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Embroidered artwork for धर्मस्थ वर्ग: सच्चा धर्मात्मा और न्यायशील साधक (गाथा 256–272): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

धर्मस्थ वर्ग

सच्चा धर्मात्मा और न्यायशील साधक (गाथा 256–272)

धर्मस्थ वर्ग में 17 तीक्ष्ण गाथाएँ (256–272) संकलित हैं, जो संन्यास, पांडित्य, ज्येष्ठता और धार्मिकता के बाह्य आडंबरों का खंडन कर अंतर्मुखी सत्य को स्थापित करती हैं। बुद्ध स्पष्ट करते हैं कि मनमाने फैसले देने से कोई न्यायाधीश नहीं होता; केवल सिर के बाल पक जाने से कोई 'थेर' (वृद्ध/स्थविर) नहीं बन जाता—वह तो केवल व्यर्थ ही बूढ़ा हुआ है। केवल वाक्पटुता से कोई साधु नहीं, केवल सिर मुंडाने से कोई श्रमण नहीं, और केवल भिक्षा माँगने से कोई भिक्षु नहीं बनता। जो समस्त प्राणियों के प्रति अहिंसक है, राग-द्वेष से परे है, और आस्रवों का क्षय कर चुका है—वही सच्चा धर्मस्थ और आर्य है।

श्लोक

२५६। न तेन होति धम्मट्ठो, येनत्थं साहसा नये। यो च अत्थं अनत्थञ्च, उभो निच्छेय्य पण्डितो।

श्लोक 1

२५७। असाहसेन धम्मेन, समेन नयती परे। धम्मस्स गुत्तो मेधावी, धम्मट्ठोति पवुच्चति।

श्लोक 2

२५८। न तेन पण्डितो होति, यावता बहु भासति। खेमी अवेरी अभयो, पण्डितोति पवुच्चति।

श्लोक 3

२५९। न तावता धम्मधरो, यावता बहु भासति। यो च अप्पम्पि सुत्वान, धम्मं कायेन पस्सति। स वे धम्मधरो होति, यो धम्मं नप्पमज्जति।

श्लोक 4

२६०। न तेन थेरो सो होति, येनस्स पलितं सिरो। परिपक्को वयो तस्स, मोघजिण्णोति वुच्चति।

श्लोक 5

२६१। यम्हि सच्चञ्च धम्मो च, अहिंसा संयमो दमो। स वे वन्तमलो धीरो, थेरोति पवुच्चति।

श्लोक 6

२६२। न वाक्करणमत्तेन, वण्णपोक्खरताय वा। सादुरूपो नरो होति, इस्सुकी मच्छरी सठो।

श्लोक 7

२६३। यस्स चेतं समुच्छिन्नं, मूलघच्चं समूहतं। स वन्तदोसो मेधावी, सादुरूपोति वुच्चति।

श्लोक 8

२६४। न मुण्डकेन समणो, अब्बतो अलिकं भणं। इच्छालोभसमापन्नो, समणो किं भविस्सति।

श्लोक 9

२६५। यो च समेति पापानि, अणुं थूलानि सब्बसो। समितत्ता हि पापानं, समणोति पवुच्चति।

श्लोक 10

२६६। न तेन भिक्खु सो होति, यावता भिक्खते परे। विस्सं धम्मं समादाय, भिक्खु होति न तावता।

श्लोक 11

२६७। योध पुञ्ञञ्च पापञ्च, बाहेत्वा ब्रह्मचरियवा। सङ्खाय लोके चरति, स वे भिक्खूति वुच्चति।

श्लोक 12

२६८। न मोनेन मुनी होति, मूऌहरूपो अविद्दसु। यो च तुलंव पग्गय्ह, वरमादाय पण्डितो।

श्लोक 13

२६९। पापानि परिवज्जेति, स मुनी तेन सो मुनि। यो मुनाति उभो लोके, मुनी तेन पवुच्चति।

श्लोक 14

२७०। न तेन अरियो होति, येन पाणानि हिंसति। अहिंसा सब्बपाणानं, अरियोति पवुच्चति।

श्लोक 15

२७१। न सीलब्बतमत्तेन, बाहुसच्चेन वा पन। अथ वा समाधिलाभेन, विवित्तसयनेन वा।

श्लोक 16

२७२। फुसामि नेक्खम्मसुखं, अपुथुज्जनसेवितं। भिक्खु विस्सास मापादि, अप्पत्तो आसवक्खयं।

श्लोक 17

पृष्ठभूमि

धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार श्रावस्ती के जेतवन में यह उपदेश उन प्रसंगों पर दिया गया जब न्यायालयों में घूसखोर न्यायाधीशों द्वारा मनमाने निर्णय दिए जा रहे थे, और संघ में कुछ भिक्षु केवल श्वेत केशों या सिर मुंडाने के आधार पर आदर की अपेक्षा करते थे। गाथा 256–257 भ्रष्ट न्यायाधीशों को देखकर कही गई। गाथा 260–261 लकुण्डक भद्दिय स्थविर के प्रसंग में कही गई, जिन्हें छोटे कद के कारण आगंतुक भिक्षु सामणेर समझ बैठे थे — केवल श्वेत केश से कोई स्थविर नहीं होता; और गाथा 264–265 झूठ बोलकर वाद जीतने वाले हत्थक भिक्षु के प्रसंग में कही गई। गाथा 271–272 में साधकों को चेतावनी दी गई कि जब तक समस्त आस्रवों का क्षय न हो जाए, तब तक मात्र एकांतवास या समाधि के सुख से संतुष्ट होकर प्रमादी न हों।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

सच्चा न्यायाधीश (गाथा 256–257)

मनमाना न्याय करने से कोई धर्मस्थ नहीं होता। जो बुद्धिमान पुरुष पक्षपात और जल्दबाजी से परे रहकर, सत्य और धर्म के अनुसार निष्पक्ष निर्णय करता है, वही धर्म का रक्षक और सच्चा 'धर्मस्थ' कहलाता है।

सच्चा वृद्ध या थेर (गाथा 260–261)

केवल बाल सफेद हो जाने से कोई 'थेर' (स्थविर) नहीं हो जाता; उसकी आयु तो पक गई, पर वह 'व्यर्थ ही बूढ़ा हुआ' (मोघजिण्ण) कहलाता है। जिसमें सत्य, धर्म, अहिंसा, संयम और इंद्रिय-दमन है—वही निष्कलंक धीर पुरुष वस्तुतः 'थेर' है।

मुंडन से श्रमण नहीं (गाथा 264–265)

सिर मुंडा लेने से कोई व्रतहीन और मिथ्यावादी व्यक्ति श्रमण नहीं बन जाता, जो इच्छाओं और लोभ से भरा हुआ है। जिसने छोटे और बड़े समस्त पापों को शांत कर दिया है, वही पापों को शांत करने के कारण 'श्रमण' कहलाता है।

सच्चा आर्य (गाथा 270)

प्राणियों की हिंसा करने से कोई 'आर्य' (श्रेष्ठ) नहीं होता। समस्त प्राणियों के प्रति अगाध अहिंसा का पालन करने वाला ही 'आर्य' कहलाता है।

पूर्ण मुक्ति से पहले विश्राम नहीं (गाथा 271–272)

केवल शील-व्रत के पालन से, बहुश्रुत होने से, समाधि के लाभ से, या एकांत वास करने से ही किसी भिक्षु को संतुष्ट होकर निश्चिंत नहीं बैठ जाना चाहिए—जब तक कि उसने समस्त मानसिक विकारों (आस्रवों) का समूल क्षय न कर लिया हो।

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