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Embroidered artwork for मार्ग वर्ग: आर्य अष्टांगिक मार्ग और त्रिलक्षण (गाथा 273–289): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

मार्ग वर्ग

आर्य अष्टांगिक मार्ग और त्रिलक्षण (गाथा 273–289)

मार्ग वर्ग में 17 अत्यंत महत्वपूर्ण गाथाएँ (273–289) संगृहीत हैं, जो बौद्ध दर्शन और साधना का हृदय हैं। इसमें आर्य अष्टांगिक मार्ग को समस्त मार्गों में सर्वश्रेष्ठ और चार आर्य सत्यों को समस्त सत्यों में शिरोमणि घोषित किया गया है। गाथा 277 से 279 तक अस्तित्व के तीन सार्वभौमिक लक्षणों (त्रिलक्षण)—'सब्बे संखारा अनिच्चा' (सब संस्कार अनित्य हैं), 'सब्बे संखारा दुक्खा' (सब संस्कार दुःखमय हैं), और 'सब्बे धम्मा अनत्ता' (सब धर्म अनात्म हैं)—को विशुद्धि का परम मार्ग बतलाया गया है। गाथा 276 में तथागत पुरुषार्थ का अमर सूत्र देते हैं: 'तुम्हें स्वयं तप करना होगा; तथागत तो केवल मार्ग बतलाने वाले हैं।'

श्लोक

२७३। मग्गानट्ठङ्गिको सेट्ठो, सच्चानं चतुरो पदा। विरागो सेट्ठो धम्मानं, द्विपदानञ्च चक्खुमा।

श्लोक 1

२७४। एसोवेव मग्गो नत्थिञ्ञो, दस्सनस्स विसुद्धिया। एतम्हि तुम्हे पतिपज्जथ, मारस्सेतं पमोहनं।

श्लोक 2

२७५। एतम्हि तुम्हे पटिपन्ना, दुक्खस्सन्तं करिस्सथ। अक्खातो वे मया मग्गो, अञ्ञाय सल्लकन्तनं।

श्लोक 3

२७६। तुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता। पटिपन्ना पमोक्खन्ति, झायिनो मारबन्धना।

श्लोक 4

२७७। "सब्बे सङ्खारा अनिच्चा"ति, यदा पञ्ञाय पस्सति। अथ निब्बिन्दति दुक्खे, एस मग्गो विसुद्धिया।

श्लोक 5

२७८। "सब्बे सङ्खारा दुक्खा"ति, यदा पञ्ञाय पस्सति। अथ निब्बिन्दति दुक्खे, एस मग्गो विसुद्धिया।

श्लोक 6

२७९। "सब्बे धम्मा अनत्ता"ति, यदा पञ्ञाय पस्सति। अथ निब्बिन्दति दुक्खे, एस मग्गो विसुद्धिया।

श्लोक 7

२८०। उट्ठानकालम्हि अनुट्ठहानो, युवा बली आलसियं उपेतो। संसन्नसङ्कप्पमनो कुसीतो, पञ्ञाय मग्गं अलसो न विन्दति।

श्लोक 8

२८१। वाचानुरक्खी मनसा सुसंवुतो, कायेन च अकुसलं न कयिरा। एते तयो कम्मपथे विसोधये, आराधये मग्गमिसिप्पवेदितं।

श्लोक 9

२८२। योगा वे जायती भूरि, अयोगा भूरिसङ्खयो। एतं द्वेधापथं ञत्वा, भवाय विभवाय च। तथात्तानं निवेसेय्य, यथा भूरि पवड्ढति।

श्लोक 10

२८३। वनं छिन्दथ मा रुक्खं, वनतो जायते भयं। छेत्वा वनञ्च वनथञ्च, निब्बाना होथ भिक्खवो।

श्लोक 11

२८४। याव हि वनथो न छिज्जति, अणुमत्तोपि नरस्स नारिसु। पटिबद्धमनोव ताव सो, वच्छो खीरपकोव मातरि।

श्लोक 12

२८५। उच्छिन्द सिनेहमत्तनो, कुमुदं सारदिकंव पाणिना। सन्तिमग्गमेव ब्रूहय, निब्बानं सुगतेन देसितं।

श्लोक 13

२८६। इध वस्सं वसिस्सामि, इध हेमन्तगिम्हिसु। इति बालो विचिन्तेति, अन्तरायं न बुज्झति।

श्लोक 14

२८७। तं पुत्तपसुसम्मत्तं, ब्यासत्तमनसं नरं। सुत्तं गामं महोघोव, मच्चु आदाय गच्छति।

श्लोक 15

२८८। न सन्ति पुत्ता ताणाय, न पिता नापि बन्धवा। अन्तकेनाधिपन्नस्स, नत्थि ञातीसु ताणता।

श्लोक 16

२८९। एतमत्थवसं ञत्वा, पण्डितो सीलसंवुतो। निब्बानगमनं मग्गं, खिप्पमेव विसोधये।

श्लोक 17

पृष्ठभूमि

धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार जेतवन में पाँच सौ भिक्षु विभिन्न व्यापारिक और यात्रा मार्गों की चर्चा कर रहे थे। तथागत ने वहाँ पधारकर पूछा कि वे किस मार्ग की बात कर रहे हैं, और फिर उन्हें उस अद्वितीय मार्ग का उपदेश दिया जो संसार के पार निर्वाण की ओर ले जाता है। गाथा 283–284 में 'वन' (जंगल) और 'वनथ' (कामना रूपी झाड़ियों) के रूपक द्वारा तृष्णा को समूल काटने का निर्देश दिया गया। गाथा 287–288 किसागोतमी और पटचारा की शोक-कथाओं के संदर्भ में कही गई थी—कि जैसे सोते हुए गाँव को अचानक आई बाढ़ बहा ले जाती है, वैसे ही पुत्र और पशुओं में आसक्त मनुष्य को मृत्यु एकाएक उठा ले जाती है; उस समय न पुत्र, न पिता और न कोई सगे-संबंधी रक्षा कर सकते हैं।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

सर्वश्रेष्ठ मार्ग (गाथा 273)

समस्त मार्गों में आर्य अष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ है; समस्त सत्यों में चार आर्य सत्य श्रेष्ठ हैं; समस्त धर्मों में विराग (अनासक्ति) श्रेष्ठ है; और समस्त दो पैरों वालों (मनुष्यों) में चक्षुष्मान तथागत श्रेष्ठ हैं।

स्वयं का पुरुषार्थ (गाथा 276)

तुम्हें स्वयं ही प्रयत्न (तप) करना होगा; तथागत तो केवल मार्ग बताने वाले हैं। जो इस मार्ग पर चलकर ध्यान करते हैं, वे मार (मृत्यु व वासना) के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।

अस्तित्व के तीन सार्वभौमिक लक्षण (गाथा 277–279)

'सारे संस्कार अनित्य हैं', 'सारे संस्कार दुःखमय हैं', और 'सारे धर्म अनात्म (आत्मा-रहित) हैं'। जब प्रज्ञा से मनुष्य इस सत्य को साक्षात देखता है, तब वह दुःख से विरक्त हो जाता है; यही परम विशुद्धि का मार्ग है।

तृष्णा के जंगल को काटो (गाथा 283–284)

कामना के पूरे जंगल को काट डालो, केवल एक पेड़ को नहीं! क्योंकि इस वासना-रूपी वन से ही भय उपजता है। जंगल और उसकी झाड़ियों को काटकर, हे भिक्षुओ! वासना-रहित और मुक्त हो जाओ!

काल की महाबाढ़ (गाथा 287–288)

संतान और पशु-धन में मतवाले तथा संसार में आसक्त मनुष्य को मृत्यु वैसे ही बहा ले जाती है जैसे सोते हुए गाँव को अचानक आया हुआ महाप्रलयकारी जल-प्रवाह। मृत्यु के समक्ष न पुत्र रक्षा कर सकते हैं, न पिता और न कोई बांधव।

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