प्रेम का सच्चा ज्ञान
कबीर का प्रसिद्ध दोहा (दोहावली 210): पोथियाँ पढ़-पढ़कर संसार थक गया, पर पंडित वही है जो प्रेम के ढाई आखर पढ़ ले।
श्लोक
संसार में लोग अनेकों पोथियाँ पढ़-पढ़कर मर गए, पर कोई सच्चा पंडित नहीं बना। जो प्रेम के ढाई अक्षर (प्रेम का सार) पढ़ लेता है, वही वास्तव में पंडित होता है।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
कबीर 15वीं शताब्दी के बनारस के जुलाहे-संत और भक्ति आंदोलन की निर्गुण संत परंपरा के प्रमुख स्वर थे। यह दोहा कबीर दोहावली में दोहा संख्या 210 के रूप में दर्ज है (कविताकोश, पृष्ठ ३); दोहावली में पाठ 'पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ' और 'पढ़ै सो पंडित होय' है, जो यहाँ दिए रूप का निकट पाठांतर है। सत्संगों और पाठशालाओं में इसे यह कहने के लिए सुनाया जाता है कि आंतरिक भक्ति बाहरी पांडित्य से बढ़कर है। 'ढाई आखर' को परंपरा में 'प्रेम' शब्द के रूप में पढ़ा जाता है। कबीर की साखियों और पदों के मानक संग्रह, जैसे बीजक और कबीर ग्रंथावली, इस परंपरा का व्यापक पाठ-आधार हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित कबीर के पद और श्लोक दोहावली से अलग रचनाएँ हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Kabir · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं शताब्दी, वाराणसी
वाराणसी के एक रहस्यवादी कवि एवं पेशे से जुलाहे, जिनके स्पष्ट एवं बिंबयुक्त दोहों ने कर्मकांड एवं जातिगत भेदों को नकारते हुए प्रत्यक्ष, निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया। उनकी वाणी हिंदू, सिख (जिनमें से कई गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं), एवं सूफी-प्रभावित परंपराओं में समान रूप से आदरणीय है।
क्या आप जानते हैं?
रचयिता
यह दोहा संत कबीर (15वीं शताब्दी) का है और कबीर दोहावली में दोहा संख्या 210 के रूप में दर्ज है (कविताकोश, पृष्ठ ३)। उनकी अधिकांश वाणी की तरह यह भी मौखिक रूप से चली, इसलिए संग्रहों में पाठ थोड़ा भिन्न मिलता है।
'ढाई आखर' की व्याख्या
'ढाई आखर' को परंपरा में 'प्रेम' शब्द के रूप में पढ़ा जाता है। गिनती की व्याख्याएँ अलग-अलग हैं, जैसे संयुक्ताक्षर 'प्र' को आधा अक्षर मानना, पर भाव एक ही है: प्रेम लिखने में छोटा है और पंडित बनाने के लिए पर्याप्त है।
अर्थ
कबीर कहते हैं कि केवल पोथियाँ पढ़ने से कोई सच्चा पंडित नहीं बनता। असली ज्ञान प्रेम के ढाई आखर को समझने और जीने में है।
संदर्भ
यह दोहा पाखंडी पांडित्य और शास्त्रों के अंधानुकरण की कबीर की आलोचना को दर्शाता है। वे बाहरी कर्मकांड और किताबी ज्ञान के बजाय आंतरिक भक्ति और प्रेम को सर्वोपरि मानते हैं।
पाठ-टिप्पणी
दोहावली में पाठ 'पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ' और 'पढ़ै सो पंडित होय' है, जबकि इस पृष्ठ पर 'पोथी पढ़ि-पढ़ि' और 'पढ़े सो पंडित होय' है। ये एक ही दोहे के वर्तनी और बोली के भेद हैं।
Sant Kabir
कबीर पंथ से और
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एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
