Bharat Devotion
Embroidered artwork for सुख वर्ग: सच्चा सुख और शांति (गाथा 197–208): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

सुख वर्ग

सच्चा सुख और शांति (गाथा 197–208)

सुख वर्ग में 12 आनंदमयी गाथाएँ (197–208) संगृहीत हैं, जो भौतिक उपभोग के स्थान पर मानसिक शांति, अद्वेष और तृष्णा-मुक्ति को सच्चा सुख सिद्ध करती हैं। 'अहो! हम वैरियों के बीच निर्वैर होकर कितना सुखपूर्वक जीते हैं!'—इस दिव्य उल्लास के साथ तथागत संसार की प्रतिस्पर्धा को दुःख का मूल बताते हुए कहते हैं कि जीत से वैर उपजता है और पराजित दुःख में सोता है, किंतु जो जय और पराजय दोनों को छोड़ देता है वही शांत होकर सुख की नींद सोता है। इसी वर्ग में प्रसिद्ध सूत्र समाहित है: 'आरोग्य परम लाभ है, संतोष परम धन है, विश्वास परम बंधु है, और निर्वाण परम सुख है।' (गाथा 204)।

श्लोक

१९७। सुसुखं वत जीवाम, वेरिनेसु अवेरिनो; वेरिनेसु मनुस्सेसु, विहराम अवेरिनो।

श्लोक 1

१९८। सुसुखं वत जीवाम, आतुरेसु अनातुरा; आतुरेसु मनुस्सेसु, विहराम अनातुरा।

श्लोक 2

१९९। सुसुखं वत जीवाम, उस्सुकेसु अनुस्सुका; उस्सुकेसु मनुस्सेसु, विहराम अनुस्सुका।

श्लोक 3

२००। सुसुखं वत जीवाम, येसं नो नत्थि किञ्चनं; पीतिभक्खा भविस्साम, देवा आभस्सरा यथा।

श्लोक 4

२०१। जयं वेरं पसवति, दुक्खं सेति पराजितो; उपसन्तो सुखं सेति, हित्वा जयपराजयं।

श्लोक 5

२०२। नत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो कलि; नत्थि खन्धसमा दुक्खा, नत्थि सन्तिपरं सुखं।

श्लोक 6

२०३। जिघच्छापरमा रोगा, सङ्खारपरमा दुखा; एतं ञत्वा यथाभूतं, निब्बानं परमं सुखं।

श्लोक 7

२०४। आरोग्यपरमा लाभा, सन्तिट्ठिपरमं धनं; विस्सासपरमा ञाति, निब्बानं परमं सुखं।

श्लोक 8

२०५। पविवेकरसं पित्वा, रसं उपसमस्स च; निद्दरो होति निप्पापो, धम्मपीतिरसं पिवं।

श्लोक 9

२०६। साहु दस्सनमरियानं, सन्निवासो सदा सुखो; अदस्सनेन बालानं, निच्चमेव सुखी सिया।

श्लोक 10

२०७। बालसङ्गतचारी हि, दीघमद्धान सोचति; दुक्खो बालेहि संवासो, अमित्तेनेव सब्बदा; धीरो च सुखसंवासो, ञातीनंव समागमो।

श्लोक 11

२०८। तस्मा हि: धीरञ्च पञ्ञञ्च बहुस्सुतञ्च, धोरय्हसीलं वतवन्तमारियं; तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं, भजेथ नक्खत्तपथंव चन्दिमा।

श्लोक 12

पृष्ठभूमि

धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार, जब रोहिणी नदी के जल के बँटवारे को लेकर शाक्य और कोलिय वंश के लोग युद्ध के मुहाने पर खड़े थे, तब भगवान बुद्ध ने दोनों सेनाओं के बीच खड़े होकर समझाया कि पानी अधिक कीमती है या मनुष्य का रक्त? तब उन्होंने गाथा 197–199 का उपदेश देकर युद्ध को रोका। इसी प्रकार गाथा 201 मगध नरेश अजातशत्रु और कोसल नरेश प्रसेनजित के युद्ध के अवसर पर कही गई थी, जब पराजित कोसल-नरेश प्रसेनजित शोक में डूब गए थे। गाथा 204 में प्रसेनजित को आहार-संयम और संतोष का परम मंत्र दिया गया।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

वैरियों के बीच निर्वैर (गाथा 197–199)

'अहो! हम कितने सुख से जीते हैं, जो वैर रखने वालों के बीच भी सर्वथा वैर-रहित हैं; जो विषय-विकारों से रुग्ण लोगों के बीच पूर्ण स्वस्थ हैं; और जो बेचैन व तृष्णा से व्याकुल लोगों के मध्य परम शांत हैं।'

अकिंचन होकर प्रीति का भोजन (गाथा 200)

अहो! हम कितने सुख से जीते हैं जिनके पास अपना कहने को कोई सांसारिक परिग्रह नहीं है! हम आभास्वर लोक के दिव्य देवताओं की भाँति केवल आत्मिक आनंद (प्रीति) का ही भोजन करते हैं।

जीत से वैर और हार से दुःख (गाथा 201)

विजय से वैर और शत्रुता पैदा होती है; पराजित व्यक्ति दुःख और शोक में सोता है; परंतु शांत पुरुष जय और पराजय दोनों का त्याग करके परम सुख की नींद सोता है।

चार सर्वोत्तम संपदाएँ (गाथा 204)

'आरोग्य सबसे बड़ा लाभ है; संतोष सबसे बड़ा धन है; विश्वास सबसे बड़ा संबंधी (मित्र) है; और निर्वाण सबसे परम सुख है।'

तारों के पथ पर चंद्रमा (गाथा 208)

जिस प्रकार पूर्णिमा का चंद्रमा आकाश में नक्षत्रों के मार्ग पर चलता है, उसी प्रकार मनुष्य को धीर, प्रज्ञावान, बहुश्रुत, शीलवान और सत्यनिष्ठ पुरुषों का ही अनुगमन करना चाहिए।

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