Bharat Devotion
Embroidered artwork for तृष्णा वर्ग: तृष्णा का जाल, धम्मदान और पूर्ण विमुक्ति (गाथा 334–359): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

तृष्णा वर्ग

तृष्णा का जाल, धम्मदान और पूर्ण विमुक्ति (गाथा 334–359)

तृष्णा वर्ग में 26 अत्यंत तेजस्वी गाथाएँ (334–359) संकलित हैं, जो संसार-भ्रमण के मूल कारण 'तृष्णा' (दुःख-समुदय) का मनोवैज्ञानिक व दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं। तथागत तृष्णा की तुलना वृक्षों को सुखा देने वाली मालुवा लता, जाल में फँसे भयभीत खरगोश, और अपने ही बुने जाले में फँसी मकड़ी से करते हैं। जैसे जड़ के सुरक्षित रहने पर काटा हुआ वृक्ष फिर पनप जाता है, वैसे ही तृष्णा के अनुशय (अवचेतन संस्कारों) के नष्ट न होने पर दुःख बार-बार लौटता है। गाथा 354 में बौद्ध दर्शन का अमर महामंत्र है: 'धम्मदान सब दानों में श्रेष्ठ है; धम्मरस सब रसों में श्रेष्ठ है; धम्मरति सब रतियों में श्रेष्ठ है; और तृष्णा का क्षय समस्त दुःखों को जीत लेता है।'

श्लोक

३३४। मनुजस्स पमत्तचारिनो, तण्हा वड्ढति मालुवा विय। सो प्लवति हुराहुरं, फलमिच्छंव वनस्मि वानरो।

श्लोक 1

३३५। यं एसा सहते जम्मी, तण्हा लोके विसत्तिका। सोका तस्स पवड्ढन्ति, अभिवुट्ठंव बीरणं।

श्लोक 2

३३६। यो चेतं सहते जम्मिं, तण्हं लोके दुरच्चयं। सोका तम्हा पपतन्ति, उदबिन्दुव पोक्खरा।

श्लोक 3

३३७। तं वो वदामि भद्दं वो, यावन्तेत्थ समागता। तण्हाय मूलं खणथ, उसीरत्थोव बीरणं। मा वो नऌअंव सोतोव, मारो भञ्जि पुनप्पुनं।

श्लोक 4

३३८। यथापि मूले अनुपद्दवे दऌहे, छिन्नोपि रुक्खो पुनरेव रूहति। एवम्पि तण्हानुसये अनूहते, निब्बत्तती दुक्खमिदं पुनप्पुनं।

श्लोक 5

३३९। यस्स छत्तिंसति सोता, मनापसवना भुसा। माहा वहन्ति दुद्दिट्ठिं, सङ्कप्पा रागनिस्सिता।

श्लोक 6

३४०। सवन्ति सब्बधी सोता, लता उब्भिज्ज तिट्ठति। तञ्च दिस्वा लतं जातं, मूलं पञ्ञाय छिन्दथ।

श्लोक 7

३४१। सरितानि सिनेहितानि च, सोमनस्सानि भवन्ति जन्तुनो। ते सातसिता सुखेसिनो, ते वे जातिजरूपगा नरा।

श्लोक 8

३४२। तसिणाय पुरक्खता पजा, परिसप्पन्ति ससोव बाधितो। संयोजनसङ्गसत्ता, दुक्खमुपेन्ति पुनप्पुनं चिराय।

श्लोक 9

३४३। तसिणाय पुरक्खता पजा, परिसप्पन्ति ससोव बाधितो। तस्मा तसिणं विनोदये, आकङ्खन्त विरागमत्तनो।

श्लोक 10

३४४। यो निब्बनथो वनाधिमुत्तो, वनमुत्तो वनमेव धावति। तं पुग्गलमथ पस्सथ, मुत्तो बन्धनमेव धावति।

श्लोक 11

३४५। न तं दऌहं बन्धनमाहु धीरा, यदायसं दारुजं बब्बजञ्च। सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु, पुत्तेसु दारेसु च या अपेक्खा।

श्लोक 12

३४६। एतं दऌहं बन्धनमाहु धीरा, ओहारिनं सिथिलं दुप्पमुञ्चं। एतम्पि छेत्वान परिब्बजन्ति, अनपेक्खिनो कामसुखं पहाय।

श्लोक 13

३४७। ये रागरत्तानुपतन्ति सोतं, सयङ्कतं मक्कटकोव जालं। एतम्पि छेत्वान वजन्ति धीरा, अनपेक्खिनो सब्बदुक्खं पहाय।

श्लोक 14

३४८। मुञ्च पुरे मुञ्च पच्छतो, मज्झे मुञ्च भवस्स पारगू। सब्बत्थ विमुत्तमानसो, न पुनं जातिजरं उपेहिसि।

श्लोक 15

३४९। वितक्कमथितस्स जन्तुनो, तिब्बरागस्स सुभानुपस्सिनो। भिय्यो तण्हा पवड्ढति, एस खो दऌहं करोति बन्धनं।

श्लोक 16

३५०। वितक्कूपसमे च यो रतो, असुभं भावयति सदा सतो। एस खो व्यन्तिकाहिति, एस छेच्छति मारबन्धनं।

श्लोक 17

३५१। निट्ठङ्गतो असन्तासी, वीततण्हो अनङ्गणो। अच्छिन्दि भवसल्लानि, अन्तिमोयं समुस्सयो।

श्लोक 18

३५२। वीततण्हो अनादानो, निरुत्तिपदकोविदो। अक्खरानं सन्निपातं, जञ्ञा पुब्बापरानि च। स वे अन्तिमसारीरो, महापञ्ञो महापुरिसोति वुच्चति।

श्लोक 19

३५३। सब्बाभिभू सब्बविदूहमस्मि, सब्बेसु धम्मेसु अनूपलित्तो। सब्बञ्जहो तण्हक्खये विमुत्तो, सयं अभिञ्ञाय कमुद्दिसेय्यं।

श्लोक 20

३५४। सब्बदानं धम्मदानं जिनाति, सब्बरसं धम्मरसो जिनाति। सब्बरतिं धम्मरती जिनाति, तण्हक्खयो सब्बदुक्खं जिनाति।

श्लोक 21

३५५। हनन्ति भोगा दुम्मेधं, नो च पारगवेसिनो। भोगतण्हाय दुम्मेधो, हन्ति अञ्ञेव अत्तानं।

श्लोक 22

३५६। तिणदोसानि खेत्तानि, रागदोसा अयं पजा। तस्मा हि वीतरागेसु, दिन्नं होति महप्फलं।

श्लोक 23

३५७। तिणदोसानि खेत्तानि, दोसदोसा अयं पजा। तस्मा हि वीतदोसेसु, दिन्नं होति महप्फलं।

श्लोक 24

३५८। तिणदोसानि खेत्तानि, मोहदोसा अयं पजा। तस्मा हि वीतमोहेसु, दिन्नं होति महप्फलं।

श्लोक 25

३५९। तिणदोसानि खेत्तानि, इच्छादोसा अयं पजा। तस्मा हि विगतिच्छेसु, दिन्नं होति महप्फलं।

श्लोक 26

पृष्ठभूमि

धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार गाथा 337 जेतवन में एकत्रित जनसमूह को संबोधित थी, जहाँ तथागत ने सुगन्धित उशीर (खस) की जड़ खोदने के दृष्टांत द्वारा तृष्णा की जड़ को उखाड़ने का उपदेश दिया। गाथा 344 एक ऐसे भिक्षु के संदर्भ में कही गई जो प्रव्रज्या छोड़कर पुनः गृहस्थ जीवन के बंधनों में फँसने जा रहा था। गाथा 353 बोधगया से सारनाथ जाते समय उपक आजीवक के पूछने पर बुद्ध द्वारा अपने स्वयंभू ज्ञान के परिचय में कही गई थी। गाथा 354 देवराज शक्र (इंद्र) के प्रश्नों के उत्तर में कही गई थी, जब शक्र ने पूछा था कि संसार में सबसे श्रेष्ठ दान, सबसे मधुर रस, सबसे उत्तम आनंद और सबसे महान विजय कौन सी है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

तृष्णा की परजीवी लता (गाथा 334–336)

असावधान मनुष्य की तृष्णा मालुवा लता की तरह बढ़ती है; जैसे वन में फल की खोज में बंदर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदता है, वैसे ही वह जन्म-दर-जन्म भटकता है। जो तृष्णा को जीत लेता है, उससे शोक वैसे ही छूट जाते हैं जैसे कमल के पत्ते से पानी की बूँदें।

फिर पनपने वाला वृक्ष (गाथा 338)

जैसे जड़ के सुरक्षित और मजबूत रहने पर काटा हुआ पेड़ फिर से हरा-भरा होकर उग आता है, वैसे ही जब तक तृष्णा के अवचेतन संस्कार (अनुशय) समूल नष्ट नहीं होते, तब तक यह दुःख बार-बार उत्पन्न होता रहता है।

तीनों कालों से मुक्ति (गाथा 348)

भूतकाल को छोड़ो, भविष्य को छोड़ो, और वर्तमान की आसक्ति को भी छोड़ो! भव-सागर के उस पार पहुँचो! जिसका चित्त सब प्रकार के बंधनों से सर्वथा विमुक्त है, वह पुनः जन्म और बुढ़ापे को प्राप्त नहीं होता।

धम्मदान का महामंत्र (गाथा 354)

धम्म का दान सब दानों में श्रेष्ठ है; धम्म का स्वाद सब रसों में श्रेष्ठ है; धम्म का आनंद सब सुखों में श्रेष्ठ है; और तृष्णा का क्षय समस्त दुःखों पर विजय प्राप्त कर लेता है।

चित्त के खरपतवार (गाथा 356–359)

घास-फूस खेतों का दोष है; राग (काम), द्वेष (क्रोध), मोह (अज्ञान) और वासना इस मानव-जाति के दोष हैं। इसलिए राग, द्वेष, मोह और तृष्णा से मुक्त हुए वीतराग संतों को दिया गया दान महान फलदायी होता है।

विषय के अनुसार खोजें

Buddha की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

Buddha

Buddha के सभी पाठ देखें →

बौद्ध धर्म से और

सभी देखें