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Embroidered artwork for जरा वर्ग: वृद्धावस्था और नश्वरता (गाथा 146–156): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

जरा वर्ग

वृद्धावस्था और नश्वरता (गाथा 146–156)

धम्मपद का जरा वर्ग (गाथा 146–156): शरीर की नश्वरता, तृष्णा रूपी गृह-निर्माता वाली गाथाएँ और अप्रमाद का संदेश।

श्लोक

१४६। को नु हासो किमानन्दो, निच्चं पज्जलिते सति; अन्धकारेन ओनद्धा, पदीपं न गवेसथ।

श्लोक 1

१४७। पस्स चित्तकतं बिम्बं, अरुकायं समुस्सितं; आतुरं बहुसङ्कप्पं, यस्स नत्थि धुवं ठिति।

श्लोक 2

१४८। परिजिण्णमिदं रूपं, रोगनीऌअं पभङ्गुरं; भिज्जति पूतिसन्देहो, मरणन्तञ्हि जीवितं।

श्लोक 3

१४९। यानिमानि अपत्थानि, अलाबूनेव सारदे; कापोतकानि अट्ठीनि, तानि दिस्वान का रति।

श्लोक 4

१५०। अट्ठीनं नगरं कतं, मंसलोहितलेपनं; यत्थ जरा च मच्चु च, मानो मक्खो च ओहितो।

श्लोक 5

१५१। जीरन्ति वे राजरथा सुचित्ता, अथो सरीरम्पि जरं उपेति; सतञ्च धम्मो न जरं उपेति, सन्तो हवे सब्भि पवेदयन्ति।

श्लोक 6

१५२। अप्पस्सुतायं पुरिसो, बलिवद्दो व जीरति; मंसानि तस्स वड्ढन्ति, पञ्ञा तस्स न वड्ढति।

श्लोक 7

१५३। अनेकजातिसंसारं, सन्धाविस्सं अनिब्बिसं; गहकारकं गवेसन्तो, दुक्खा जाति पुनप्पुनं।

श्लोक 8

१५४। गहकारक दिट्ठोसि, पुन गेहं न काहसि; सब्बा ते फासुका भग्गा, गहकूटं विसङ्खितं; विसङ्खारगतं चित्तं, तण्हानं खयमज्झगा।

श्लोक 9

१५५। अचरित्वा ब्रह्मचरियं, अलद्धा योब्बने धनं; जिण्णकोञ्चा व झायन्ति, खीणमच्छे व पल्लले।

श्लोक 10

१५६। अचरित्वा ब्रह्मचरियं, अलद्धा योब्बने धनं; सेन्ति चापातिखीणा व, पुराणानि अनुत्थुनं।

श्लोक 11

पृष्ठभूमि

यह अध्याय पालि धम्मपद (खुद्दक निकाय, पालि त्रिपिटक) का जरावग्ग है, गाथा 146–156। धम्मपद-अट्ठकथा और थेरगाथा के अनुसार, गाथा 153–154 भगवान बुद्ध के 'प्रथम बुद्ध वचन' माने जाते हैं, जो उन्होंने बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे वैशाख पूर्णिमा की प्रभात वेला में सम्यक संबोधि प्राप्त करते ही अपने हृदय में उच्चारित किए थे। अन्य गाथाएँ तत्कालीन नगरवधू सिरिमा तथा सुंदरी रानियों के सौंदर्य-नाश और मृत्यु के प्रसंग में उच्चारित की गईं, जहाँ भिक्षुओं को शरीर की नश्वरता और अस्थि-पिंजर का यथार्थ दिखाकर विरक्ति और ध्यान की ओर प्रेरित किया गया।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

बुद्ध के प्रथम बोधि-वचन (गाथा 153–154)

इन विश्वप्रसिद्ध गाथाओं में तथागत तृष्णा रूपी मकान बनाने वाले को ललकारते हैं: 'अनेक जन्मों तक मैं इस घर के बनाने वाले को ढूँढता रहा... हे गृह-कारक! अब तू देख लिया गया है। अब तू फिर से यह जन्म का घर नहीं बना सकेगा! तेरी सब कड़ियाँ टूट गई हैं, और तेरी मुख्य बल्ली बिखर गई है।'

सुलगती दुनिया में कैसी हँसी? (गाथा 146)

जब यह संसार काम, क्रोध और मोह की आग से निरंतर जल रहा है, तब यह कैसी हँसी और कैसा आमोद-प्रमोद? अविद्या के गहन अंधकार से घिरे होने पर तुम प्रज्ञा के प्रकाश की खोज क्यों नहीं करते?

हड्डियों का नगर (गाथा 150)

यह शरीर हड्डियों का बना हुआ एक दुर्ग (नगर) है, जिस पर माँस और लोहू का प्लास्टर चढ़ा है; और इस दुर्ग के भीतर बुढ़ापा, मृत्यु, अहंकार और कपट निवास करते हैं।

बैल की तरह अज्ञानी बुढ़ापा (गाथा 152)

जो मनुष्य अल्पज्ञ है और जिसने कोई आध्यात्मिक ज्ञान नहीं पाया, वह कोठे के बैल की तरह बूढ़ा होता है: उसका माँस तो बढ़ता है, किंतु उसकी प्रज्ञा तनिक भी नहीं बढ़ती।

सूखे तालाब पर उदास बगुले (गाथा 155–156)

जो युवावस्था में संयम नहीं बरतते और कोई आत्मिक संपत्ति नहीं कमाते, वे जीवन के अंत में उसी तरह पछताते और तड़पते हैं जैसे मछली-रहित सूखे तालाब के किनारे लाचार बूढ़े बगुले उदास बैठे रहते हैं।

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