गाथा
मल वर्ग: मानसिक विकार और आत्मशुद्धि (गाथा 235–255)
मल वर्ग में 21 गंभीर गाथाएँ (235–255) संकलित हैं, जिनमें मानसिक विकारों, दोषों और आत्मशुद्धि के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन किया गया है। अध्याय का प्रारंभ मनुष्य की तुलना सूखे पीले पत्ते से करते हुए होता है जो यमराज के दूतों के समक्ष खड़ा है, और तथागत उसे तुरंत आत्म-दीप (शरण) बनाने की प्रेरणा देते हैं। जैसे लोहे से उत्पन्न जंग उसी लोहे को खा जाता है, वैसे ही अपने पाप कर्म जीव को दुर्गति में ले जाते हैं। बुद्ध उद्घोष करते हैं कि संसार का सबसे बड़ा मल 'अविद्या' (अज्ञान) है, और दूसरों के दोषों को तिनके की तरह उड़ाने वाले तथा अपने दोषों को छिपाने वाले कभी एकाग्रता व शांति नहीं पा सकते।
21 verses