Bharat Devotion
Embroidered artwork for पाप वर्ग: पाप और पुण्य का अटल नियम (गाथा 116–128): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

पाप वर्ग

पाप और पुण्य का अटल नियम (गाथा 116–128)

धम्मपद का पाप वर्ग (गाथा 116–128): शुभ कर्म में शीघ्रता करें; बूँद-बूँद से घड़े की तरह छोटे पाप भी जीवन भर देते हैं और कर्मफल से बचने का कोई स्थान नहीं।

श्लोक

११६। अभित्थरेथ कल्याणे, पापा चित्तं निवारये; धन्धञ्हि करोतो पुञ्ञं, पापस्मिं रमती मनो।

श्लोक 1

११७। पापञ्चे पुरिसो कयिरा, न नं कयिरा पुनप्पुनं; न तम्हि छन्दं कयिराथ, दुक्खो पापस्स उच्चयो।

श्लोक 2

११८। पुञ्ञञ्चे पुरिसो कयिरा, कयिराथेतं पुनप्पुनं; तम्हि छन्दं कयिराथ, सुखो पुञ्ञस्स उच्चयो।

श्लोक 3

११९। पापोपि पस्सति भद्रं, याव पापं न पच्चति; यदा च पच्चति पापं, अथ पापो पापानि पस्सति।

श्लोक 4

१२०। भद्रोपि पस्सति पापं, याव भद्रं न पच्चति; यदा च पच्चति भद्रं, अथ भद्रो भद्रानि पस्सति।

श्लोक 5

१२१। माप्पमञ्ञेथ पापस्स, न मं तं आगमिस्सति; उदबिन्दुनिपातेन, उदकुम्भोपि पूरति; बालो पूरति पापस्स, थोकं थोकम्पि आचिनं।

श्लोक 6

१२२। माप्पमञ्ञेथ पुञ्ञस्स, न मं तं आगमिस्सति; उदबिन्दुनिपातेन, उदकुम्भोपि पूरति; धीरो पूरति पुञ्ञस्स, थोकं थोकम्पि आचिनं।

श्लोक 7

१२३। वाणिजो व भयं मग्गं, अप्पसत्थो महद्धनो; विसं जीवितुकामो व, पापानि परिवज्जये।

श्लोक 8

१२४। पाणिम्हि चे वणो नास्स, हरेय्य पाणिना विसं; नाब्बणं विसमन्वेति, नत्थि पापं अकुब्बतो।

श्लोक 9

१२५। यो अप्पदुट्ठस्स नरस्स दुस्सति, सुद्धस्स पोसस्स अनङ्गणस्स; तमेव बालं पच्चेति पापं, सुखुमो रजो पटिवातंव खित्तो।

श्लोक 10

१२६। गब्भमेके उप्पज्जन्ति, निरयं पापकम्मिनो; सग्गं सुगतिनो यन्ति, परिनिब्बन्ति अनासवा।

श्लोक 11

१२७। न अन्तलिक्खे न समुद्दमज्झे, न पब्बतानं विवरं पविस्स; न विज्जती सो जगतिप्पदेसो, यत्थट्ठितो मुच्चेय्य पापकम्मा।

श्लोक 12

१२८। न अन्तलिक्खे न समुद्दमज्झे, न पब्बतानं विवरं पविस्स; न विज्जती सो जगतिप्पदेसो, यत्थट्ठितं नप्पसहेय्य मच्चु।

श्लोक 13

पृष्ठभूमि

यह अध्याय पालि धम्मपद (खुद्दक निकाय, पालि त्रिपिटक) का पापवग्ग है, गाथा 116–128। धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार श्रावस्ती, राजगृह और कपिलवस्तु में भगवान बुद्ध ने विभिन्न प्रसंगों में इन गाथाओं का प्रतिपादन किया। गाथा 125 का ऐतिहासिक संदर्भ 'कोक' नामक क्रूर शिकारी से जुड़ा है जिसने एक निर्दोष और शांत भिक्षु का अपमान किया था, जिसके फलस्वरूप उसी के शिकारी कुत्तों ने उसे नोच डाला। इसी प्रकार गाथा 127 तीन भिक्षु-समूहों के प्रसंग में कही गई, जिन्होंने आकाश में जलकर मरे कौए, जहाज़ से फेंकी गई स्त्री और गुफा में फँसे सात भिक्षुओं के विषय में पूछा था; तब तथागत ने बताया कि पृथ्वी पर कोई ऐसा स्थान नहीं जहाँ पाप-कर्म के फल से बचा जा सके। गाथा 128 शाक्य सुप्पबुद्ध के प्रसंग में कही गई, जिसने महल की ऊपरी मंज़िल में स्वयं को बंद कर बुद्ध-वचन को झूठा सिद्ध करना चाहा, पर सातवें दिन पृथ्वी में समा गया।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

कल्याण में शीघ्रता (गाथा 116)

शुभ कर्म करने में जल्दी करनी चाहिए और मन को पाप से रोकना चाहिए; क्योंकि जो पुण्य करने में ढिलाई करता है, उसका चित्त स्वतः पाप में रमने लगता है।

घड़े और बूँद-बूँद का दृष्टांत (गाथा 121–122)

यह सोचकर छोटे पाप की उपेक्षा मत करो कि 'यह मुझ तक नहीं आएगा'—बूँद-बूँद पानी गिरने से भी घड़ा भर जाता है। उसी प्रकार मूर्ख थोड़ा-थोड़ा करके पाप से भर जाता है, और प्रज्ञावान थोड़ा-थोड़ा करके पुण्य से परिपूर्ण हो जाता है।

बिना घाव वाली हथेली (गाथा 124)

यदि हाथ में कोई घाव या चीरा न हो, तो हथेली में विष भी उठाया जा सकता है; विष केवल घाव के रास्ते भीतर जाता है। उसी प्रकार जो पाप नहीं करता, उस पर पाप का कोई असर नहीं होता।

हवा के विरुद्ध फेंकी गई धूल (गाथा 125)

जो मनुष्य किसी निर्दोष, शांत और निष्पाप साधु के साथ द्रोह करता है, वह पाप उसी मूर्ख पर लौटकर आ गिरता है, जैसे हवा के विपरीत फेंकी गई बारीक धूल फेंकने वाले के ही मुँह पर आ पड़ती है।

संसार में छिपने का कोई स्थान नहीं (गाथा 127–128)

न आकाश में, न समुद्र के बीच में और न ही पर्वतों की गहरी कंदराओं में—संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ जाकर मनुष्य अपने पाप के फल या मृत्यु से बच सके।

विषय के अनुसार खोजें

Buddha की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

Buddha

Buddha के सभी पाठ देखें →

बौद्ध धर्म से और

सभी देखें