लोक वर्ग में 12 तेजस्वी गाथाएँ (167–178) संकलित हैं, जो संसार की चकाचौंध और मायावी आकर्षण के पार देखने की प्रेरणा देती हैं। भगवान बुद्ध बताते हैं कि जो व्यक्ति इस संसार को पानी के बुलबुले या मृगतृष्णा (मरीचिका) के समान क्षणभंगुर देखता है, मृत्यु का राजा (यम) उसे नहीं देख पाता। जो पहले प्रमादी रहकर बाद में अप्रमादी हो जाता है अथवा अपने पूर्व पापों को पुण्य कर्मों से ढक देता है, वह बादलों से मुक्त पूर्णिमा के चंद्रमा की भाँति पूरे संसार को आलोकित करता है। अध्याय के अंत में तथागत घोषणा करते हैं कि संपूर्ण पृथ्वी का एकछत्र साम्राज्य पाने अथवा स्वर्ग जाने की तुलना में सोतापत्ति (आर्य मार्ग में प्रथम प्रवेश) का फल अनंत गुना श्रेष्ठ है।
श्लोक
हीन और निकृष्ट धर्म (विषय-वासनाओं) का सेवन न करें; प्रमाद (लापरवाही) में न जिएँ; मिथ्या दृष्टि को न अपनाएँ; और संसार (जन्म-मरण के चक्र) को बढ़ाने वाले न बनें।
श्लोक 1
उठो! प्रमाद मत करो! धर्म का उत्तम आचरण करो! धर्मानुसार आचरण करने वाला मनुष्य इस लोक में और परलोक में भी परम सुखपूर्वक रहता है।
श्लोक 2
सदाचार रूपी धर्म का आचरण करें, कभी दुराचार (पाप) का आचरण न करें; क्योंकि धर्म का पालन करने वाला इस संसार में भी और परलोक में भी परम सुख को पाता है।
श्लोक 3
जैसे कोई पानी के बुलबुले को देखता है, और जैसे कोई रेगिस्तान की मरीचिका (मृगतृष्णा) को देखता है—उसी प्रकार जो इस संसार को अनित्य और निःसार देखता है, मृत्यु का राजा (यम) उसे ढूँढ नहीं पाता।
श्लोक 4
आओ, इस संसार को देखो, जो राजा के अत्यंत सुंदर और सजे-धजे रथ के समान है! जिसमें मूर्ख लोग आसक्त होकर फँसे रहते हैं और नष्ट हो जाते हैं, किंतु ज्ञानी जनों के लिए इसमें कोई आसक्ति या बंधन नहीं होता।
श्लोक 5
जो मनुष्य पहले प्रमादी (असावधान या पापी) था, परंतु बाद में पूर्णतः अप्रमादी (सजग व धर्मात्मा) हो जाता है—वह बादलों की ओट से छूटे हुए चंद्रमा की भाँति इस पूरे संसार को प्रकाशित कर देता है।
श्लोक 6
जिसके किए हुए पूर्व पाप कर्म प्रचुर कुशल (पुण्य) कर्मों द्वारा ढक जाते हैं—वह बादलों से मुक्त निर्मल चंद्रमा की तरह इस संसार को देदीप्यमान कर देता है।
श्लोक 7
यह संसार अंधा (अविद्याग्रस्त) है; इसमें बहुत ही थोड़े लोग विपश्यना (सत्य की दृष्टि) से देख पाते हैं। बहेलिए के जाल से छूटने वाले पक्षी की तरह बहुत विरले ही स्वर्ग अथवा निर्वाण को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 8
हंस सूर्य के मार्ग पर आकाश में उड़ते हैं; सिद्ध पुरुष ऋद्धि-बल से आकाश में गमन करते हैं; और प्रज्ञावान धीर पुरुष मार (काम-क्रोध) तथा उसकी विशाल सेना को जीतकर इस संसार से पार निकल जाते हैं।
श्लोक 9
जिस मनुष्य ने केवल एक धर्म (सत्य) का उल्लंघन कर दिया है, जो जानबूझकर झूठ बोलता है, और जो परलोक (कर्म-फल) का उपहास करता है—उसके लिए संसार में ऐसा कोई पाप नहीं जो वह न कर सके।
श्लोक 10
कंजूस (कृपण) लोग देवलोक में कभी नहीं जाते; मूर्ख लोग दान की कभी प्रशंसा नहीं करते; परंतु ज्ञानी पुरुष दान देने में आनंद का अनुभव करते हैं, और इसी कारण वे परलोक में परम सुखी होते हैं।
श्लोक 11
सारी पृथ्वी का एकछत्र साम्राज्य पाने से, स्वर्गलोक में जाने से, अथवा संपूर्ण लोकों के आधिपत्य प्राप्त करने की अपेक्षा भी 'सोतापत्ति-फल' (आर्य सत्य के प्रथम पद में प्रवेश) का फल अनंत गुना श्रेष्ठ है।
श्लोक 12
पृष्ठभूमि
धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार, जब बुद्ध संबोधि प्राप्त करने के पश्चात पहली बार अपने पैतृक नगर कपिलवस्तु पधारे और राजप्रासाद की बजाय नगर की गलियों में भिक्षाटन करने लगे, तब विस्मित पिता राजा शुद्धोदन को सत्य का उपदेश देते हुए उन्होंने गाथा 168 और 169 कही थी। इसी प्रकार उँगलीमाल डाकू के पश्चात्ताप और अरहंत बनने के अवसर पर गाथा 173 ('अंगुलीमाल गाथा') कही गई थी कि कैसे सत्कर्मों से पाप का अंधकार मिटकर चंद्रमा की तरह चमक उठता है। गाथा 178 में सोतापत्ति फल को सार्वभौम चक्रवर्ती सम्राट के पद से भी ऊँचा घोषित किया गया।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
बुलबुला और मरीचिका (गाथा 170)
जैसे कोई पानी के बुलबुले को देखता है अथवा जैसे मरुस्थल की मृगतृष्णा को देखता है, वैसे ही जो इस संसार को अनित्य देखता है, मृत्यु का राजा (यम) उसे कभी नहीं देख पाता।
सुसज्जित राजरथ का दृष्टांत (गाथा 171)
'आओ, इस सजे-धजे संसार को देखो, जो राजा के सुंदर चमकीले रथ के समान है!' मूर्ख मनुष्य इसके बाह्य रूप-रंग में डूबकर नष्ट हो जाते हैं, किंतु ज्ञानी जन इसमें तनिक भी आसक्ति नहीं रखते।
बादलों से मुक्त पूर्ण चंद्रमा (गाथा 172–173)
जो पहले प्रमादी था किंतु बाद में जागरूक हो गया, अथवा जिसने अपने पूर्व पापों को विपुल पुण्य कर्मों से आच्छादित कर दिया है—वह बादलों की ओट से निकले चंद्रमा की भाँति इस पूरे संसार को प्रकाशित करता है।
सूर्य मार्ग पर उड़ते हंस (गाथा 175)
हंस आकाश में सूर्य के मार्ग पर उड़ते हैं; सिद्ध पुरुष ऋद्धि-बल से आकाश में गमन करते हैं; परंतु प्रज्ञावान धीर पुरुष मार और उसकी विशाल सेना को जीतकर इस संपूर्ण भवसागर से सदा के लिए पार निकल जाते हैं।
चक्रवर्ती साम्राज्य से श्रेष्ठ सोतापत्ति (गाथा 178)
सारी पृथ्वी का एकछत्र चक्रवर्ती सम्राट बनने से, स्वर्गलोक के देवराज का पद पाने से, अथवा तीनों लोकों का आधिपत्य प्राप्त करने से भी कहीं श्रेष्ठ 'सोतापत्ति फल' (आर्य सत्य के प्रथम मार्ग में प्रवेश) का फल है।
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