्यान 2
(जो) वल्ली देवी के प्राणनाथ हैं, मनोवांछित फल देने वाले हैं, सिंहासन पर सुखपूर्वक विराजमान हैं, करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले हैं – मैं भक्तिपूर्वक सदा देवसेनापति गुह का ध्यान करता हूँ।
श्लोक ध्यान 3
१०८ पावन नामावली
भगवान के १०८ दिव्य नाम, जिनका 'ॐ' एवं 'नमः' के साथ अर्चन व जप किया जाता है।
भगवान स्कन्द को नमस्कार।
श्लोक 1
भगवान गुह (गुफा में निवास करने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 2
भगवान षण्मुख (छह मुख वाले) को नमस्कार।
श्लोक 3
भगवान भालनेत्रसुत (शिवपुत्र) को नमस्कार।
श्लोक 4
भगवान प्रभव (उत्पत्ति के स्वामी) को नमस्कार।
श्लोक 5
भगवान पिङ्गल (पीले वर्ण वाले) को नमस्कार।
श्लोक 6
भगवान कृत्तिकासूनु (कृत्तिकाओं के पुत्र) को नमस्कार।
श्लोक 7
भगवान शिखिवाहन (मयूरारूढ़) को नमस्कार।
श्लोक 8
भगवान द्विषड्भुज (बारह भुजाओं वाले) को नमस्कार।
श्लोक 9
भगवान द्विषण्णेत्र (बारह नेत्रों वाले) को नमस्कार।
श्लोक 10
भगवान शक्तिधर (शक्तिहस्त) को नमस्कार।
श्लोक 11
भगवान पिशिताशप्रभञ्जन (मांसभक्षियों का नाश करने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 12
भगवान तारकासुरसंहर्तृ (तारकासुर का संहार करने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 13
भगवान रक्षोबलविमर्दन (राक्षसों की सेना का मर्दन करने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 14
भगवान मत्त (मदमत्त) को नमस्कार।
श्लोक 15
भगवान प्रमत्त (सदा आनंद में मग्न) को नमस्कार।
श्लोक 16
भगवान उन्मत्त (अति आनंदित) को नमस्कार।
श्लोक 17
भगवान सुरसैन्यसुरक्षक (देवसेना की रक्षा करने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 18
भगवान देवासेनापति (देवसेना के सेनापति) को नमस्कार।
श्लोक 19
भगवान प्राज्ञ (परम ज्ञानी) को नमस्कार।
श्लोक 20
भगवान कृपालु (कृपा के सागर) को नमस्कार।
श्लोक 21
भगवान भक्तवत्सल (भक्तों पर स्नेह करने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 22
भगवान उमासुत (उमा के पुत्र) को नमस्कार।
श्लोक 23
भगवान शक्तिधर (पुनः) को नमस्कार।
श्लोक 24
भगवान कुमार (नित्य युवा) को नमस्कार।
श्लोक 25
भगवान क्रौञ्चदारण (क्रौञ्च पर्वत विदारक) को नमस्कार।
श्लोक 26
भगवान सेनानी (सेनापति) को नमस्कार।
श्लोक 27
भगवान अग्निजन्मन् (अग्नि से उत्पन्न) को नमस्कार।
श्लोक 28
भगवान विशाख (विशाख नामक) को नमस्कार।
श्लोक 29
भगवान शङ्करात्मज (शंकरपुत्र) को नमस्कार।
श्लोक 30
भगवान शिवस्वामिन् (शिव के प्रभु) को नमस्कार।
श्लोक 31
भगवान गणस्वामिन् (गणों के स्वामी) को नमस्कार।
श्लोक 32
भगवान सर्वस्वामिन् (सबके स्वामी) को नमस्कार।
श्लोक 33
भगवान सनातन (अनादि-अनंत) को नमस्कार।
श्लोक 34
भगवान अनन्तशक्ति (अनन्त शक्तियों वाले) को नमस्कार।
श्लोक 35
भगवान अक्षोभ्य (अविचल) को नमस्कार।
श्लोक 36
भगवान पार्वतीप्रियनन्दन (पार्वती के प्रिय पुत्र) को नमस्कार।
श्लोक 37
भगवान गङ्गासुत (गंगा के पुत्र) को नमस्कार।
श्लोक 38
भगवान शरोद्भूत (शरवन में उत्पन्न) को नमस्कार।
श्लोक 39
भगवान आहुत (हवन से उत्पन्न) को नमस्कार।
श्लोक 40
भगवान पावकात्मज (अग्निपुत्र) को नमस्कार।
श्लोक 41
भगवान जृम्भ (विस्तार करने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 42
भगवान प्रजृम्भ (प्रकर्ष से फैलने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 43
भगवान उज्जृम्भ (उत्कर्ष से विस्तारित) को नमस्कार।
श्लोक 44
भगवान कमलासनसंस्तुत (ब्रह्मा द्वारा स्तुत) क नमस्कार।
श्लोक 45
भगवान एकवर्ण (एक रंग वाले) क नमस्कार।
श्लोक 46
भगवान द्विवर्ण (द रंगों वाले) क नमस्कार।
श्लोक 47
भगवान त्रिवर्ण (तीन रंगों वाले) को नमस्कार।
श्लोक 48
भगवान सुमनोहर (अति सुन्दर) को नमस्कार।
श्लोक 49
भगवान चतुर्वर्ण (चार रंगों वाले) को नमस्कार।
श्लोक 50
भगवान पञ्चवर्ण (पाँच रंगों वाले) को नमस्कार।
श्लोक 51
भगवान प्रजापति (प्रजा के स्वामी) को नमस्कार।
श्लोक 52
भगवान अहस्पति (दिन के स्वामी) को नमस्कार।
श्लोक 53
भगवान अग्निगर्भ (अग्निगर्भ) को नमस्कार।
श्लोक 54
भगवान शमीगर्भ (शमी वृक्ष के गर्भ में रहने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 55
भगवान विश्वरेतस् (विश्व के तेज वाले) को नमस्कार।
श्लोक 56
भगवान सुरारिघ्न (देवशत्रु संहारक) को नमस्कार।
श्लोक 57
भगवान हरिवर्ण (हरित वर्ण वाले) क नमस्कार।
श्लोक 58
भगवान शुभकर (शुभ कर्ने वाले) क नमस्कार।
श्लोक 59
भगवान वसुमत् (धन-संपत्) क नमस्कार।
श्लोक 60
भगवान वटुवेषभृत् (बटु-वेष धारक) क नमस्कार।
श्लोक 61
भगवान पूषन् (पोषक) को नमस्कार।
श्लोक 62
भगवान गभस्ति (किरणमय) को नमस्कार।
श्लोक 63
भगवान गहन (गहन/दुर्बोध) को नमस्कार।
श्लोक 64
भगवान चन्द्रवर्ण (चन्द्र समान वर्ण वाले) को नमस्कार।
श्लोक 65
भगवान कलाधर (कलाधारी) को नमस्कार।
श्लोक 66
भगवान मायाधर (माया धारक) को नमस्कार।
श्लोक 67
भगवान महामायिन् (महामाया वाले) को नमस्कार।
श्लोक 68
भगवान कैवल्य (मोक्षस्वरूप) को नमस्कार।
श्लोक 69
भगवान शङ्करात्मज (शंकरपुत्र) को नमस्कार।
श्लोक 70
भगवान विश्वयोनि (विश्वकारण) को नमस्कार।
श्लोक 71
भगवान अमेयात्मन् (अप्रमेय स्वरूप) को नमस्कार।
श्लोक 72
भगवान तेजोनिधि (तेजोनिधान) को नमस्कार।
श्लोक 73
भगवान अनामय (रोगरहित) को नमस्कार।
श्लोक 74
भगवान परमेष्ठिन् (परम स्थान में स्थित) को नमस्कार।
श्लोक 75
भगवान परब्रह्मन् (परब्रह्मरूप) को नमस्कार।
श्लोक 76
भगवान वेदगर्भ (वेदों को गर्भ में धारण करने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 77
भगवान विराट्सुत (विराटपुरुष के पुत्र) को नमस्कार।
श्लोक 78
भगवान पुलिन्दकन्याभर्त (वल्ली के पति) को नमस्कार।
श्लोक 79
भगवान महासारस्वतव्रत (महान सारस्वत व्रत वाले) को नमस्कार।
श्लोक 80
भगवान आश्रिताखिलदात्र (शरणागत सबको देने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 81
भगवान चोरघ्न (चोरों का नाश करने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 82
भगवान रोगनाशन (रोगनाशक) को नमस्कार।
श्लोक 83
भगवान अनन्तमूर्ति (अनन्त रूप वाले) को नमस्कार।
श्लोक 84
भगवान आनन्द (आनन्दस्वरूप) को नमस्कार।
श्लोक 85
भगवान शिखण्डिकृतकेतन (मोरपंख ध्वज वाले) को नमस्कार।
श्लोक 86
भगवान डम्भ (दम्भहारी) को नमस्कार।
श्लोक 87
भगवान परमडम्भ (परम दम्भ) को नमस्कार।
श्लोक 88
भगवान महाडम्भ (महादम्भ) को नमस्कार।
श्लोक 89
भगवान वृषाकपि (धर्मरक्षक) को नमस्कार।
श्लोक 90
भगवान कारणोपात्तदेह (कारण से देह धारिणे) को नमस्कार।
श्लोक 91
भगवान कारणातीतविग्रह (कारण से परे स्वरूप वाले) को नमस्कार।
श्लोक 92
भगवान अनीश्वर (स्वतंत्र) को नमस्कार।
श्लोक 93
भगवान अमृत (अमृतस्वरूप) को नमस्कार।
श्लोक 94
भगवान प्राण (प्राणस्वरूप) को नमस्कार।
श्लोक 95
भगवान प्राणायामपरायण (प्राणायाम में तत्पर) को नमस्कार।
श्लोक 96
भगवान विरुद्धहन्तृ (विरोधी के नाशक) को नमस्कार।
श्लोक 97
भगवान वीरघ्न (वीरों के नाशक) को नमस्कार।
श्लोक 98
भगवान रक्तश्यामगल (रक्त-श्याम कण्ठ वाले) को नमस्कार।
श्लोक 99
भगवान श्यामकन्धर (श्याम कंधों वाले) को नमस्कार।
श्लोक 100
भगवान महत् (महान) को नमस्कार।
श्लोक 101
भगवान सुब्रह्मण्य (सुब्रह्मण्य) को नमस्कार।
श्लोक 102
भगवान गुहप्रीत (गुह को प्रिय) को नमस्कार।
श्लोक 103
भगवान ब्रह्मण्य (ब्रह्म से सम्बन्धित) को नमस्कार।
श्लोक 104
भगवान ब्राह्मणप्रिय (ब्राह्मणों को प्रिय) को नमस्कार।
श्लोक 105
भगवान वेदवेद्य (वेदों से ज्ञेय) को नमस्कार।
श्लोक 106
भगवान अक्षयफलप्रद (अक्षय फल देने वाले) को नमस्कार।
श्लोक 107
भगवान वल्ली देवसेनासमेत श्री सुब्रह्मण्यस्वामिन् (वल्ली और देवसेना सहित) क नमस्कार।
श्लोक 108
समापनम् एवं फलश्रुति
पाठ की पूर्णाहुति, ईश्वर को समर्पण एवं माहात्म्य।
इस्त प्रकार भगवान सुब्रह्मण्य की अष्टोत्तरशत नामावली संपूर्ण हुई।
श्लोक समापनम्
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह सुब्रह्मण्य अष्टोत्तरशत नामावली भगवान सुब्रह्मण्य (जिन्हें कार्तिकेय, मुरुगन या षण्मुख भी कहा जाता है) के 108 नामों का एक पवित्र संग्रह है। यह मुख्यतः दक्षिण भारत की स्कंद परंपरा से जुड़ा हुआ है और प्रायः मंदिरों में पूजा के दौरान या व्यक्तिगत ध्यान-भक्ति के लिए पढ़ा जाता है। इसका पाठ भक्त को भगवान के विभिन्न गुणों और रूपों का स्मरण कराता है तथा मनोकामनाओं की पूर्ति का माध्यम माना जाता है।
क्या आप जानते हैं?
परिचय
यह 'सुब्रह्मण्य अष्टोत्तरशत नामावली' है, जिसमें भगवान सुब्रह्मण्य (कार्तिकेय/मुरुगन) के 108 नामों का संकलन है। प्रारंभिक ध्यान श्लोक में उनके छह मुख, बारह भुजाएँ, मोर पर आसीन और वल्ली-देवसेना सहित स्वरूप का वर्णन है।
संरचना
प्रत्येक नाम के पहले 'ॐ' और बाद में 'नमः' जोड़ा गया है, जो जप के लिए आदर्श है। अंतिम नाम (108वाँ) वल्ली और देवसेना सहित 'श्री सुब्रह्मण्यस्वामिने नमः' है, जो पूर्ण आराधना को दर्शाता है।
प्रमुख नाम
'षण्मुखाय' (छह मुख वाले), 'शिखिवाहनाय' (मोर पर सवार), 'तारकासुरसंहर्त्रे' (तारकासुर का वध करने वाले) और 'क्रौञ्चदारणाय' (क्रौंच पर्वत को तोड़ने वाले) जैसे नाम उनकी प्रसिद्ध लीलाओं को स्मरण कराते हैं।
पौराणिक संदर्भ
'वल्लीदेवीप्राणनाथ' और 'देवसेनापतये' नाम उनकी दो पत्नियों—वल्ली (आदिवासी कन्या) और देवसेना (इंद्र की पुत्री)—से संबंध बताते हैं। 'गङ्गासुताय' और 'शरोद्भूताय' नाम उनके गंगा से उत्पन्न होने और सरवन (बाणों के समूह) से जन्म लेने की कथा की ओर संकेत करते हैं।
विशेषता
इसमें 'जृम्भाय', 'प्रजृम्भाय', 'उज्जृम्भाय' जैसे रहस्यमय नाम भी हैं, जो भगवान के अलौकिक और अप्रतिम स्वरूप को दर्शाते हैं। यह नामावली प्रायः पूजा के समय और स्कंद षष्ठी जैसे अवसरों पर पढ़ी जाती है।
Murugan
हिन्दू धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
