Bharat Devotion
Embroidered artwork for बुद्ध का सन्देश: Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

बुद्ध का सन्देश

बुद्ध का सन्देश

यह एक प्रसिद्ध बौद्ध श्लोक है जो बुद्ध की शिक्षा का सार बताता है: सभी बुरे कर्मों से बचना, अच्छे कर्मों को अपनाना, और अपने मन को शुद्ध करना ही सच्चा धर्म है।

श्लोक

सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा; सचित्तपरियोदपनं, एतं बुद्धान सासनं।
Sabba papassa akaranam, kusalassa upasampada; Sacitta pariyodapanam, etam buddhana sasanam.

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह श्लोक धम्मपद (बुद्ध के वचनों का संग्रह) से लिया गया है, जो पालि त्रिपिटक का एक भाग है। परंपरागत रूप से इसका पाठ बौद्ध भिक्षुओं और अनुयायियों द्वारा ध्यान, नैतिक शिक्षा या दैनिक प्रार्थना में किया जाता है। यह बुद्ध की शिक्षा का सार माना जाता है और सभी बौद्ध परंपराओं में समान रूप से पूजनीय है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

स्रोत

यह श्लोक धम्मपद के 183वें सूत्र से लिया गया है, जो बौद्ध धर्म के सबसे प्रसिद्ध ग्रंथों में से एक है। धम्मपद में बुद्ध के 423 वचन संग्रहित हैं, जिन्हें उनके शिष्यों ने उनके निर्वाण के बाद संकलित किया।

अर्थ

इस श्लोक में बुद्ध ने तीन मूलभूत सिद्धांत बताए हैं: पाप से बचना, पुण्य का अर्जन करना, और मन को शुद्ध करना। यही सभी बुद्धों की शिक्षा है। यह त्रिविध प्रशिक्षण (शील, समाधि, प्रज्ञा) का सार है।

महत्व

यह श्लोक बौद्ध धर्म के सार को एक पंक्ति में समेटता है। इसे अक्सर बौद्ध उपासना और ध्यान के आरंभ में पढ़ा जाता है। यह नैतिक आचरण, मानसिक अनुशासन और ज्ञान के मार्ग को एक साथ दर्शाता है।

भाषा

यह श्लोक पालि भाषा में है, जो बुद्ध के समय की मगधी प्राकृत से विकसित हुई। पालि को बौद्ध धर्म की लिटर्जिकल भाषा माना जाता है, और धम्मपद इसी भाषा में रचित है।

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