राम का नाम
सच्चा साथी
फिल्म 'गोपी' (1970) का राजेन्द्र कृष्ण-रचित गीत: संसार नश्वर है और राम का नाम ही सच्चा साथी है।
श्लोक
सुख के समय तो सब साथी बन जाते हैं, पर दुःख में कोई नहीं रहता। हे मेरे राम, आपका नाम ही एक सच्चा सहारा है, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं।
श्लोक 1
यह जीवन तो आने-जाने वाली छाया के समान है, यह माया और यह शरीर दोनों ही झूठे हैं। फिर क्यों तूने सारी उम्र पापों का बोझ अपने सिर पर ढोया?
श्लोक 2
न कुछ तेरा है, न कुछ मेरा; यह संसार तो योगी के समान एक भ्रमणशील खेल है। चाहे राजा हो या भिखारी, सबका अंत एक समान ही होता है।
श्लोक 3
तू बाहर की मिट्टी को देखने में लगा रहता है, पर अपने मन के भीतर क्यों नहीं झाँकता? तूने बाहरी सफेद तन पर अभिमान किया, पर मन की मैल को कभी नहीं धोया।
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह गीत राजेन्द्र कृष्ण ने 1970 की हिंदी फिल्म 'गोपी' के लिए लिखा, जिसका संगीत कल्याणजी-आनंदजी ने दिया और स्वर मोहम्मद रफ़ी का है; परदे पर यह दिलीप कुमार पर फिल्माया गया। यह फिल्मी गीत होते हुए भी भजन की तरह गाया जाता है। संसार की नश्वरता और राम-नाम के एकमात्र सहारे की बात भक्ति की लंबी परंपरा से जुड़ती है, जिसमें तुलसीदास का रामचरितमानस (1574) भी है, पर ये पंक्तियाँ आधुनिक रचना हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Rajendra Krishan
क्या आप जानते हैं?
भजन का मुख्य संदेश
यह भजन जीवन की नश्वरता और भगवान के नाम की सच्चाई पर केंद्रित है। 'सुख के सब साथी, दुःख में ना कोई' पंक्ति बताती है कि सांसारिक रिश्ते केवल सुख के समय ही साथ देते हैं, जबकि राम का नाम ही एकमात्र सच्चा सहारा है।
जीवन की क्षणभंगुरता
दूसरे छंद में जीवन को 'आनी जानी छाया' (आने-जाने वाली परछाई) और शरीर को 'झूठी माया' कहा गया है। यह संसार को मिथ्या मानने वाले अद्वैत दर्शन की ओर संकेत करता है।
सभी के लिए समान अंत
'राजा हो या रंक सभी का अंत एक सा होई' पंक्ति मृत्यु की सार्वभौमिकता को दर्शाती है। चाहे कोई राजा हो या भिखारी, सबका अंत एक समान है – यह एक गहरा आध्यात्मिक सत्य है।
बाहरी शुद्धता बनाम आंतरिक मैल
अंतिम छंद में बाहरी शरीर को सजाने और भीतर के मन की मैल न धोने की निंदा की गई है। यह सिखाता है कि सच्ची पवित्रता मन की शुद्धि में है, न कि केवल बाहरी दिखावे में।
भाषा और शैली
यह भजन सरल हिंदी में लिखा गया है, जिसमें 'मेरे राम' जैसे संबोधन से भक्त और भगवान के बीच घनिष्ठ संबंध का पता चलता है। इसमें 'गठड़ी ढोई' (पापों का बोझ ढोना) और 'जोगीवाला फेरा' (योगी के समान भटकना) जैसे लोकप्रिय मुहावरों का प्रयोग हुआ है।
फिल्मी स्रोत
यह गीत 1970 की फिल्म 'गोपी' का है; गीतकार राजेन्द्र कृष्ण, संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी और गायक मोहम्मद रफ़ी हैं।
Rama
हिन्दू धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
