वाणी की शीतलता
यह एक छोटा सा दोहा है जो हमें सिखाता है कि हमें ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो दूसरों को शीतलता और सुकून दे, और खुद भी शीतल बने रहें। इसमें अहंकार को त्यागने और विनम्रता से बोलने की सीख दी गई है।
श्लोक
ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिससे मन का अहंकार और क्रोध समाप्त हो जाए। वह वाणी दूसरों को शीतलता प्रदान करे और स्वयं भी शीतल हो जाए।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह दोहा संत कबीर की वाणी का एक प्रसिद्ध अंश है, जो भक्ति और सदाचार पर आधारित है। कबीर के दोहे आमतौर पर सरल भाषा में गहरी सीख देते हैं और इन्हें रोज़मर्रा के जीवन में सोचने-समझने के लिए पढ़ा जाता है। यह दोहा विशेष रूप से वाणी की मिठास और शीतलता पर जोर देता है, जो संत परंपरा में एक महत्वपूर्ण गुण माना गया है। यह दोहा कविताकोश पर कबीर दोहावली के पहले पृष्ठ में दोहा 34 के रूप में कबीर के नाम से दर्ज है; दोहावली बाद का संकलन है, इसलिए कर्तृत्व इसी मुद्रित परंपरा पर टिका है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Kabir · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं शताब्दी, वाराणसी
वाराणसी के एक रहस्यवादी कवि एवं पेशे से जुलाहे, जिनके स्पष्ट एवं बिंबयुक्त दोहों ने कर्मकांड एवं जातिगत भेदों को नकारते हुए प्रत्यक्ष, निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया। उनकी वाणी हिंदू, सिख (जिनमें से कई गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं), एवं सूफी-प्रभावित परंपराओं में समान रूप से आदरणीय है।
क्या आप जानते हैं?
रचनाकार
यह दोहा 15वीं शताब्दी के संत कवि कबीरदास का है, जो भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उनकी वाणी सीधी, मार्मिक और सार्वभौमिक होती है।
छंद संरचना
यह 'दोहा' छंद में रचित है, जिसमें पहली और तीसरी पंक्ति में 13 मात्राएँ तथा दूसरी और चौथी में 11 मात्राएँ होती हैं। यह हिंदी साहित्य का सबसे लोकप्रिय छंद है।
मूल संदेश
कबीर वाणी की ऐसी शैली अपनाने का उपदेश देते हैं जो अहंकार ('आपा') को समाप्त कर दे। ऐसी वाणी सुनने वाले को शीतलता प्रदान करती है और बोलने वाले को भी शांत करती है।
सांस्कृतिक प्रभाव
यह दोहा भारतीय समाज में 'मीठी वाणी' के महत्व को रेखांकित करता है और अक्सर नैतिक शिक्षा, प्रवचनों और दैनिक जीवन में उद्धृत किया जाता है।
व्यावहारिक व्याख्या
'आपा' का अर्थ अहंकार या स्वार्थ है। कबीर कहते हैं कि वाणी को अहंकार रहित करके बोलना चाहिए, ताकि वह दूसरों को शीतल करे और स्वयं भी शीतल हो जाए — अर्थात् वक्ता और श्रोता दोनों को लाभ पहुँचे।
Sant Kabir
कबीर पंथ से और
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एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
