श्लोक
शुभ और कल्याणकारी कर्म करने में शीघ्रता करें; अपने चित्त को पाप से रोकें। क्योंकि जो पुण्य करने में ढिलाई करता है, उसका मन पाप में रमने लगता है।
श्लोक 1
यदि मनुष्य से कोई पाप हो जाए, तो उसे बार-बार न दोहराए; उसमें अपनी रुचि न बनाए, क्योंकि पाप का संचय केवल दुःखदायी होता है।
श्लोक 2
यदि मनुष्य कोई पुण्य कर्म करता है, तो उसे बार-बार करे; उसमें अपना मन लगाए, क्योंकि पुण्य का संचय परम सुखदायी होता है।
श्लोक 3
जब तक पाप कर्म पकता (फलित) नहीं होता, तब तक पापी मनुष्य भी अपने लिए सुख-सुविधा देखता है; परंतु जब पाप पक जाता है, तब वह पापी केवल दुःख और घोर अनिष्ट ही देखता है।
श्लोक 4
जब तक पुण्य कर्म पकता नहीं है, तब तक भला मनुष्य भी कष्ट या विपत्ति देख सकता है; परंतु जब उसका पुण्य पक जाता है, तब वह पुण्यात्मा केवल सुख, शांति और कल्याण ही देखता है।
श्लोक 5
यह सोचकर पाप को छोटा न समझें कि 'यह मुझ तक नहीं आएगा'। पानी की एक-एक बूँद गिरने से भी पूरा घड़ा भर जाता है; वैसे ही मूर्ख मनुष्य थोड़ा-थोड़ा करके भी अपने आपको पाप से भर लेता है।
श्लोक 6
यह सोचकर पुण्य को छोटा न समझें कि 'यह मुझ तक नहीं आएगा'। पानी की एक-एक बूँद गिरने से भी बड़ा घड़ा भर जाता है; वैसे ही धीर और प्रज्ञावान पुरुष थोड़ा-थोड़ा करके भी अपने जीवन को पुण्य से परिपूर्ण कर लेता है।
श्लोक 7
जैसे अल्प रक्षकों वाला धनवान व्यापारी किसी भयप्रद और डाकू-युक्त मार्ग से बचकर निकलता है, और जैसे जीवन से प्रेम करने वाला मनुष्य हलाहल विष से बचता है, वैसे ही साधक को समस्त पाप कर्मों से सर्वथा बचना चाहिए।
श्लोक 8
यदि हाथ में कोई घाव न हो, तो मनुष्य अपने हाथ से विष भी छू सकता है; घाव-रहित हथेली में विष प्रवेश नहीं करता। उसी प्रकार जो पाप नहीं करता, उसके लिए कोई पाप (दुःखद परिणाम) नहीं होता।
श्लोक 9
जो मनुष्य किसी निष्पाप, पवित्र और दोष-रहित व्यक्ति के प्रति द्रोह करता है, वह पाप उसी मूर्ख पर लौटकर आ गिरता है, जैसे हवा के विपरीत फेंकी गई बारीक धूल फेंकने वाले पर ही आ पड़ती है।
श्लोक 10
कुछ लोग (कर्मानुसार पुनः) मनुष्य की कोख में जन्म लेते हैं; पापकर्म करने वाले नरक में पड़ते हैं; सुचरित्र वाले स्वर्ग को जाते हैं; और जो समस्त आस्रवों (विकारों) से मुक्त हैं, वे परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 11
न अंतरिक्ष (आकाश) में, न समुद्र के बीच में, और न पर्वतों की गुफा में छिपकर—संसार में ऐसी कोई भूमि या स्थान नहीं है जहाँ जाकर मनुष्य अपने किए हुए पाप कर्म के फल से बच सके।
श्लोक 12
न आकाश में, न महासागर के मध्य में, और न पर्वतों की कंदराओं में छिपकर—पृथ्वी पर ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ विद्यमान मनुष्य को मृत्यु अपने वश में न कर ले।
श्लोक 13
पृष्ठभूमि
यह अध्याय पालि धम्मपद (खुद्दक निकाय, पालि त्रिपिटक) का पापवग्ग है, गाथा 116–128। धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार श्रावस्ती, राजगृह और कपिलवस्तु में भगवान बुद्ध ने विभिन्न प्रसंगों में इन गाथाओं का प्रतिपादन किया। गाथा 125 का ऐतिहासिक संदर्भ 'कोक' नामक क्रूर शिकारी से जुड़ा है जिसने एक निर्दोष और शांत भिक्षु का अपमान किया था, जिसके फलस्वरूप उसी के शिकारी कुत्तों ने उसे नोच डाला। इसी प्रकार गाथा 127 तीन भिक्षु-समूहों के प्रसंग में कही गई, जिन्होंने आकाश में जलकर मरे कौए, जहाज़ से फेंकी गई स्त्री और गुफा में फँसे सात भिक्षुओं के विषय में पूछा था; तब तथागत ने बताया कि पृथ्वी पर कोई ऐसा स्थान नहीं जहाँ पाप-कर्म के फल से बचा जा सके। गाथा 128 शाक्य सुप्पबुद्ध के प्रसंग में कही गई, जिसने महल की ऊपरी मंज़िल में स्वयं को बंद कर बुद्ध-वचन को झूठा सिद्ध करना चाहा, पर सातवें दिन पृथ्वी में समा गया।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
कल्याण में शीघ्रता (गाथा 116)
शुभ कर्म करने में जल्दी करनी चाहिए और मन को पाप से रोकना चाहिए; क्योंकि जो पुण्य करने में ढिलाई करता है, उसका चित्त स्वतः पाप में रमने लगता है।
घड़े और बूँद-बूँद का दृष्टांत (गाथा 121–122)
यह सोचकर छोटे पाप की उपेक्षा मत करो कि 'यह मुझ तक नहीं आएगा'—बूँद-बूँद पानी गिरने से भी घड़ा भर जाता है। उसी प्रकार मूर्ख थोड़ा-थोड़ा करके पाप से भर जाता है, और प्रज्ञावान थोड़ा-थोड़ा करके पुण्य से परिपूर्ण हो जाता है।
बिना घाव वाली हथेली (गाथा 124)
यदि हाथ में कोई घाव या चीरा न हो, तो हथेली में विष भी उठाया जा सकता है; विष केवल घाव के रास्ते भीतर जाता है। उसी प्रकार जो पाप नहीं करता, उस पर पाप का कोई असर नहीं होता।
हवा के विरुद्ध फेंकी गई धूल (गाथा 125)
जो मनुष्य किसी निर्दोष, शांत और निष्पाप साधु के साथ द्रोह करता है, वह पाप उसी मूर्ख पर लौटकर आ गिरता है, जैसे हवा के विपरीत फेंकी गई बारीक धूल फेंकने वाले के ही मुँह पर आ पड़ती है।
संसार में छिपने का कोई स्थान नहीं (गाथा 127–128)
न आकाश में, न समुद्र के बीच में और न ही पर्वतों की गहरी कंदराओं में—संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ जाकर मनुष्य अपने पाप के फल या मृत्यु से बच सके।
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