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Embroidered artwork for आत्मनिरीक्षण का दोहा: Sant Kabir seated at his weaving loom with an ektara, in an embroidered riverside scene

आत्मनिरीक्षण का दोहा

आत्मनिरीक्षण का दोहा

कबीर के नाम से प्रचलित यह दोहा सिखाता है कि दूसरों में बुराई खोजने से पहले अपने मन को देखो; भीतर झाँकने पर अपनी ही कमी सबसे बड़ी दिखती है।

श्लोक

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय
Bura Jo Dekhan Main Chala, Bura Na Miliya Koy. Jo Dil Khoja Aapna, Mujhsa Bura Na Koy.

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह दोहा लोक-परंपरा में संत कबीर (लगभग 1440–1518) के नाम से प्रसिद्ध है, जो बनारस के जुलाहे-संत और निर्गुण संत परंपरा के स्वर थे। कविताकोश पर कबीर के 'नीति के दोहे' पृष्ठ में यह शामिल है, जहाँ दूसरी पंक्ति 'जो मन खोजा अपना, मुझ-सा बुरा न कोय' रूप में है। स्रोत की टिप्पणी: हम इसे कविताकोश पर कबीर दोहावली के पाठ में पुष्ट नहीं कर सके, इसलिए इसका कबीर-कर्तृत्व इसी लोकप्रिय संकलन और परंपरा पर टिका है, किसी सत्यापित पांडुलिपि पर नहीं। कबीर ग्रंथावली के एक संस्करण की भूमिका (हिंदी विकिस्रोत) में इसे कबीर की साखियों के उदाहरण के रूप में उद्धृत किया गया है, जहाँ पंक्ति 'जग में बुरा न कोय' रूप में मिलती है। यह दोहा गुरु ग्रंथ साहिब में नहीं है और किसी सिख गुरु की रचना नहीं है। सत्संगों में इसे आत्मचिंतन और विनम्रता की सीख के रूप में सुनाया जाता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Sant Kabir · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं शताब्दी, वाराणसी

वाराणसी के एक रहस्यवादी कवि एवं पेशे से जुलाहे, जिनके स्पष्ट एवं बिंबयुक्त दोहों ने कर्मकांड एवं जातिगत भेदों को नकारते हुए प्रत्यक्ष, निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया। उनकी वाणी हिंदू, सिख (जिनमें से कई गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं), एवं सूफी-प्रभावित परंपराओं में समान रूप से आदरणीय है।

क्या आप जानते हैं?

रचनाकार

यह दोहा लोक-परंपरा में संत कबीरदास (15वीं शताब्दी, बनारस के जुलाहे-संत और निर्गुण परंपरा के प्रमुख कवि) के नाम से प्रसिद्ध है। किसी सत्यापित कबीर-संग्रह में इसका स्थान सिद्ध नहीं है (ऊपर स्रोत-टिप्पणी देखें); यह सिख ग्रंथ की रचना नहीं है।

दोहा छंद

यह दोहा है, दो पंक्तियों का मात्रिक छंद, जिसकी हर पंक्ति के दो चरणों में लगभग 13 और 11 मात्राएँ होती हैं। दोहे मौखिक परंपरा के लिए रचे गए, इसलिए एक ही दोहा कई रूपों में चलता है।

मुख्य संदेश

कबीर कहते हैं कि जब मैं दूसरों में बुराई देखने निकला तो कोई बुरा नहीं मिला; पर जब अपने ही मन को खोजा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं। यह आत्मनिरीक्षण और विनम्रता की सीख है।

पाठ-भेद

यहाँ दूसरी पंक्ति 'जो दिल खोजा आपना' रूप में है; कविताकोश के पृष्ठ पर 'जो मन खोजा अपना, मुझ-सा बुरा न कोय' मिलता है, और कबीर ग्रंथावली की भूमिका (हिंदी विकिस्रोत) में पहली पंक्ति 'जग में बुरा न कोय' रूप में उद्धृत है। दोनों रूपों का भाव एक ही है।

महत्व

कबीर के नाम से बहुत उद्धृत की जाने वाली पंक्तियों में यह एक है। निर्गुण परंपरा बाहरी दिखावे से ऊपर आंतरिक शुद्धि को रखती है, और यह दोहा उसी दृष्टि का सबसे सरल रूप है।

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