प्रिय वर्ग में 12 मनोवैज्ञानिक गाथाएँ (209–220) संगृहीत हैं, जो सांसारिक प्रियता, मोह और आसक्ति को ही समस्त शोक और भय की जड़ सिद्ध करती हैं। गाथा 212 से 216 तक पाँच अनवरत सूत्रों में तथागत समझाते हैं कि 'प्रिय से शोक उपजता है, प्रिय से भय उपजता है; जो प्रियता से विमुक्त है, उसे न कोई शोक है और न कोई भय।' अध्याय का समापन विदेश से सकुशल लौटे प्रियजन के गृह-प्रवेश के सुंदर दृष्टांत से होता है: जिस प्रकार परदेस से लौटे बंधु का सगे-संबंधी हर्षोल्लास से स्वागत करते हैं, उसी प्रकार परलोक जाने वाले पुण्यात्मा मनुष्य का उसके द्वारा संचित किए गए पुण्य आत्मीयता से स्वागत करते हैं।
श्लोक
अपने आपको अनुचित और व्यर्थ कर्मों में लगाकर, ध्यान और साधना के उचित योग में न लगाकर, वास्तविक कल्याण को त्यागकर केवल प्रिय लगने वाले सांसारिक सुखों को पकड़ने वाला मनुष्य—बाद में आत्म-साधना में लीन ज्ञानी पुरुषों से ईर्ष्या करने लगता है।
श्लोक 1
न तो प्रिय लगने वाले के साथ अत्यधिक आसक्त होओ, और न कभी अप्रिय के साथ द्वेष रखो। क्योंकि प्रिय व्यक्ति या वस्तु का न दिखाई देना दुःख है, और अप्रिय का सामने आना भी दुःख ही है।
श्लोक 2
इसलिए किसी भी सांसारिक वस्तु या व्यक्ति में मोह-युक्त प्रियता न बनाएँ, क्योंकि प्रिय का बिछोह अत्यंत दुःखदायी होता है। जिनके मन में न कोई प्रिय है और न कोई अप्रिय, उनके लिए संसार में कोई बंधन नहीं होता।
श्लोक 3
प्रिय वस्तु या व्यक्ति से ही शोक उत्पन्न होता है; प्रिय से ही भय उत्पन्न होता है। जो प्रियता (आसक्ति) से सर्वथा मुक्त हो गया है, उसे कोई शोक नहीं होता; फिर भय कहाँ से आ सकता है?
श्लोक 4
स्नेह (सांसारिक प्रेम) से शोक उत्पन्न होता है; स्नेह से ही भय पैदा होता है। जो स्नेह के बंधनों से पूर्णतः मुक्त है, उसे कोई शोक नहीं होता; फिर भय कहाँ से हो सकता है?
श्लोक 5
भोग-विलास और रति से शोक उत्पन्न होता है; रति से ही भय पैदा होता है। जो रति के आकर्षण से विमुक्त हो चुका है, उसे कोई शोक नहीं होता; फिर भय कहाँ से हो सकता है?
श्लोक 6
काम-वासना से शोक उत्पन्न होता है; काम-वासना से ही भय पैदा होता है। जो काम से सर्वथा विमुक्त हो चुका है, उसे कोई शोक नहीं सताता; फिर उसे भय कहाँ से हो सकता है?
श्लोक 7
तृष्णा (लोभ) से ही शोक उत्पन्न होता है; तृष्णा से ही भय पैदा होता है। जो समस्त तृष्णाओं से विमुक्त हो गया है, उसके जीवन में कोई शोक नहीं रहता; फिर उसे भय कहाँ से हो सकता है?
श्लोक 8
जो शील और सम्यक दर्शन (प्रज्ञा) से संपन्न है, जो धर्म में दृढ़ता से स्थित है, जो सत्य को जानने वाला है, और जो अपने स्वयं के कर्तव्य (साधना) में लगा रहता है—संसार का प्रत्येक मनुष्य ऐसे सत्पुरुष से स्वाभाविक प्रेम और आदर करता है।
श्लोक 9
जिसके भीतर अनिर्वचनीय (अकथ्य परम निर्वाण) के लिए अभीप्सा (तीव्र इच्छा) उत्पन्न हो चुकी है, जिसका चित्त उसी परम शांति से ओत-प्रोत है, और जिसका हृदय काम-भोगों के बंधनों से सर्वथा विमुक्त है—उसे 'ऊर्ध्वगामी' (ऊपर की ओर बहने वाला) कहा जाता है।
श्लोक 10
दीर्घकाल तक परदेस में रहकर दूर से सकुशल घर लौटे मनुष्य का उसके नाते-रिश्तेदार, मित्र और हितैषी बंधु अत्यंत हर्ष और आनंद के साथ स्वागत करते हैं।
श्लोक 11
उसी प्रकार, जब कोई पुण्यात्मा मनुष्य इस संसार से देह त्यागकर परलोक जाता है, तो उसके द्वारा संचित किए गए पुण्य कर्म उसका वैसे ही स्नेहपूर्वक स्वागत करते हैं, जैसे लौटे हुए प्रिय संबंधी का परिजन स्वागत करते हैं।
श्लोक 12
पृष्ठभूमि
धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार श्रावस्ती में जब एक पिता अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु पर पागल होकर श्मशानों में भटक रहा था, तथा जब विशाखा अपनी अत्यंत प्रिय पौत्री की मृत्यु पर आँसू बहाती हुई बुद्ध के चरणों में आई, तब तथागत ने समझाया कि संसार में जितने अधिक प्रियजन होंगे, उतने ही अधिक दुःख और भय होंगे। जो प्रियता को साक्षीभाव से देखता है, वही शोक से पार उतरता है। गाथा 219–220 महादानी नंदिय के स्वर्गारोहण के अवसर पर उपदेशित की गई थी।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
आसक्ति के पाँच सूत्र (गाथा 212–216)
समस्त शोक और भय पाँच कारणों से उत्पन्न होते हैं: प्रिय से (प्रिय), स्नेह से (पेम), रति (भोग-विलास) से, काम से, और तृष्णा से। जो इन पाँचों से मुक्त हो जाता है, उसे न कोई शोक सताता है और न कोई भय।
न प्रिय से बंधो, न अप्रिय से (गाथा 210–211)
न तो किसी प्रिय के साथ अत्यधिक आसक्त होओ और न किसी अप्रिय से द्वेष करो; क्योंकि प्रिय का न मिलना दुःख है और अप्रिय का मिलना भी दुःख है। जो प्रिय और अप्रिय दोनों से परे हो गया, उसके सब बंधन कट जाते हैं।
संसार का सबसे प्रिय व्यक्ति (गाथा 217)
जो शील और प्रज्ञा से संपन्न है, जो धर्म में स्थित है, जो सत्य को जानता है और जो अपनी साधना में तत्पर रहता है—संसार के सभी लोग ऐसे पुण्यात्मा से स्वाभाविक प्रेम करते हैं।
ऊर्ध्वगामी साधक (गाथा 218)
जिसके मन में अनिर्वचनीय परम निर्वाण की तीव्र अभिलाषा जग चुकी है, जिसका चित्त उसी में लीन है और जिसकी वासनाएँ शांत हो चुकी हैं, उसे 'ऊर्ध्वगामी' (ऊपर के लोकों व निर्वाण की ओर बहने वाला) कहा जाता है।
पुण्यों द्वारा आत्मीय स्वागत (गाथा 219–220)
जैसे विदेश से सकुशल लौटे प्रिय बंधु का उसके परिजन और मित्र अत्यंत हर्ष से स्वागत करते हैं, वैसे ही इस लोक से परलोक जाने वाले पुण्यात्मा मनुष्य का उसके द्वारा किए गए पुण्य आत्मीयता से स्वागत करते हैं।
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