श्लोक
यह कैसी हँसी और कैसा आनंद, जब यह संसार राग, द्वेष और मोह की अग्नि में निरंतर जल रहा है? अविद्या के गहन अंधकार से आच्छादित होकर भी तुम ज्ञान के प्रकाश (दीपक) की खोज क्यों नहीं करते?
श्लोक 1
इस सजे-धजे पुतले (शरीर) को देखो, जो घावों का पुंज है, हड्डियों पर खड़ा है, रोगों से ग्रस्त है, नाना प्रकार की कल्पनाओं से भरा है, और जिसमें न कोई स्थिरता है और न कोई ध्रुवता (नित्यता)।
श्लोक 2
यह शरीर जीर्ण-शीर्ण हो चुका है, यह रोगों का घोंसला और अत्यंत भंगुर है; यह दुर्गंधयुक्त मल-मूत्र का ढेर नष्ट हो जाता है, क्योंकि इस जीवन का निश्चित अंत मृत्यु ही है।
श्लोक 3
शरद ऋतु में इधर-उधर फेंके गए सूखे कद्दुओं (लौकियों) की तरह कपोत (कबूतर) के रंग जैसी जो ये सफेद हड्डियाँ बिखरी पड़ी हैं—उन्हें देखकर काम-भोगों में क्या आनंद रह सकता है?
श्लोक 4
हड्डियों का यह नगर (शरीर) बनाया गया है, जिस पर माँस और रक्त का लेप किया गया है; और इसके भीतर बुढ़ापा, मृत्यु, अहंकार और कृतघ्नता (ईर्ष्या-द्वेष) निवास करते हैं।
श्लोक 5
राजाओं के अत्यंत सुंदर और सुसज्जित रथ भी पुराने होकर जीर्ण हो जाते हैं; यह भौतिक शरीर भी बुढ़ापे को प्राप्त होता है; परंतु सत्पुरुषों का धर्म कभी पुराना नहीं होता, संत जन सत्पुरुषों से यही कहते हैं।
श्लोक 6
जो मनुष्य अल्पज्ञ (अविद्याग्रस्त) है, वह कोठे के बैल की तरह केवल बूढ़ा होता है; उसका माँस (मांसपेशियाँ) तो बढ़ता है, परंतु उसकी प्रज्ञा (ज्ञान) तनिक भी नहीं बढ़ती।
श्लोक 7
अनेक जन्मों के संसार-चक्र में मैं इस शरीर रूपी घर के बनाने वाले (तृष्णा) को खोजता हुआ बिना विश्राम के भटकता रहा; बार-बार जन्म लेना अत्यंत दुःखदायी है।
श्लोक 8
हे गृह-कारक (तृष्णा)! तू देख लिया गया है! अब तू फिर से मेरे लिए यह शरीररूपी घर नहीं बना सकेगा! तेरी सब कड़ियाँ (क्लेश) टूट चुकी हैं, और छत की मुख्य बल्ली (अविद्या) बिखर चुकी है। मेरा चित्त संस्कारों से परे (निर्वाण में) पहुँच चुका है; मैंने समस्त तृष्णाओं का समूल नाश पा लिया है!
श्लोक 9
जिन्होंने युवावस्था में न तो ब्रह्मचर्य (धर्म-साधना) का आचरण किया और न ही कोई आत्मिक धन कमाया, वे वृद्धावस्था में उसी प्रकार पछताते और क्षीण होते हैं जैसे मछली-रहित सूखे तालाब के किनारे लाचार बूढ़े बगुले उदास बैठे रहते हैं।
श्लोक 10
जिन्होंने युवावस्था में न ब्रह्मचर्य का पालन किया और न कोई सद्गुण संचित किया, वे धनुष से छूटे हुए टूटे बाणों की तरह असहाय पड़े रहते हैं और अपने बीते हुए दिनों के लिए व्यर्थ विलाप करते हैं।
श्लोक 11
पृष्ठभूमि
यह अध्याय पालि धम्मपद (खुद्दक निकाय, पालि त्रिपिटक) का जरावग्ग है, गाथा 146–156। धम्मपद-अट्ठकथा और थेरगाथा के अनुसार, गाथा 153–154 भगवान बुद्ध के 'प्रथम बुद्ध वचन' माने जाते हैं, जो उन्होंने बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे वैशाख पूर्णिमा की प्रभात वेला में सम्यक संबोधि प्राप्त करते ही अपने हृदय में उच्चारित किए थे। अन्य गाथाएँ तत्कालीन नगरवधू सिरिमा तथा सुंदरी रानियों के सौंदर्य-नाश और मृत्यु के प्रसंग में उच्चारित की गईं, जहाँ भिक्षुओं को शरीर की नश्वरता और अस्थि-पिंजर का यथार्थ दिखाकर विरक्ति और ध्यान की ओर प्रेरित किया गया।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
बुद्ध के प्रथम बोधि-वचन (गाथा 153–154)
इन विश्वप्रसिद्ध गाथाओं में तथागत तृष्णा रूपी मकान बनाने वाले को ललकारते हैं: 'अनेक जन्मों तक मैं इस घर के बनाने वाले को ढूँढता रहा... हे गृह-कारक! अब तू देख लिया गया है। अब तू फिर से यह जन्म का घर नहीं बना सकेगा! तेरी सब कड़ियाँ टूट गई हैं, और तेरी मुख्य बल्ली बिखर गई है।'
सुलगती दुनिया में कैसी हँसी? (गाथा 146)
जब यह संसार काम, क्रोध और मोह की आग से निरंतर जल रहा है, तब यह कैसी हँसी और कैसा आमोद-प्रमोद? अविद्या के गहन अंधकार से घिरे होने पर तुम प्रज्ञा के प्रकाश की खोज क्यों नहीं करते?
हड्डियों का नगर (गाथा 150)
यह शरीर हड्डियों का बना हुआ एक दुर्ग (नगर) है, जिस पर माँस और लोहू का प्लास्टर चढ़ा है; और इस दुर्ग के भीतर बुढ़ापा, मृत्यु, अहंकार और कपट निवास करते हैं।
बैल की तरह अज्ञानी बुढ़ापा (गाथा 152)
जो मनुष्य अल्पज्ञ है और जिसने कोई आध्यात्मिक ज्ञान नहीं पाया, वह कोठे के बैल की तरह बूढ़ा होता है: उसका माँस तो बढ़ता है, किंतु उसकी प्रज्ञा तनिक भी नहीं बढ़ती।
सूखे तालाब पर उदास बगुले (गाथा 155–156)
जो युवावस्था में संयम नहीं बरतते और कोई आत्मिक संपत्ति नहीं कमाते, वे जीवन के अंत में उसी तरह पछताते और तड़पते हैं जैसे मछली-रहित सूखे तालाब के किनारे लाचार बूढ़े बगुले उदास बैठे रहते हैं।
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