Bharat Devotion

Dhammapada

कथा

जातक कथाएँ

गाथा

गाथा

भिक्षु वर्ग में 23 अत्यंत प्रेरणादायी गाथाएँ (360–382) संकलित हैं, जो संन्यासी के आदर्श चरित्र, षड-इंद्रिय संवर (संयम) और गहन ध्यान की अवस्थाओं का निरूपण करती हैं। अध्याय का शुभारंभ आँख, कान, नाक, जीभ, काया, वाणी और मन के पवित्र संयम से होता है। गाथा 369 में नाव का सुंदर रूपक है: 'हे भिक्षु! इस नाव (शरीर/चित्त) में भरे विकारों के पानी को उलीच दो! खाली होने पर यह तेजी से तैरेगी; राग और द्वेष को काटकर तुम सीधे निर्वाण को प्राप्त करोगे।' गाथा 372 में ध्यान (शमथ) और प्रज्ञा (विपश्यना) का अनिवार्य समन्वय प्रतिपादित है: 'बिना प्रज्ञा के ध्यान नहीं होता, और बिना ध्यान के प्रज्ञा नहीं होती; जिसमें ध्यान और प्रज्ञा दोनों हैं, वह निर्वाण के अत्यंत निकट है।' गाथा 380 आत्म-शरण का अमर उद्घोष करती है: 'मनुष्य स्वयं ही अपना स्वामी और रक्षक है; दूसरा कौन उसका रक्षक हो सकता है?'

23 verses
गाथा

ब्राह्मण वर्ग धम्मपद का मुकुटमणि, सर्वाधिक विस्तृत (41 गाथाएँ, 383–423) और चरम शिखर है। इस महान उपदेश में तथागत ने 'ब्राह्मण' शब्द को जन्म, कुल, जटा, मृगचर्म और बाह्य यज्ञ-हवन की संकीर्ण परिधियों से मुक्त करके आंतरिक विशुद्धि, शील और परम अर्हत्व का सर्वोच्च आध्यात्मिक पद घोषित किया। 'तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं' (उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ) के पावन और अनुनादी उद्घोष के साथ बुद्ध उस पूर्ण मुक्त महामानव का चित्रण करते हैं: जो समस्त प्राणियों के प्रति पूर्णतः अहिंसक है, जो कीचड़ में कमल और सूई की नोक पर सरसों के दाने की तरह सांसारिक भोगों में सर्वथा निर्लेप रहता है, जिसके सारे राग, द्वेष और अविद्या नष्ट हो चुके हैं, और जो स्वयं भव-सागर को पार कर अमर निर्वाण में प्रतिष्ठित है।

41 verses
गाथा

धर्मस्थ वर्ग में 17 तीक्ष्ण गाथाएँ (256–272) संकलित हैं, जो संन्यास, पांडित्य, ज्येष्ठता और धार्मिकता के बाह्य आडंबरों का खंडन कर अंतर्मुखी सत्य को स्थापित करती हैं। बुद्ध स्पष्ट करते हैं कि मनमाने फैसले देने से कोई न्यायाधीश नहीं होता; केवल सिर के बाल पक जाने से कोई 'थेर' (वृद्ध/स्थविर) नहीं बन जाता—वह तो केवल व्यर्थ ही बूढ़ा हुआ है। केवल वाक्पटुता से कोई साधु नहीं, केवल सिर मुंडाने से कोई श्रमण नहीं, और केवल भिक्षा माँगने से कोई भिक्षु नहीं बनता। जो समस्त प्राणियों के प्रति अहिंसक है, राग-द्वेष से परे है, और आस्रवों का क्षय कर चुका है—वही सच्चा धर्मस्थ और आर्य है।

17 verses
गाथा

मार्ग वर्ग में 17 अत्यंत महत्वपूर्ण गाथाएँ (273–289) संगृहीत हैं, जो बौद्ध दर्शन और साधना का हृदय हैं। इसमें आर्य अष्टांगिक मार्ग को समस्त मार्गों में सर्वश्रेष्ठ और चार आर्य सत्यों को समस्त सत्यों में शिरोमणि घोषित किया गया है। गाथा 277 से 279 तक अस्तित्व के तीन सार्वभौमिक लक्षणों (त्रिलक्षण)—'सब्बे संखारा अनिच्चा' (सब संस्कार अनित्य हैं), 'सब्बे संखारा दुक्खा' (सब संस्कार दुःखमय हैं), और 'सब्बे धम्मा अनत्ता' (सब धर्म अनात्म हैं)—को विशुद्धि का परम मार्ग बतलाया गया है। गाथा 276 में तथागत पुरुषार्थ का अमर सूत्र देते हैं: 'तुम्हें स्वयं तप करना होगा; तथागत तो केवल मार्ग बतलाने वाले हैं।'

17 verses
गाथा

मल वर्ग में 21 गंभीर गाथाएँ (235–255) संकलित हैं, जिनमें मानसिक विकारों, दोषों और आत्मशुद्धि के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन किया गया है। अध्याय का प्रारंभ मनुष्य की तुलना सूखे पीले पत्ते से करते हुए होता है जो यमराज के दूतों के समक्ष खड़ा है, और तथागत उसे तुरंत आत्म-दीप (शरण) बनाने की प्रेरणा देते हैं। जैसे लोहे से उत्पन्न जंग उसी लोहे को खा जाता है, वैसे ही अपने पाप कर्म जीव को दुर्गति में ले जाते हैं। बुद्ध उद्घोष करते हैं कि संसार का सबसे बड़ा मल 'अविद्या' (अज्ञान) है, और दूसरों के दोषों को तिनके की तरह उड़ाने वाले तथा अपने दोषों को छिपाने वाले कभी एकाग्रता व शांति नहीं पा सकते।

21 verses
गाथा

नाग वर्ग में 14 भव्य गाथाएँ (320–333) संगृहीत हैं, जिनमें महान हस्ति (नाग/गजराज) को आध्यात्मिक तितिक्षा (सहनशीलता), मन के दमन और एकांत साधना के जीवंत प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अध्याय का प्रारंभ तथागत के इस उद्घोष से होता है: 'जैसे संग्राम में हाथी धनुष से छूटे बाणों को सहता है, वैसे ही मैं कटु वचनों को सहन करूँगा; क्योंकि अधिकांश संसारी जन असंयत और दुर्विनीत होते हैं।' स्वयं को वश में करने वाले साधक को प्रशिक्षित घोड़ों और राजसी हाथियों से भी श्रेष्ठ बताया गया है। गाथा 328 से 330 में संगति का अमर सिद्धांत है: यदि कोई बुद्धिमान और सदाचारी साथी मिले तो उसके साथ आनंदपूर्वक चलो; किंतु यदि ऐसा श्रेष्ठ साथी न मिले, तो राज्य छोड़कर अकेले विचरण करने वाले राजा अथवा मातंग वन के एकांत हाथी की भाँति अकेले चलो, मूर्ख की संगति कभी मत करो।

14 verses
गाथा

निरय वर्ग में 14 कठोर और गंभीर गाथाएँ (306–319) संगृहीत हैं, जो पाखंड, दुराचार, मिथ्या दृष्टि और अधर्म के कर्म-फल का विश्लेषण करती हैं। अध्याय का शुभारंभ असत्यवादी और कुकर्म करके मुकरने वाले की समान अधोगति से होता है। तथागत कहते हैं कि जो भिक्षु का गेरुआ चोला पहनकर भी असंयत और दुराचारी है, उसके लिए जनसाधारण के अन्न का उपभोग करने से तो जलता हुआ लोहे का गोला निगल लेना कहीं बेहतर था। अंत में चार गाथाओं (316–319) में विपरीत दृष्टि के विनाशकारी प्रभाव को उद्घाटित किया गया है: जो निर्दोष में दोष और दोष में निर्दोष देखता है, वह दुर्गति को प्राप्त होता है; जबकि सम्यक दृष्टि रखने वाला सुगति (स्वर्ग व मुक्ति) को प्राप्त होता है।

14 verses
गाथा

तृष्णा वर्ग में 26 अत्यंत तेजस्वी गाथाएँ (334–359) संकलित हैं, जो संसार-भ्रमण के मूल कारण 'तृष्णा' (दुःख-समुदय) का मनोवैज्ञानिक व दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं। तथागत तृष्णा की तुलना वृक्षों को सुखा देने वाली मालुवा लता, जाल में फँसे भयभीत खरगोश, और अपने ही बुने जाले में फँसी मकड़ी से करते हैं। जैसे जड़ के सुरक्षित रहने पर काटा हुआ वृक्ष फिर पनप जाता है, वैसे ही तृष्णा के अनुशय (अवचेतन संस्कारों) के नष्ट न होने पर दुःख बार-बार लौटता है। गाथा 354 में बौद्ध दर्शन का अमर महामंत्र है: 'धम्मदान सब दानों में श्रेष्ठ है; धम्मरस सब रसों में श्रेष्ठ है; धम्मरति सब रतियों में श्रेष्ठ है; और तृष्णा का क्षय समस्त दुःखों को जीत लेता है।'

26 verses