सबके कल्याण का कबीर-दोहा
कबीर के नाम से प्रचलित दोहा: बाजार में खड़े होकर वे सबकी खैर माँगते हैं, न किसी से दोस्ती, न किसी से बैर।
श्लोक
कबीर साहब बाजार में खड़े होकर सबकी भलाई चाहते हैं। न किसी से दोस्ती, न किसी से बैर।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह दोहा लोकप्रिय रूप से कबीर के नाम से जाना जाता है, जो 15वीं शताब्दी के बनारस के जुलाहे-संत और निर्गुण संत परंपरा के स्वर थे। स्रोत के बारे में स्पष्ट बात: हमें यह दोहा कविताकोश पर कबीर दोहावली के पाठ में नहीं मिला, इसलिए इसका कबीर-कर्तृत्व किसी सत्यापित पांडुलिपि या मुद्रित संदर्भ पर नहीं, बल्कि मौखिक और लोक परंपरा पर टिका है। सत्संगों और प्रवचनों में इसे समभाव और सर्वजन-कल्याण की भावना के रूप में उद्धृत किया जाता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Kabir · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं शताब्दी, वाराणसी
वाराणसी के एक रहस्यवादी कवि एवं पेशे से जुलाहे, जिनके स्पष्ट एवं बिंबयुक्त दोहों ने कर्मकांड एवं जातिगत भेदों को नकारते हुए प्रत्यक्ष, निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया। उनकी वाणी हिंदू, सिख (जिनमें से कई गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं), एवं सूफी-प्रभावित परंपराओं में समान रूप से आदरणीय है।
क्या आप जानते हैं?
कवि
यह दोहा 15वीं सदी के संत कवि कबीर के नाम से प्रचलित है, जो निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रमुख कवि थे। किसी सत्यापित कबीर-संग्रह में इसका स्थान अभी स्थापित नहीं है।
भाव
कबीर यहाँ एक ऐसे व्यक्ति का चित्रण करते हैं जो बिना किसी पक्षपात के सबका कल्याण चाहता है — न किसी से दोस्ती, न दुश्मनी। यह वैराग्य और समभाव का आदर्श है।
भाषा
यह दोहा सधुक्कड़ी (खड़ी बोली, ब्रज, अवधी का मिश्रण) में है, जो कबीर की सामान्य शैली है। 'खैर' शब्द का अर्थ है भलाई या कुशलता।
संदर्भ
यह दोहा कबीर के सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। वे संसार के बीच में रहकर भी आसक्ति और द्वेष से मुक्त रहने का उपदेश देते हैं।
प्रसिद्धता
यह दोहा हिंदी साहित्य में अत्यंत लोकप्रिय है और अक्सर समभाव, निष्पक्षता और सार्वभौमिक प्रेम के प्रतीक के रूप में उद्धृत किया जाता है।
Sant Kabir
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