बुद्ध वर्ग में 18 परम पावन गाथाएँ (179–196) संकलित हैं, जो बौद्ध धर्म के केंद्रीय सार और तथागत बुद्ध के स्वरूप को उद्घाटित करती हैं। इसमें समस्त बुद्धों का मूल संदेश उद्घोषित करने वाली सर्वाधिक प्रसिद्ध गाथा 183 समाहित है: 'सब पापों से दूर रहना, कुशल (पुण्य) कर्मों का संचय करना और अपने चित्त को सर्वथा परिशुद्ध करना—यही सब बुद्धों का शासन (शिक्षा) है।' भयभीत होकर पर्वतों, वृक्षों और देवस्थानों की शरण में जाने को असुरक्षित बतलाते हुए बुद्ध त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म, संघ) और चार आर्य सत्यों की शरण को ही संसार के समस्त दुःखों से मुक्त कराने वाली सर्वोच्च शरण सिद्ध करते हैं।
श्लोक
जिसकी विजय को कोई पुनः पराजय में नहीं बदल सकता, जिसके जीते हुए क्लेशों का संसार में कोई भी पीछा नहीं कर सकता—उस असीम प्रज्ञा वाले, पदचिह्न-रहित (आसक्ति-मुक्त) तथागत बुद्ध को तुम किस वासना के मार्ग से लुभा सकोगे?
श्लोक 1
जिसके भीतर किसी भी ओर भटकाने वाली जाल के समान चिपचिपी तृष्णा का लेश भी शेष नहीं है—उस अनंत गोचर वाले, पदचिह्न-रहित बुद्ध को तुम किस रास्ते से खींच सकोगे?
श्लोक 2
जो प्रज्ञावान धीर पुरुष ध्यान में निरंतर लगे रहते हैं, और जो निष्कामता (त्याग) की परम शांति में आनंद पाते हैं—उन स्मृतिवान सम्यक संबुद्धों की देवता भी स्तुति और चाहना करते हैं।
श्लोक 3
मनुष्य का जन्म पाना अत्यंत दुर्लभ है; मरणधर्मा प्राणियों का जीवित रहना कठिन है; सत्य धर्म (सद्धर्म) का श्रवण मिलना दुर्लभ है; और संसार में बुद्धों का आविर्भाव होना अत्यंत दुर्लभ है।
श्लोक 4
समस्त पाप कर्मों से दूर रहना, कुशल (पुण्य) कर्मों का संपादन करना, और अपने चित्त को भली-भाँति शुद्ध करना—यही सब बुद्धों का शासन (मूल उपदेश) है।
श्लोक 5
क्षमा और तितिक्षा (सहनशीलता) ही परम तपस्या है; बुद्ध निर्वाण को ही परम पद कहते हैं। जो दूसरे को चोट पहुँचाता है वह संन्यासी नहीं है, और जो दूसरे को सताता है वह सच्चा श्रमण नहीं हो सकता।
श्लोक 6
किसी की निंदा न करना, किसी को चोट न पहुँचाना, नैतिक नियमों (प्रातिमोक्ष) में संयमित रहना, भोजन में मात्रा का ध्यान रखना, एकांत वास-स्थान का सेवन, और उच्च चेतना (समाधि) की साधना में संलग्न रहना—यही बुद्धों का उपदेश है।
श्लोक 7
सोने के सिक्कों (मुद्राओं) की वर्षा से भी काम-वासनाओं की कभी तृप्ति नहीं हो सकती; 'काम-भोग अल्प स्वाद वाले और बहु-दुःखदायी होते हैं'—ऐसा जानकर प्रज्ञावान साधक,
श्लोक 8
दिव्य स्वर्गीय सुखों में भी कोई आसक्ति या आनंद नहीं ढूँढता; सम्यक संबुद्ध का सच्चा शिष्य केवल समस्त तृष्णाओं के क्षय (निर्वाण) में ही आनंदित रहता है।
श्लोक 9
भय से व्याकुल होकर मनुष्य अनेक प्रकार की शरणों में जाते हैं—पर्वतों, वनों, उपवनों, पवित्र वृक्षों और चैत्यों (समाधियों) की शरण लेते हैं।
श्लोक 10
किंतु यह कोई सुरक्षित आश्रय नहीं है, न ही यह कोई सर्वोत्तम शरण है; ऐसे बाह्य स्थानों की शरण में जाकर मनुष्य अपने समस्त दुःखों से कभी मुक्त नहीं हो सकता।
श्लोक 11
परंतु जो बुद्ध, धम्म और संघ की शरण ग्रहण करता है, वह सम्यक प्रज्ञा (ज्ञान की दृष्टि) से चार आर्य सत्यों को प्रत्यक्ष देखता है:
श्लोक 12
दुःख, दुःख की उत्पत्ति (कारण), दुःख का सर्वथा निवारण (निरोध), और दुःख को सदा के लिए शांत करने वाला आर्य अष्टांगिक मार्ग।
श्लोक 13
यही वास्तव में परम सुरक्षित आश्रय है, यही सर्वोच्च उत्तम शरण है; इस त्रिरत्न और आर्य सत्यों की शरण में आकर मनुष्य अपने सारे दुःखों से सर्वथा मुक्त हो जाता है।
श्लोक 14
उत्तम अजानिय (अतुलनीय महापुरुष बुद्ध) का जन्म अत्यंत दुर्लभ है; वह हर कहीं उत्पन्न नहीं होता। वह प्रज्ञावान महामानव जहाँ भी जन्म लेता है, वह कुल और समाज परम सुख-शांति को प्राप्त करता है।
श्लोक 15
संसार में बुद्धों का आविर्भाव परम सुखदायी है; सद्धर्म का उपदेश सुख प्रदान करने वाला है; संघ की एकता सुख देने वाली है; और एकजुट होकर साधना करने वालों की तपस्या परम सुखमयी होती है।
श्लोक 16
जो पूजनीय महापुरुषों की पूजा करता है—चाहे वे तथागत बुद्ध हों या उनके विमुक्त शिष्य—जिन्होंने प्रपंचों (मानसिक विकल्पों) को पार कर लिया है और जो शोक तथा विलाप के सागर से पार उतर चुके हैं,
श्लोक 17
उन पूर्ण शांत, तृष्णा-रहित और सर्वथा निर्भय महापुरुषों की पूजा करने वाले के पुण्य की कोई भी कभी यह कहकर गणना नहीं कर सकता कि 'इसका पुण्य केवल इतना ही है।' (उसका पुण्य अनंत और अथाह होता है)।
श्लोक 18
पृष्ठभूमि
धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार, राजगृह के वेणुवन में माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर जब 1,250 अरहंत भिक्षु बिना किसी निमंत्रण के स्वयं एकत्र हुए, तब तथागत ने उन्हें 'ओवाद-पातिमोक्ख' (भिक्षु अनुशासन का सार) के रूप में गाथा 183–185 का अमर उपदेश दिया था। इसी प्रकार बोधगया में अजापाल बरगद के वृक्ष के नीचे जब मार की तीन पुत्रियों (तृष्णा, अरति, राग) ने बुद्ध को विचलित करने का असफल प्रयास किया, तब गाथा 179 और 180 उच्चारित हुई थीं। गाथा 188–192 में ब्राह्मण अग्निदत्त को बाह्य अंधविश्वासों के स्थान पर त्रिरत्न की शरण का मार्ग दिखाया गया।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
समस्त बुद्धों का त्रिसूत्रीय अमर संदेश (गाथा 183)
'सब पापों से विरत रहना, कुशल (पुण्य) कर्मों का संचय करना, और अपने चित्त को भली-भाँति निर्मल व शुद्ध करना—यही त्रिकाल के समस्त बुद्धों का वास्तविक उपदेश है।'
ओवाद-पातिमोक्ख के मूल सिद्धांत (गाथा 184–185)
क्षमा और तितिक्षा (सहनशीलता) ही परम तपस्या है; बुद्ध निर्वाण को ही परम सुख कहते हैं। किसी की निंदा न करना, किसी को चोट न पहुँचाना, सदाचार में स्थिर रहना, और ध्यान में रत रहना ही सच्चे संन्यासी का लक्षण है।
संसार में चार दुर्लभ बातें (गाथा 182)
मनुष्य का जन्म मिलना अत्यंत दुर्लभ है; मनुष्यों का जीवन सुरक्षित रहना कठिन है; सत्य धर्म (सद्धर्म) का श्रवण मिलना दुर्लभ है; और संसार में बुद्धों का आविर्भाव होना अत्यंत दुर्लभतम है।
असुरक्षित शरण बनाम त्रिरत्न की परम शरण (गाथा 188–192)
भयभीत मनुष्य पहाड़ों, जंगलों, उपवनों और वृक्ष-चैत्यों की शरण में जाते हैं; परंतु ये कोई सुरक्षित या उत्तम शरण नहीं हैं। जो बुद्ध, धम्म और संघ की शरण लेता है और चार आर्य सत्यों को प्रज्ञा से देखता है, वही समस्त दुःखों से मुक्त होता है।
चार परम सुख (गाथा 194)
बुद्धों का जन्म परम सुखदायी है; सद्धर्म का उपदेश परम सुखदायी है; संघ की एकता सुख देने वाली है; और एकजुट होकर साधना करने वालों का तप अत्यंत आनंदप्रद है।
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