Bharat Devotion

Canonical Dhammapada

गाथा

गाथा

आत्म वर्ग में 10 अत्यंत प्रसिद्ध गाथाएँ (157–166) संकलित हैं, जो आध्यात्मिक साधना में आत्म-निर्भरता और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व को रेखांकित करती हैं। विश्वप्रसिद्ध गाथा 160—'अत्ता हि अत्तनो नाथो' (व्यक्ति स्वयं ही अपना स्वामी और रक्षक है, दूसरा कौन उसका रक्षक हो सकता है?)—के माध्यम से भगवान बुद्ध बाह्य आश्रयों को अस्वीकार कर स्वयं के दमन से दुर्लभ शरण पाने की प्रेरणा देते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि पवित्रता और अपवित्रता सर्वथा व्यक्तिगत हैं: मनुष्य स्वयं ही पाप करता है और स्वयं ही शुद्ध होता है; कोई दूसरा किसी अन्य को शुद्ध नहीं कर सकता।

10 verses
गाथा

बुद्ध वर्ग में 18 परम पावन गाथाएँ (179–196) संकलित हैं, जो बौद्ध धर्म के केंद्रीय सार और तथागत बुद्ध के स्वरूप को उद्घाटित करती हैं। इसमें समस्त बुद्धों का मूल संदेश उद्घोषित करने वाली सर्वाधिक प्रसिद्ध गाथा 183 समाहित है: 'सब पापों से दूर रहना, कुशल (पुण्य) कर्मों का संचय करना और अपने चित्त को सर्वथा परिशुद्ध करना—यही सब बुद्धों का शासन (शिक्षा) है।' भयभीत होकर पर्वतों, वृक्षों और देवस्थानों की शरण में जाने को असुरक्षित बतलाते हुए बुद्ध त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म, संघ) और चार आर्य सत्यों की शरण को ही संसार के समस्त दुःखों से मुक्त कराने वाली सर्वोच्च शरण सिद्ध करते हैं।

18 verses
गाथा

लोक वर्ग में 12 तेजस्वी गाथाएँ (167–178) संकलित हैं, जो संसार की चकाचौंध और मायावी आकर्षण के पार देखने की प्रेरणा देती हैं। भगवान बुद्ध बताते हैं कि जो व्यक्ति इस संसार को पानी के बुलबुले या मृगतृष्णा (मरीचिका) के समान क्षणभंगुर देखता है, मृत्यु का राजा (यम) उसे नहीं देख पाता। जो पहले प्रमादी रहकर बाद में अप्रमादी हो जाता है अथवा अपने पूर्व पापों को पुण्य कर्मों से ढक देता है, वह बादलों से मुक्त पूर्णिमा के चंद्रमा की भाँति पूरे संसार को आलोकित करता है। अध्याय के अंत में तथागत घोषणा करते हैं कि संपूर्ण पृथ्वी का एकछत्र साम्राज्य पाने अथवा स्वर्ग जाने की तुलना में सोतापत्ति (आर्य मार्ग में प्रथम प्रवेश) का फल अनंत गुना श्रेष्ठ है।

12 verses
गाथा

प्रिय वर्ग में 12 मनोवैज्ञानिक गाथाएँ (209–220) संगृहीत हैं, जो सांसारिक प्रियता, मोह और आसक्ति को ही समस्त शोक और भय की जड़ सिद्ध करती हैं। गाथा 212 से 216 तक पाँच अनवरत सूत्रों में तथागत समझाते हैं कि 'प्रिय से शोक उपजता है, प्रिय से भय उपजता है; जो प्रियता से विमुक्त है, उसे न कोई शोक है और न कोई भय।' अध्याय का समापन विदेश से सकुशल लौटे प्रियजन के गृह-प्रवेश के सुंदर दृष्टांत से होता है: जिस प्रकार परदेस से लौटे बंधु का सगे-संबंधी हर्षोल्लास से स्वागत करते हैं, उसी प्रकार परलोक जाने वाले पुण्यात्मा मनुष्य का उसके द्वारा संचित किए गए पुण्य आत्मीयता से स्वागत करते हैं।

12 verses
गाथा

सुख वर्ग में 12 आनंदमयी गाथाएँ (197–208) संगृहीत हैं, जो भौतिक उपभोग के स्थान पर मानसिक शांति, अद्वेष और तृष्णा-मुक्ति को सच्चा सुख सिद्ध करती हैं। 'अहो! हम वैरियों के बीच निर्वैर होकर कितना सुखपूर्वक जीते हैं!'—इस दिव्य उल्लास के साथ तथागत संसार की प्रतिस्पर्धा को दुःख का मूल बताते हुए कहते हैं कि जीत से वैर उपजता है और पराजित दुःख में सोता है, किंतु जो जय और पराजय दोनों को छोड़ देता है वही शांत होकर सुख की नींद सोता है। इसी वर्ग में प्रसिद्ध सूत्र समाहित है: 'आरोग्य परम लाभ है, संतोष परम धन है, विश्वास परम बंधु है, और निर्वाण परम सुख है।' (गाथा 204)।

12 verses