सुख वर्ग में 12 आनंदमयी गाथाएँ (197–208) संगृहीत हैं, जो भौतिक उपभोग के स्थान पर मानसिक शांति, अद्वेष और तृष्णा-मुक्ति को सच्चा सुख सिद्ध करती हैं। 'अहो! हम वैरियों के बीच निर्वैर होकर कितना सुखपूर्वक जीते हैं!'—इस दिव्य उल्लास के साथ तथागत संसार की प्रतिस्पर्धा को दुःख का मूल बताते हुए कहते हैं कि जीत से वैर उपजता है और पराजित दुःख में सोता है, किंतु जो जय और पराजय दोनों को छोड़ देता है वही शांत होकर सुख की नींद सोता है। इसी वर्ग में प्रसिद्ध सूत्र समाहित है: 'आरोग्य परम लाभ है, संतोष परम धन है, विश्वास परम बंधु है, और निर्वाण परम सुख है।' (गाथा 204)।
श्लोक
अहो! हम कितने आनंद से जीते हैं, जो वैर रखने वालों के बीच भी सर्वथा वैर-रहित (निर्वैर) हैं! द्वेष और शत्रुता रखने वाले मनुष्यों के बीच भी हम बिना किसी बैर-भाव के सुखपूर्वक रहते हैं।
श्लोक 1
अहो! हम कितने सुखपूर्वक जीते हैं, जो मानसिक क्लेशों से रुग्ण लोगों के बीच भी सर्वथा स्वस्थ (रोग-रहित) हैं! वासना-ग्रस्त व्याकुल मनुष्यों के मध्य भी हम शांत और निरोग होकर विचरते हैं।
श्लोक 2
अहो! हम कितने आनंद से जीते हैं, जो सांसारिक इच्छाओं के लिए बेचैन व व्याकुल लोगों के बीच भी सर्वथा निष्काम और शांत हैं! तृष्णा में जलते मनुष्यों के बीच भी हम तृष्णा-रहित होकर विचरते हैं।
श्लोक 3
अहो! हम कितने परम सुख से जीते हैं, जिनके पास अपना कहलाने वाला कोई सांसारिक परिग्रह (संग्रह) नहीं है! हम आभास्वर लोक के दिव्य देवताओं की तरह केवल आध्यात्मिक प्रीति (आनंद) का आहार करने वाले होकर जीते हैं।
श्लोक 4
जीत से वैर और शत्रुता पैदा होती है; और पराजित व्यक्ति दुःख और संताप में सोता है। जो शांत पुरुष जय और पराजय दोनों का परित्याग कर देता है, वह परम सुखपूर्वक सोता है।
श्लोक 5
राग (काम-वासना) के समान कोई आग नहीं है; द्वेष (क्रोध) के समान कोई अपराध या दुर्भाग्य नहीं है; पञ्च स्कंधों के समान कोई दुःख नहीं है; और परम शांति (निर्वाण) से बढ़कर कोई सुख नहीं है।
श्लोक 6
भूख सबसे बड़ा रोग है; संस्कार (संसार के परिवर्तनशील धर्म) सबसे बड़ा दुःख हैं। इस सत्य को यथार्थ रूप से जानकर मनुष्य समझता है कि निर्वाण ही परम सुख है।
श्लोक 7
आरोग्य (निरोगिता) सबसे बड़ा लाभ है; संतोष सबसे बड़ा धन है; विश्वास सबसे श्रेष्ठ सगे-संबंधी (बंधु) हैं; और निर्वाण ही परम सुख है।
श्लोक 8
एकांत साधना के रस और आंतरिक शांति के अमृत का पान करके, धर्म के आनंद-रस को पीने वाला साधक भय-रहित और पाप-रहित हो जाता है।
श्लोक 9
आर्य पुरुषों (सत्पुरुषों) का दर्शन करना कल्याणकारी है; उनके साथ रहना सदा सुखदायी होता है। मूर्खों को न देखने से मनुष्य निरंतर सुखी रह सकता है।
श्लोक 10
मूर्खों की संगति में चलने वाला मनुष्य दीर्घकाल तक शोक करता है; मूर्खों के साथ रहना शत्रु के साथ रहने की तरह सदा दुःखदायी होता है। परंतु धीर और प्रज्ञावान व्यक्ति का साथ प्रिय बंधु-बांधवों के मिलन के समान सदा सुखद होता है।
श्लोक 11
अतः जो धीर, प्रज्ञावान, बहुश्रुत (विद्वान), सहनशील, सदाचारी और श्रेष्ठ आर्य पुरुष हैं—ऐसे सत्पुरुष और मेधावी का उसी प्रकार अनुगमन करें जैसे चंद्रमा आकाश में नक्षत्रों के पथ का अनुसरण करता है।
श्लोक 12
पृष्ठभूमि
धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार, जब रोहिणी नदी के जल के बँटवारे को लेकर शाक्य और कोलिय वंश के लोग युद्ध के मुहाने पर खड़े थे, तब भगवान बुद्ध ने दोनों सेनाओं के बीच खड़े होकर समझाया कि पानी अधिक कीमती है या मनुष्य का रक्त? तब उन्होंने गाथा 197–199 का उपदेश देकर युद्ध को रोका। इसी प्रकार गाथा 201 मगध नरेश अजातशत्रु और कोसल नरेश प्रसेनजित के युद्ध के अवसर पर कही गई थी, जब पराजित कोसल-नरेश प्रसेनजित शोक में डूब गए थे। गाथा 204 में प्रसेनजित को आहार-संयम और संतोष का परम मंत्र दिया गया।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
वैरियों के बीच निर्वैर (गाथा 197–199)
'अहो! हम कितने सुख से जीते हैं, जो वैर रखने वालों के बीच भी सर्वथा वैर-रहित हैं; जो विषय-विकारों से रुग्ण लोगों के बीच पूर्ण स्वस्थ हैं; और जो बेचैन व तृष्णा से व्याकुल लोगों के मध्य परम शांत हैं।'
अकिंचन होकर प्रीति का भोजन (गाथा 200)
अहो! हम कितने सुख से जीते हैं जिनके पास अपना कहने को कोई सांसारिक परिग्रह नहीं है! हम आभास्वर लोक के दिव्य देवताओं की भाँति केवल आत्मिक आनंद (प्रीति) का ही भोजन करते हैं।
जीत से वैर और हार से दुःख (गाथा 201)
विजय से वैर और शत्रुता पैदा होती है; पराजित व्यक्ति दुःख और शोक में सोता है; परंतु शांत पुरुष जय और पराजय दोनों का त्याग करके परम सुख की नींद सोता है।
चार सर्वोत्तम संपदाएँ (गाथा 204)
'आरोग्य सबसे बड़ा लाभ है; संतोष सबसे बड़ा धन है; विश्वास सबसे बड़ा संबंधी (मित्र) है; और निर्वाण सबसे परम सुख है।'
तारों के पथ पर चंद्रमा (गाथा 208)
जिस प्रकार पूर्णिमा का चंद्रमा आकाश में नक्षत्रों के मार्ग पर चलता है, उसी प्रकार मनुष्य को धीर, प्रज्ञावान, बहुश्रुत, शीलवान और सत्यनिष्ठ पुरुषों का ही अनुगमन करना चाहिए।
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