Bharat Devotion
Embroidered artwork for मल वर्ग: मानसिक विकार और आत्मशुद्धि (गाथा 235–255): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

मल वर्ग

मानसिक विकार और आत्मशुद्धि (गाथा 235–255)

मल वर्ग में 21 गंभीर गाथाएँ (235–255) संकलित हैं, जिनमें मानसिक विकारों, दोषों और आत्मशुद्धि के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन किया गया है। अध्याय का प्रारंभ मनुष्य की तुलना सूखे पीले पत्ते से करते हुए होता है जो यमराज के दूतों के समक्ष खड़ा है, और तथागत उसे तुरंत आत्म-दीप (शरण) बनाने की प्रेरणा देते हैं। जैसे लोहे से उत्पन्न जंग उसी लोहे को खा जाता है, वैसे ही अपने पाप कर्म जीव को दुर्गति में ले जाते हैं। बुद्ध उद्घोष करते हैं कि संसार का सबसे बड़ा मल 'अविद्या' (अज्ञान) है, और दूसरों के दोषों को तिनके की तरह उड़ाने वाले तथा अपने दोषों को छिपाने वाले कभी एकाग्रता व शांति नहीं पा सकते।

श्लोक

२३५। पण्डुपलासोव दानिसि, यमपुरिसापि च तं उपट्ठिता। उय्योगमुखे च तिट्ठसि, पाथेय्यम्पि च ते न विज्जति।

श्लोक 1

२३६। सो करोहि दीपमत्तनो, खिप्पं वायम पण्डितो भव। निद्धन्तमलो अनङ्गणो, दिब्बं अरियभूमिं उपेहिसि।

श्लोक 2

२३७। उपनीतवयो च दानिसि, सम्पयातोसि यमस्स सन्तिके। वासो ते नत्थि अन्तरा, पाथेय्यम्पि च ते न विज्जति।

श्लोक 3

२३८। सो करोहि दीपमत्तनो, खिप्पं वायम पण्डितो भव। निद्धन्तमलो अनङ्गणो, न पुनं जातिजरं उपेहिसि।

श्लोक 4

२३९। अनुपुब्बेन मेधावी, थोकं थोकं खणे खणे। कम्मारो रजतस्सेव, निद्धमे मलमत्तनो।

श्लोक 5

२४०। अयसाव मलं समुट्ठितं, तदुट्ठाय तमेव खादति। एवं अतिधोनचारिनं, सानि कम्मानि नयन्ति दुग्गतिं।

श्लोक 6

२४१। असज्झायमला मन्ता, अनुट्ठानमला घरा। मलं वण्णस्स कोसज्जं, पमादो रक्खतो मलं।

श्लोक 7

२४२। मलित्थिया दुच्चरितं, मच्छेरं ददतो मलं। मला वे पापका धम्मा, अस्मिं लोके परम्हि च।

श्लोक 8

२४३। ततो मला मलतरं, अविज्जा परमं मलं। एतं मलं पहन्त्वान, निम्मला होथ भिक्खवो।

श्लोक 9

२४४। सुजीवं अहिरिकेन, काकसूरेन धंसिना। पक्खन्दिना पगब्भेन, सङ्किलिट्ठेन जीवितं।

श्लोक 10

२४५। हिरीमता च दुज्जीवं, निच्चं सुचिगवेसिना। अलीनेनाप्पगब्भेन, सुद्धाजीवेन पस्सता।

श्लोक 11

२४६। यो पाणमतिपातेति, मुसावादञ्च भासति। लोके अदिन्नं आदियति, परदारञ्च गच्छति।

श्लोक 12

२४७। सुरामेरयपानञ्च, यो नरो अनुयुञ्जति। इधेवमेसो लोकस्मिं, मूलं खणति अत्तनो।

श्लोक 13

२४८। एवं भो पुरिस जानाहि, पापधम्मा असञ्ञता। मा तं लोभो अधम्मो च, चिरं दुक्खाय रन्धयुं।

श्लोक 14

२४९। ददाति वे यथासद्धं, यथापसादनं जनो। तत्थ यो मङ्कु भवति, परेसं पानभोजने। न सो दिवा वा रत्तिं वा, समाधिं अधिगच्छति।

श्लोक 15

२५०। यस्स चेतं समुच्छिन्नं, मूलघच्चं समूहतं। स वे दिवा वा रत्तिं वा, समाधिं अधिगच्छति।

श्लोक 16

२५१। नत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो गहो। नत्थि मोहसमं जालं, नत्थि तण्हासमा नदी।

श्लोक 17

२५२। सुदस्सं वज्जमञ्ञेसं, अत्तनो पन दुद्दसं। परेसं हि सो वज्जानि, ओपुनाति यथाभुसं। अत्तनो पन छादेति, कलिंव कितवा सठो।

श्लोक 18

२५३। परवज्जानुपस्सिस्स, निच्चं उज्झानसञ्ञिनो। आसवा तस्स वड्ढन्ति, आरा सो आसवक्खया।

श्लोक 19

२५४। आकासे पदं नत्थि, समणो नत्थि बाहिरे। पपञ्चाभिरता पजा, निप्पपञ्चा तथागता।

श्लोक 20

२५५। आकासे पदं नत्थि, समणो नत्थि बाहिरे। सङ्खारा सस्सता नत्थि, नत्थि बुद्धानमीञ्जितं।

श्लोक 21

पृष्ठभूमि

धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार गाथा 235–238 एक वृद्ध कसाई के संदर्भ में कही गई थी जिसने जीवन भर कोई पुण्य कर्म नहीं किया और जब वृद्धावस्था में यमराज के दूत निकट आ पहुँचे, तब बुद्ध ने उसे स्वयं का द्वीप बनकर प्रमाद छोड़ने का उपदेश दिया। गाथा 240 एक ऐसे भिक्षु के विषय में थी जिसे अपने नए चीवर से अत्यधिक आसक्ति हो गई थी और मृत्यु के उपरांत वह उसी चीवर में कीड़ा बनकर जन्मा। गाथा 246–248 में पंचशील (प्राण-हिंसा, असत्य, चोरी, व्यभिचार, मदिरापान) का उल्लंघन करने वाले के विषय में कहा गया कि वह इसी जन्म में अपनी जड़ों को स्वयं खोद डालता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

सूखा पीला पत्ता (गाथा 235–238)

तुम वृक्ष के सूखे पीले पत्ते जैसे हो चुके हो; यमराज के दूत तुम्हारे द्वार पर खड़े हैं, फिर भी तुमने परलोक यात्रा के लिए कोई पाथेय (पुण्य का संबल) नहीं जुटाया। तुरंत अपने लिए एक द्वीप (आश्रय) बनाओ, पुरुषार्थ करो और ज्ञानी बनो!

क्षण-क्षण शुद्धि (गाथा 239)

जैसे कुशल सुनार धीरे-धीरे आँच देकर चाँदी के मैल को दूर करता है, वैसे ही बुद्धिमान साधक को क्षण-क्षण, थोड़े-थोड़े करके अपने मानसिक विकारों को दूर करना चाहिए।

लोहे की जंग (गाथा 240)

जैसे लोहे से उत्पन्न जंग स्वयं उसी लोहे को खा जाती है, वैसे ही असंयमी पुरुष के अपने ही दुष्कर्म उसे दुर्गति की ओर घसीट ले जाते हैं।

परम मल: अविद्या (गाथा 243)

स्वाध्याय न करना मंत्रों का मैल है, मरम्मत न करना घर का मैल है, आलस्य रूप का मैल है, और कंजूसी दानी का मैल है—किंतु इन सबसे बढ़कर 'अविद्या' संसार का परम मैल है। हे भिक्षुओ! इस अविद्या रूपी मैल को त्यागकर निर्मल बनो!

छिद्रान्वेषी की दुर्गति (गाथा 252–253)

दूसरों के दोष देखना सरल है, पर अपने दोष देखना अत्यंत कठिन। जो सदा दूसरों के दोष ढूँढ़ने और उनकी निंदा करने में लगा रहता है, उसके अपने मानसिक विकार बढ़ते जाते हैं और वह निर्वाण से दूर होता जाता है।

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