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Embroidered artwork for लोक वर्ग: संसार का यथार्थ स्वरूप (गाथा 167–178): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

लोक वर्ग

संसार का यथार्थ स्वरूप (गाथा 167–178)

लोक वर्ग में 12 तेजस्वी गाथाएँ (167–178) संकलित हैं, जो संसार की चकाचौंध और मायावी आकर्षण के पार देखने की प्रेरणा देती हैं। भगवान बुद्ध बताते हैं कि जो व्यक्ति इस संसार को पानी के बुलबुले या मृगतृष्णा (मरीचिका) के समान क्षणभंगुर देखता है, मृत्यु का राजा (यम) उसे नहीं देख पाता। जो पहले प्रमादी रहकर बाद में अप्रमादी हो जाता है अथवा अपने पूर्व पापों को पुण्य कर्मों से ढक देता है, वह बादलों से मुक्त पूर्णिमा के चंद्रमा की भाँति पूरे संसार को आलोकित करता है। अध्याय के अंत में तथागत घोषणा करते हैं कि संपूर्ण पृथ्वी का एकछत्र साम्राज्य पाने अथवा स्वर्ग जाने की तुलना में सोतापत्ति (आर्य मार्ग में प्रथम प्रवेश) का फल अनंत गुना श्रेष्ठ है।

श्लोक

१६७। हीनं धम्मं न सेवेय्य, पमादेन न संवसे; मिच्छादिट्ठिं न सेवेय्य, न सिया लोकवड्ढनो।

श्लोक 1

१६८। उत्तिट्ठे नप्पमज्जेय्य, धम्मं सुचरितं चरे; धम्मचारी सुखं सेति, अस्मिं लोके परम्हि च।

श्लोक 2

१६९। धम्मं चरे सुचरितं, न नं दुच्चरितं चरे; धम्मचारी सुखं सेति, अस्मिं लोके परम्हि च।

श्लोक 3

१७०। यथा बुब्बुलकं पस्से, यथा पस्से मरीचिकं; एवं लोकं अवेक्खन्तं, मच्चुराजा न पस्सति।

श्लोक 4

१७१। एथ पस्सथ्ऽइमं लोकं, चित्तं राजरथूपमं; यत्थ बाला विसीदन्ति, नत्थि सङ्गो विजानतं।

श्लोक 5

१७२। यो च पुब्बे पमज्जित्वा, पच्छा सो नप्पमज्जति; सोऽमं लोकं पभासेति, अब्भा मुत्तो व चन्दिमा।

श्लोक 6

१७३। यस्स पापं कतं कम्मं, कुसलेन पिथीयति; सोऽमं लोकं पभासेति, अब्भा मुत्तो व चन्दिमा।

श्लोक 7

१७४। अन्धभूतो अयं लोको, तनुक्ऽएत्थ विपस्सति; सकुणो जालमुत्तो व, अप्पो सग्गाय गच्छति।

श्लोक 8

१७५। हंसादिच्चपथे यन्ति, आकासे यन्ति इद्धिया; नीयन्ति धीरा लोकम्हा, जेत्वा मारं सवाहिनिं।

श्लोक 9

१७६। एकं धम्मं अतीतस्स, मुसावादिस्स जन्तुनो; वितिण्णपरलोकस्स, नत्थि पापं अकारियं।

श्लोक 10

१७७। न वे कदरिया देवलोकं वजन्ति, बाला हवे नप्पसंसन्ति दानं; धीरो च दानं अनुमोदमानो, तेनेव सो होति सुखी परत्थ।

श्लोक 11

१७८। पथव्या एकरज्जेन, सग्गस्स गमनेन वा; सब्बलोकाधिपच्चेन, सोतापत्तिफलं वरं।

श्लोक 12

पृष्ठभूमि

धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार, जब बुद्ध संबोधि प्राप्त करने के पश्चात पहली बार अपने पैतृक नगर कपिलवस्तु पधारे और राजप्रासाद की बजाय नगर की गलियों में भिक्षाटन करने लगे, तब विस्मित पिता राजा शुद्धोदन को सत्य का उपदेश देते हुए उन्होंने गाथा 168 और 169 कही थी। इसी प्रकार उँगलीमाल डाकू के पश्चात्ताप और अरहंत बनने के अवसर पर गाथा 173 ('अंगुलीमाल गाथा') कही गई थी कि कैसे सत्कर्मों से पाप का अंधकार मिटकर चंद्रमा की तरह चमक उठता है। गाथा 178 में सोतापत्ति फल को सार्वभौम चक्रवर्ती सम्राट के पद से भी ऊँचा घोषित किया गया।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

बुलबुला और मरीचिका (गाथा 170)

जैसे कोई पानी के बुलबुले को देखता है अथवा जैसे मरुस्थल की मृगतृष्णा को देखता है, वैसे ही जो इस संसार को अनित्य देखता है, मृत्यु का राजा (यम) उसे कभी नहीं देख पाता।

सुसज्जित राजरथ का दृष्टांत (गाथा 171)

'आओ, इस सजे-धजे संसार को देखो, जो राजा के सुंदर चमकीले रथ के समान है!' मूर्ख मनुष्य इसके बाह्य रूप-रंग में डूबकर नष्ट हो जाते हैं, किंतु ज्ञानी जन इसमें तनिक भी आसक्ति नहीं रखते।

बादलों से मुक्त पूर्ण चंद्रमा (गाथा 172–173)

जो पहले प्रमादी था किंतु बाद में जागरूक हो गया, अथवा जिसने अपने पूर्व पापों को विपुल पुण्य कर्मों से आच्छादित कर दिया है—वह बादलों की ओट से निकले चंद्रमा की भाँति इस पूरे संसार को प्रकाशित करता है।

सूर्य मार्ग पर उड़ते हंस (गाथा 175)

हंस आकाश में सूर्य के मार्ग पर उड़ते हैं; सिद्ध पुरुष ऋद्धि-बल से आकाश में गमन करते हैं; परंतु प्रज्ञावान धीर पुरुष मार और उसकी विशाल सेना को जीतकर इस संपूर्ण भवसागर से सदा के लिए पार निकल जाते हैं।

चक्रवर्ती साम्राज्य से श्रेष्ठ सोतापत्ति (गाथा 178)

सारी पृथ्वी का एकछत्र चक्रवर्ती सम्राट बनने से, स्वर्गलोक के देवराज का पद पाने से, अथवा तीनों लोकों का आधिपत्य प्राप्त करने से भी कहीं श्रेष्ठ 'सोतापत्ति फल' (आर्य सत्य के प्रथम मार्ग में प्रवेश) का फल है।

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