सङ्कटनाशन गणेश स्तोत्रम् नारद पुराण से उद्भूत ८ श्लोकों की अत्यंत प्रसिद्ध और चमत्कारी प्रार्थना है। इसमें भगवान श्रीगणेश के बारह प्रमुख नामों (वक्रतुण्ड, एकदन्त, कृष्णपिङ्गाक्ष, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्नराजेन्द्र, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक, गणपति, गजानन) का स्मरण किया गया है। मान्यता है कि इसका नित्य पाठ जीवन के कठिन से कठिन संकटों को समाप्त कर सुख, विद्या, धन और कार्यसिद्धि प्रदान करता है।
श्लोक
भगवान गौरीपुत्र विनायक को मस्तक झुकाकर प्रणाम करके, भक्तों के हृदय में नित्य वास करने वाले उन देव का दीर्घायु, अभीष्ट कामनाओं, धन और समस्त सिद्धियों की प्राप्ति के लिए प्रतिदिन स्मरण करना चाहिए।
श्लोक 1
पहला नाम 'वक्रतुण्ड' (घुमावदार सूंड वाले), दूसरा 'एकदन्त' (एक दांत वाले), तीसरा 'कृष्णपिङ्गाक्ष' (काली और भूरी दीप्तिमान आँखों वाले), और चौथा नाम 'गजवक्त्र' (हाथी के मुख वाले) है;
श्लोक 2
पाँचवाँ नाम 'लम्बोदर' (विशाल उदर वाले), छठा 'विकट' (विकराल और भव्य स्वरूप वाले), सातवाँ 'विघ्नराजेन्द्र' (विघ्नों के अधिपति राजा), और आठवाँ नाम 'धूम्रवर्ण' (धुएं के रंग वाले) है;
श्लोक 3
नौवाँ नाम 'भालचन्द्र' (मस्तक पर बालचंद्र धारण करने वाले), दसवाँ 'विनायक' (सर्वश्रेष्ठ नायक), ग्यारहवाँ 'गणपति' (गणों के स्वामी), और बारहवाँ नाम 'गजानन' (हाथी के समान मुख वाले) है;
श्लोक 4
जो मनुष्य प्रातः, दोपहर और संध्या—तीनों समय इन बारह नामों का पाठ करता है, उसे किसी भी प्रकार के विघ्न का भय नहीं रहता; यह स्तोत्र समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाला है।
श्लोक 5
विद्या की कामना करने वाला विद्या पाता है, धन चाहने वाले को धन मिलता है, पुत्र की इच्छा रखने वाले को उत्तम संतान प्राप्त होती है, और मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले को परम गति (मुक्ति) प्राप्त होती है।
श्लोक 6
इस गणपति स्तोत्र का नियमित जप करने से छह महीने में अभीष्ट फल मिलने लगता है, और एक वर्ष के भीतर पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
श्लोक 7
जो व्यक्ति इस स्तोत्र को लिखकर आठ ब्राह्मणों (विद्वान साधकों) को श्रद्धापूर्वक समर्पित करता है, उसे भगवान श्रीगणेश की कृपा से समस्त प्रकार की विद्याओं और ज्ञान की सहज प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार श्री नारद पुराण में वर्णित 'संकटनाशन गणेश स्तोत्र' संपूर्ण हुआ।
श्लोक 8
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
फलश्रुतिनित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
नारद पुराण में वर्णित यह स्तोत्र संकष्टी चतुर्थी, गणेश चतुर्थी और दैनिक पूजा में विशेष रूप से पढ़ा जाता है। विद्यार्थी परीक्षाओं से पूर्व और व्यवसायी नए कार्यों के आरंभ में इसका पाठ करते हैं। मान्यता है कि छह माह के निरंतर पाठ से जटिल से जटिल समस्याओं का समाधान हो जाता है।
क्या आप जानते हैं?
द्वादश पावन नाम (श्लोक २-४)
श्लोक २ से ४ में भगवान गणेश के बारह चमत्कारी नामों (वक्रतुण्ड, एकदन्त, कृष्णपिङ्गाक्ष, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्नराजेन्द्र, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक, गणपति, गजानन) का विधान है, जो उनकी सर्वव्यापक सुरक्षा शक्ति के प्रतीक हैं।
छह माह और एक वर्ष की फलश्रुति (श्लोक ७)
श्लोक ७ में स्पष्ट समय-सीमा बताई गई है कि छह महीने में स्तोत्र का अभीष्ट फल प्रकट होने लगता है ('षड्भिर्मासैः फलं लभेत्') और एक वर्ष में कार्य की पूर्ण सिद्धि हो जाती है।
चतुर्विध कामनाओं की पूर्ति (श्लोक ६)
श्लोक ६ में मानव जीवन के चार मुख्य लक्ष्यों की प्राप्ति का आश्वासन है—विद्यार्थी को विद्या, धनार्थी को धन, पुत्रार्थी को संतान और मोक्षार्थी को परम गति मिलती है।
ज्ञान-दान का महात्म्य (श्लोक ८)
श्लोक ८ में इस स्तोत्र को लिखकर आठ विद्वानों को भेंट करने का विधान है, जो यह सिखाता है कि आध्यात्मिक ज्ञान का निस्वार्थ प्रसार ही गणेश जी की प्रसन्नता का सर्वोत्तम उपाय है।
'भक्तावास' का गूढ़ अर्थ (श्लोक १)
प्रथम श्लोक में गणपति को 'भक्तावास' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे किसी अगम्य लोक में नहीं, अपितु अपने अनन्य भक्तों के हृदय-मंदिर में ही सदा निवास करते हैं।
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