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Embroidered artwork for बुद्ध वर्ग: तथागत भगवान बुद्ध का पावन स्वरूप (गाथा 179–196): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

बुद्ध वर्ग

तथागत भगवान बुद्ध का पावन स्वरूप (गाथा 179–196)

बुद्ध वर्ग में 18 परम पावन गाथाएँ (179–196) संकलित हैं, जो बौद्ध धर्म के केंद्रीय सार और तथागत बुद्ध के स्वरूप को उद्घाटित करती हैं। इसमें समस्त बुद्धों का मूल संदेश उद्घोषित करने वाली सर्वाधिक प्रसिद्ध गाथा 183 समाहित है: 'सब पापों से दूर रहना, कुशल (पुण्य) कर्मों का संचय करना और अपने चित्त को सर्वथा परिशुद्ध करना—यही सब बुद्धों का शासन (शिक्षा) है।' भयभीत होकर पर्वतों, वृक्षों और देवस्थानों की शरण में जाने को असुरक्षित बतलाते हुए बुद्ध त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म, संघ) और चार आर्य सत्यों की शरण को ही संसार के समस्त दुःखों से मुक्त कराने वाली सर्वोच्च शरण सिद्ध करते हैं।

श्लोक

१७९। यस्स जितं नावजीयति, जितं यस्स नो याति कोचि लोके; तं बुद्धमनन्तगोचरं, अपदं केन पदेन नेस्सथ।

श्लोक 1

१८०। यस्स जालिनी विसत्तिका, तण्हा नत्थि कुहिञ्चि नेतवे; तं बुद्धमनन्तगोचरं, अपदं केन पदेन नेस्सथ।

श्लोक 2

१८१। ये झानपसुता धीरा, नेक्खम्मूपसमे रता; देवापि तेसं पिहयन्ति, सम्बुद्धानं सतीमतं।

श्लोक 3

१८२। किच्छो मनुस्सपटिलाभो, किच्छं मच्चान जीवितं; किच्छं सद्धम्मस्सवनं, किच्छो बुद्धानमुप्पादो।

श्लोक 4

१८३। सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा; सचित्तपरियोदपनं, एतं बुद्धान सासनं।

श्लोक 5

१८४। खन्ती परमं तपो तितिक्खा, निब्बानं परमं वदन्ति बुद्धा; न हि पब्बजितो परूपघाती, समणो होति परं विहेठयन्तो।

श्लोक 6

१८५। अनूपवादो अनूपघातो, पातिमोक्खे च संवरो; मत्तञ्ञुता च भत्तस्मिं, पन्तञ्च सयनासनं; अधिचित्ते च आयोगो, एतं बुद्धान सासनं।

श्लोक 7

१८६। न कहापणवस्सेन, तित्ति कामेसु विज्जति; अप्पस्सादा दुखा कामा, इति विञ्ञाय पण्डितो।

श्लोक 8

१८७। अपि दिब्बेसु कामेसु, रतिं सो नाधिगच्छति; तण्हाक्खयरतो होति, सम्मासम्बुद्धसावको।

श्लोक 9

१८८। बहुं वे सरणं यन्ति, पब्बतानि वनानि च; आरामरुक्खचेत्यानि, मनुस्सा भयतज्जिता।

श्लोक 10

१८९। न्ऽएतं खो सरणं खेमं, न्ऽएतं सरणमुत्तमं; न्ऽएतं सरणमागम्म, सब्बदुक्खा पमुच्चति।

श्लोक 11

१९०। यो च बुद्धञ्च धम्मञ्च, सङ्घञ्च सरणं गतो; चत्तारि अरियसच्चानि, सम्मप्पञ्ञाय पस्सति।

श्लोक 12

१९१। दुक्खं दुक्खसमुप्पादं, दुक्खस्स च अतिक्कमं; अरियञ्चट्ठङ्गिकं मग्गं, दुक्खूपसमगामिनं।

श्लोक 13

१९२। एतं खो सरणं खेमं, एतं सरणमुत्तमं; एतं सरणमागम्म, सब्बदुक्खा पमुच्चति।

श्लोक 14

१९३। दुल्लभो पुरिसाजञ्ञो, न सो सब्बत्थ जायति; यत्थ सो जायति धीरो, तं कुलं सुखमेधति।

श्लोक 15

१९४। सुखो बुद्धानमुप्पादो, सुखा सद्धम्मदेसना; सुखा सङ्घस्स सामग्गी, समग्गानं तपो सुखो।

श्लोक 16

१९५। पूजारहे पूजयतो, बुद्धे यदि व सावके; पपञ्चसमतिक्कन्ते, तिण्णसोकपरिद्दवे।

श्लोक 17

१९६। ते तादिसे पूजयतो, निब्बुते अकुतोभये; न सक्का पुञ्ञं सङ्खातुं, इमेत्तमपि केनचि।

श्लोक 18

पृष्ठभूमि

धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार, राजगृह के वेणुवन में माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर जब 1,250 अरहंत भिक्षु बिना किसी निमंत्रण के स्वयं एकत्र हुए, तब तथागत ने उन्हें 'ओवाद-पातिमोक्ख' (भिक्षु अनुशासन का सार) के रूप में गाथा 183–185 का अमर उपदेश दिया था। इसी प्रकार बोधगया में अजापाल बरगद के वृक्ष के नीचे जब मार की तीन पुत्रियों (तृष्णा, अरति, राग) ने बुद्ध को विचलित करने का असफल प्रयास किया, तब गाथा 179 और 180 उच्चारित हुई थीं। गाथा 188–192 में ब्राह्मण अग्निदत्त को बाह्य अंधविश्वासों के स्थान पर त्रिरत्न की शरण का मार्ग दिखाया गया।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

समस्त बुद्धों का त्रिसूत्रीय अमर संदेश (गाथा 183)

'सब पापों से विरत रहना, कुशल (पुण्य) कर्मों का संचय करना, और अपने चित्त को भली-भाँति निर्मल व शुद्ध करना—यही त्रिकाल के समस्त बुद्धों का वास्तविक उपदेश है।'

ओवाद-पातिमोक्ख के मूल सिद्धांत (गाथा 184–185)

क्षमा और तितिक्षा (सहनशीलता) ही परम तपस्या है; बुद्ध निर्वाण को ही परम सुख कहते हैं। किसी की निंदा न करना, किसी को चोट न पहुँचाना, सदाचार में स्थिर रहना, और ध्यान में रत रहना ही सच्चे संन्यासी का लक्षण है।

संसार में चार दुर्लभ बातें (गाथा 182)

मनुष्य का जन्म मिलना अत्यंत दुर्लभ है; मनुष्यों का जीवन सुरक्षित रहना कठिन है; सत्य धर्म (सद्धर्म) का श्रवण मिलना दुर्लभ है; और संसार में बुद्धों का आविर्भाव होना अत्यंत दुर्लभतम है।

असुरक्षित शरण बनाम त्रिरत्न की परम शरण (गाथा 188–192)

भयभीत मनुष्य पहाड़ों, जंगलों, उपवनों और वृक्ष-चैत्यों की शरण में जाते हैं; परंतु ये कोई सुरक्षित या उत्तम शरण नहीं हैं। जो बुद्ध, धम्म और संघ की शरण लेता है और चार आर्य सत्यों को प्रज्ञा से देखता है, वही समस्त दुःखों से मुक्त होता है।

चार परम सुख (गाथा 194)

बुद्धों का जन्म परम सुखदायी है; सद्धर्म का उपदेश परम सुखदायी है; संघ की एकता सुख देने वाली है; और एकजुट होकर साधना करने वालों का तप अत्यंत आनंदप्रद है।

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