आत्म वर्ग में 10 अत्यंत प्रसिद्ध गाथाएँ (157–166) संकलित हैं, जो आध्यात्मिक साधना में आत्म-निर्भरता और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व को रेखांकित करती हैं। विश्वप्रसिद्ध गाथा 160—'अत्ता हि अत्तनो नाथो' (व्यक्ति स्वयं ही अपना स्वामी और रक्षक है, दूसरा कौन उसका रक्षक हो सकता है?)—के माध्यम से भगवान बुद्ध बाह्य आश्रयों को अस्वीकार कर स्वयं के दमन से दुर्लभ शरण पाने की प्रेरणा देते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि पवित्रता और अपवित्रता सर्वथा व्यक्तिगत हैं: मनुष्य स्वयं ही पाप करता है और स्वयं ही शुद्ध होता है; कोई दूसरा किसी अन्य को शुद्ध नहीं कर सकता।
श्लोक
यदि मनुष्य अपने आपको प्रिय समझता है, तो उसे अपनी भली-भाँति रक्षा करनी चाहिए। जीवन की तीन अवस्थाओं (अथवा रात्रि के तीन प्रहरों) में से कम से कम किसी एक में तो प्रज्ञावान पुरुष को पूरी तरह जागना (साधना में रत होना) चाहिए।
श्लोक 1
मनुष्य को पहले स्वयं अपने आपको उचित और सन्मार्ग में प्रतिष्ठित करना चाहिए; उसके बाद ही दूसरों को उपदेश दे। ऐसा करने से ज्ञानी पुरुष कभी कलंकित या क्लेशित नहीं होता।
श्लोक 2
मनुष्य दूसरों को जैसा उपदेश देता है, यदि वह स्वयं भी वैसा ही आचरण करे, तो स्वयं संयमित होकर वह दूसरों को भी वश में कर सकता है। वास्तव में अपनी ही आत्मा (मन) को वश में करना सबसे कठिन है।
श्लोक 3
मनुष्य स्वयं ही अपना रक्षक और स्वामी है; दूसरा कौन उसका रक्षक हो सकता है? जब मनुष्य स्वयं अपने आपको भली-भाँति वश में कर लेता है, तब वह ऐसा दुर्लभ रक्षक (आश्रय) पा लेता है जो अन्यत्र मिलना असंभव है।
श्लोक 4
मनुष्य द्वारा स्वयं किया गया पाप, जो उसी से उत्पन्न हुआ है और उसी के मन में उपजा है, उस दुर्बुद्धि मूर्ख को वैसे ही पीसकर नष्ट कर देता है जैसे कठोर हीरा किसी पत्थर या मणि को घिस डालता है।
श्लोक 5
जिसका अत्यधिक दुराचार (पाप) उसे वैसे ही जकड़ लेता है जैसे मालुवा लता साल के विशाल वृक्ष को लपेटकर सुखा देती है—वह मनुष्य अपने साथ वही अनिष्ट कर डालता है जो उसका कोई घोर शत्रु उसके लिए चाहता होगा।
श्लोक 6
जो कर्म बुरे हैं और अपनी ही आत्मा का अहित करने वाले हैं, उन्हें करना बहुत सरल है; परंतु जो वास्तव में हितकारी और कल्याणकारी है, उसे करना परम कठिन होता है।
श्लोक 7
जो दुर्बुद्धि मनुष्य अपनी कुत्सित (मिथ्या) दृष्टि के कारण निष्पाप अरहंतों और धर्मानुसार जीने वाले आर्य पुरुषों के शासन (उपदेश) की निंदा और तिरस्कार करता है—वह बाँस के पौधे की तरह केवल अपने ही सर्वनाश के लिए फल लाता है।
श्लोक 8
मनुष्य स्वयं ही पाप करता है और स्वयं ही मलिन (अपवित्र) होता है; मनुष्य स्वयं ही पाप नहीं करता और स्वयं ही शुद्ध होता है। शुद्धि और अशुद्धि सर्वथा अपनी ही होती है; कोई भी दूसरा व्यक्ति किसी अन्य को पवित्र नहीं कर सकता।
श्लोक 9
दूसरों के कितने भी बड़े सांसारिक उपकार के लिए मनुष्य को अपने स्वयं के आत्म-कल्याण (धर्म-साधना) की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अपने सर्वोच्च आत्मिक हित को भली-भाँति पहचानकर, साधक को उसी परम लक्ष्य में तत्परता से लीन रहना चाहिए।
श्लोक 10
पृष्ठभूमि
श्रावस्ती के जेतवन में उपदेशित आत्म वर्ग की गाथाएँ साधक को दूसरों को उपदेश देने से पूर्व स्वयं को धर्म में प्रतिष्ठित करने की चेतावनी देती हैं। धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार, जब तथागत ने महापरिनिर्वाण की घोषणा की, तो अनेक भिक्षु विलाप करने लगे; परंतु भिक्षु 'अत्तदत्त' ने भीड़ में रोने के बजाय एकांत में साधना कर बुद्ध के जीवित रहते ही अरहंत पद सिद्ध किया, जिस पर बुद्ध ने गाथा 166 द्वारा उनकी प्रशंसा की। इसी प्रकार देवदत्त की कुदृष्टि और अपने विनाश के प्रसंग में गाथा 164 कही गई।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
'अत्ता हि अत्तनो नाथो' (गाथा 160)
मनुष्य स्वयं ही अपना रक्षक और स्वामी है, दूसरा कौन उसका रक्षक हो सकता है? जब मनुष्य अपने मन और इंद्रियों को भली-भाँति वश में कर लेता है, तब वह वह दुर्लभ शरण पा लेता है जो संसार में अत्यंत दुर्लभ है।
उपदेश से पहले स्वयं आचरण (गाथा 158–159)
मनुष्य को चाहिए कि वह पहले स्वयं को उचित और सत्य धर्म में प्रतिष्ठित करे, उसके बाद ही दूसरों को उपदेश दे। जो दूसरों को सिखाता है, यदि वह स्वयं वैसा ही आचरण करे, तभी वह दूसरों को सुधार सकता है; क्योंकि अपने आपको वश में करना सबसे कठिन है।
हीरे से कटता पत्थर (गाथा 161)
मनुष्य द्वारा स्वयं किया गया पाप, जो उसी से उत्पन्न और उसी के मन में उपजा है, उस दुर्बुद्धि को वैसे ही चूर-चूर कर देता है जैसे कठोर हीरा किसी पत्थर या मणि को काट देता है।
शुद्धि और अशुद्धि सर्वथा व्यक्तिगत (गाथा 165)
मनुष्य अपने आप ही पाप करता है और अपने आप ही मलिन होता है; अपने आप ही पाप से विरत होता है और अपने आप ही शुद्ध होता है। पवित्रता और अपवित्रता अपनी ही होती है; कोई भी दूसरा व्यक्ति किसी अन्य को शुद्ध नहीं कर सकता।
अपने आत्म-कल्याण की उपेक्षा न करें (गाथा 166)
दूसरों के कितने भी बड़े काम के लिए मनुष्य को अपने स्वयं के आत्म-कल्याण (साधना) की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अपने सर्वोच्च आध्यात्मिक लक्ष्य को पहचानकर मनुष्य को उसी में निरंतर लीन रहना चाहिए।
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