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Embroidered artwork for आत्म वर्ग: आत्म-विजय और आत्म-साधना (गाथा 157–166): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

आत्म वर्ग

आत्म-विजय और आत्म-साधना (गाथा 157–166)

आत्म वर्ग में 10 अत्यंत प्रसिद्ध गाथाएँ (157–166) संकलित हैं, जो आध्यात्मिक साधना में आत्म-निर्भरता और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व को रेखांकित करती हैं। विश्वप्रसिद्ध गाथा 160—'अत्ता हि अत्तनो नाथो' (व्यक्ति स्वयं ही अपना स्वामी और रक्षक है, दूसरा कौन उसका रक्षक हो सकता है?)—के माध्यम से भगवान बुद्ध बाह्य आश्रयों को अस्वीकार कर स्वयं के दमन से दुर्लभ शरण पाने की प्रेरणा देते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि पवित्रता और अपवित्रता सर्वथा व्यक्तिगत हैं: मनुष्य स्वयं ही पाप करता है और स्वयं ही शुद्ध होता है; कोई दूसरा किसी अन्य को शुद्ध नहीं कर सकता।

श्लोक

१५७। अत्तानञ्चे पियं जञ्ञा, रक्खेय्य नं सुरक्खितं; तिण्णं अञ्ञतरं यामं, पटिजग्गेय्य पण्डितो।

श्लोक 1

१५८। अत्तानमेव पठमं, पतिरूपे निवेसये; अथञ्ञमनुसासेय्य, न किलिस्सेय्य पण्डितो।

श्लोक 2

१५९। अत्तानञ्चे तथा कयिरा, यथञ्ञमनुसासति; सुदन्तो वत दमेथ, अत्ता हि किर दुद्दमो।

श्लोक 3

१६०। अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया; अत्तना हि सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं।

श्लोक 4

१६१। अत्तना व कतं पापं, अत्तजं अत्तसम्भवं; अभिमत्थति दुम्मेधं, वजिरं वऽस्ममयम् मणिं।

श्लोक 5

१६२। यस्स अच्चन्तदुस्सील्यं, मालुवा सालमिव्ऽओततं; करोति सो तथ्ऽअत्तानं, यथा नं इच्छती दिसो।

श्लोक 6

१६३। सुकरानि असाधूनि, अत्तनो अहितानि च; यं वे हितञ्च साधुञ्च, तं वे परमदुक्करं।

श्लोक 7

१६४। यो सासनं अरहतं, अरियानं धम्मजीविनं; पटिक्कोसति दुम्मेधो, दिट्ठिं निस्साय पापिकं; फलानि कट्ठकस्सेव, अत्तघाताय फल्लति।

श्लोक 8

१६५। अत्तना व कतं पापं, अत्तना संकिलिस्सति; अत्तना अकतं पापं, अत्तना व विसुज्झति; सुद्धी असुद्धी पच्चत्तं, नाञ्ञो अञ्ञं विसोधये।

श्लोक 9

१६६। अत्तदत्थम् परत्थेन, बहुनापि न हापये; अत्तदत्थमभिञ्ञाय, सदत्थपसुतो सिया।

श्लोक 10

पृष्ठभूमि

श्रावस्ती के जेतवन में उपदेशित आत्म वर्ग की गाथाएँ साधक को दूसरों को उपदेश देने से पूर्व स्वयं को धर्म में प्रतिष्ठित करने की चेतावनी देती हैं। धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार, जब तथागत ने महापरिनिर्वाण की घोषणा की, तो अनेक भिक्षु विलाप करने लगे; परंतु भिक्षु 'अत्तदत्त' ने भीड़ में रोने के बजाय एकांत में साधना कर बुद्ध के जीवित रहते ही अरहंत पद सिद्ध किया, जिस पर बुद्ध ने गाथा 166 द्वारा उनकी प्रशंसा की। इसी प्रकार देवदत्त की कुदृष्टि और अपने विनाश के प्रसंग में गाथा 164 कही गई।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

'अत्ता हि अत्तनो नाथो' (गाथा 160)

मनुष्य स्वयं ही अपना रक्षक और स्वामी है, दूसरा कौन उसका रक्षक हो सकता है? जब मनुष्य अपने मन और इंद्रियों को भली-भाँति वश में कर लेता है, तब वह वह दुर्लभ शरण पा लेता है जो संसार में अत्यंत दुर्लभ है।

उपदेश से पहले स्वयं आचरण (गाथा 158–159)

मनुष्य को चाहिए कि वह पहले स्वयं को उचित और सत्य धर्म में प्रतिष्ठित करे, उसके बाद ही दूसरों को उपदेश दे। जो दूसरों को सिखाता है, यदि वह स्वयं वैसा ही आचरण करे, तभी वह दूसरों को सुधार सकता है; क्योंकि अपने आपको वश में करना सबसे कठिन है।

हीरे से कटता पत्थर (गाथा 161)

मनुष्य द्वारा स्वयं किया गया पाप, जो उसी से उत्पन्न और उसी के मन में उपजा है, उस दुर्बुद्धि को वैसे ही चूर-चूर कर देता है जैसे कठोर हीरा किसी पत्थर या मणि को काट देता है।

शुद्धि और अशुद्धि सर्वथा व्यक्तिगत (गाथा 165)

मनुष्य अपने आप ही पाप करता है और अपने आप ही मलिन होता है; अपने आप ही पाप से विरत होता है और अपने आप ही शुद्ध होता है। पवित्रता और अपवित्रता अपनी ही होती है; कोई भी दूसरा व्यक्ति किसी अन्य को शुद्ध नहीं कर सकता।

अपने आत्म-कल्याण की उपेक्षा न करें (गाथा 166)

दूसरों के कितने भी बड़े काम के लिए मनुष्य को अपने स्वयं के आत्म-कल्याण (साधना) की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अपने सर्वोच्च आध्यात्मिक लक्ष्य को पहचानकर मनुष्य को उसी में निरंतर लीन रहना चाहिए।

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