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Embroidered artwork for पुष्प वर्ग: धम्मपद की पुष्प रूपी गाथाएँ (गाथा 44–59): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

पुष्प वर्ग

धम्मपद की पुष्प रूपी गाथाएँ (गाथा 44–59)

धम्मपद का पुष्प वर्ग (गाथा 44–59): मालाकार, भ्रमर और वायु के विरुद्ध फैलती शील की सुगंध के दृष्टांतों से मृत्यु आने से पहले सदाचार का उपदेश।

श्लोक

४४। को इमं पथविं विचेस्सति, यमलोकञ्च इमं सदेवकं; को धम्मपदं सुदेसितं, कुसलो पुप्फमिव पचेस्सति।

श्लोक 1

४५। सेखो पथविं विचेस्सति, यमलोकञ्च इमं सदेवकं; सेखो धम्मपदं सुदेसितं, कुसलो पुप्फमिव पचेस्सति।

श्लोक 2

४६। फेणूपमं कायमिमं विदित्वा, मरीचिधम्मं अभिसम्बुधानो; छेत्वान मारस्स पपुप्फकानि, अदस्सनं मच्चुराजस्स गच्छे।

श्लोक 3

४७। पुप्फानि हेव पचिनन्तं, ब्यासत्तमनसं नरं; सुत्तं गामं महोघो व, मच्चु आदाय गच्छति।

श्लोक 4

४८। पुप्फानि हेव पचिनन्तं, ब्यासत्तमनसं नरं; अतित्तञ्ञेव कामेसु, अन्तको कुरुते वसे।

श्लोक 5

४९। यथापि भमरो पुप्फं, वण्णगन्धं अहेठयं; पलेति रसमादाय, एवं गामे मुनी चरे।

श्लोक 6

५०। न परेसं विलोमानि, न परेसं कताकतं; अत्तनोव अवेक्खेय्य, कतानि अकतानि च।

श्लोक 7

५१। यथापि रुचिरं पुप्फं, वण्णवन्तं अगन्धकं; एवं सुभासिता वाचा, अफल्ला होति अकुब्बतो।

श्लोक 8

५२। यथापि रुचिरं पुप्फं, वण्णवन्तं सगन्धकं; एवं सुभासिता वाचा, सफला होति कुब्बतो।

श्लोक 9

५३। यथापि पुप्फरासिम्हा, कयिरा मालागुणे बहू; एवं जातेन मच्चेन, कत्तब्बं कुसलं बहुं।

श्लोक 10

५४। न पुप्फगन्धो पटिवातमेति, न चन्दनं तगरमल्लिका वा; सतञ्च गन्धो पटिवातमेति, सब्बा दिसा सप्पुरिसो पवायति।

श्लोक 11

५५। चन्दनं तगरं वापि, उप्पलं अथ वस्सिकी; एतेसं गन्धजातानं, सीलगन्धो अनुत्तरो।

श्लोक 12

५६। अप्पमत्तो अयं गन्धो, य्वायं तगरचन्दनी; यो च सीलवतं गन्धो, वाति देवेसु उत्तमो।

श्लोक 13

५७। तेसं सम्पन्नसीलानं, अप्पमादविहारिनं; सम्मदञ्ञाविमुत्तानं, मारो मग्गं न विन्दति।

श्लोक 14

५८। यथा सङ्कारधानस्मिं, उज्झितस्मिं महापथे; पदुमं तत्थ जायेथ, सुचिगन्धं मनोरमं।

श्लोक 15

५९। एवं सङ्कारभूतेसु, अन्धभूते पुथुज्जने; अतिरोचति पञ्ञाय, सम्मासम्बुद्धसावको।

श्लोक 16

पृष्ठभूमि

यह अध्याय पालि धम्मपद (खुद्दक निकाय, पालि त्रिपिटक) का पुप्फवग्ग है, गाथा 44–59। त्रिपिटक के खुद्दक निकाय में समाहित पुष्प वर्ग की गाथाओं में प्राकृतिक एवं दैनिक जीवन के रूपकों का अनुपम प्रयोग है। धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार भगवान बुद्ध ने ये गाथाएँ विभिन्न प्रसंगों में शिष्यों को उपदेशित कीं—जैसे मरीचिका और फेन के समान शरीर को देखने वाले भिक्षुओं को, अथवा मालाकार की एकाग्रता देखकर। यहाँ समझाया गया है कि जैसे प्रमत्त सोए हुए गाँव को बाढ़ बहा ले जाती है, वैसे ही विषय-वासनाओं में फंसे मनुष्य को मृत्यु ग्रस लेती है, जबकि सदाचार की सुगंध देवताओं तक पहुँचती है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

मालाकार का अनुपम दृष्टांत (गाथा 53)

जैसे कुशल मालाकार विभिन्न पुष्पों से सुंदर माला बनाता है, वैसे ही विवेकी मनुष्य को अपने जीवन में नानाविध पुण्यकर्मों का संचय करना चाहिए।

हवा के विपरीत फैलने वाली सुगंध (गाथा 54)

चंदन, तगर या चमेली की सुगंध केवल वायु के रुख के साथ बहती है, परंतु शीलवान और पुण्यात्मा व्यक्ति के सदाचार की सुवास वायु के विपरीत भी सभी दिशाओं में फैलती है।

कूड़े के ढेर पर खिला कमल (गाथा 58–59)

राजमार्ग के किनारे फेंके गए कूड़े के ढेर पर जैसे अत्यंत सुगंधित और मनोरम कमल खिल उठता है, वैसे ही अज्ञानी संसार के मध्य सम्यक संबुद्ध का सच्चा शिष्य प्रज्ञा से देदीप्यमान होता है।

सोते गाँव को बहाने वाली बाढ़ (गाथा 47)

जो मनुष्य अतृप्त वासनाओं के साथ केवल सांसारिक फूलों को चुनने में लगा रहता है, मृत्यु उसे वैसे ही बहा ले जाती है जैसे प्रचण्ड बाढ़ सोते हुए गाँव को बहा ले जाती है।

भ्रमर वृत्ति का नियम (गाथा 49)

मुनि को समाज में उस भ्रमर (मधुमक्खी) की भाँति विचरण करना चाहिए जो पुष्प के रंग या गंध को बिना कोई हानि पहुँचाए केवल उसका रस ग्रहण कर उड़ जाता है।

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