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Embroidered artwork for नीलकण्ठ धारणी (आर्य लोकितेश्वर का मंत्र): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

नीलकण्ठ धारणी (आर्य लोकितेश्वर का मंत्र)

नीलकण्ठ धारणी (आर्य लोकितेश्वर का मंत्र)

अवलोकितेश्वर की नीलकण्ठ (महाकरुणा) धारणी: सुरक्षा, शुद्धि और करुणा के लिए पढ़ा जाने वाला महायान मंत्र।

श्लोक

नमो रत्नत्रयाय नम आर्यलोकितेश्वराय बोधिसत्त्वय महासत्त्वय महाकारुणिकाय सर्वं धैरिण त्रिष्याम नमो सुकृत्व इमां आर्यलोकितेश्वर नमो नीलकण्ठ ह्रीम् महावदिशाम सर्वार्थ-शुभेषु अछ्युतं सर्वभूतानां मार्गोषु सत्त्वनाम तद्यथा—
Namo Ratnatrayaya. Nama Aaryalokiteshvaraya Bodhisattvaya Mahasattvaya Mahakarunikaya. Sarvam Dhairina Trishyama Namo Sukritva Imam Aaryalokiteshvara Namo Neelakantha Hreem Mahavadishama Sarvartha-Shubheshu Achyutam Sarvabhootanam Margoshu Sattvanama Tadyatha—

श्लोक 1

ॐ आलोके आलोककर क्रतिकरण ही महाबोधिसत्त्व सर्वं सर्वं मलम् मलम् मतिम् मतिम् धृदयं कुरु कुरु कर्मं धुरु धुरु विजयते महाविजयते धारा धारा धरिणि राजा चल चल मम विमलमूर्ते जिनेविष चल विषं चल मनोहृदय स्मर हर हर कार्मं तार म तार विमल विमल मुक्ते मुक्ते चर चर धरिणि राजणी चलं चलं मम शुद्धम् शुद्धम् महामङ्गळ सत्ये सत्ये निमङ्गळ कुसुमे कुसुमे वरजणी जयाम वसिणी सुधर्म मनसि सुमुखे महासुमुखे अच्युत मरुत सुरुत सिद्धयोगी धृदये धृदयं हुर हुर मलं हुर हुर हर हि महायोजनाय सिद्धाय योगीयै नमोऽस्तुते
Om Aaloke Aalokakara Kratikarana Hee Mahabodhisattva Sarvam Sarvam Malam Malam Matim Matim Dhridayam Kuru Kuru Karmam Dhuru Dhuru Vijayate Mahavijayate Dhara Dhara Dharini Raja Chala Chala Mama Vimalamoorte Jinevisha Chala Visham Chala Manohridaya Smara Hara Hara Karmam Tara Ma Tara Vimala Vimala Mukte Mukte Chara Chara Dharini Raajanee Chalam Chalam Mama Shuddham Shuddham Mahamangala Satye Satye Nimangala Kusume Kusume Varajanee Jayama Vasinee Sudharma Manasi Sumukhe Mahasumukhe Achyuta Maruta Suruta Siddhayogi Dhridaye Dhridayam Hura Hura Malam Hura Hura Hara Hi Mahayojanaya Siddhaya Yogiyai Namo-stute.

श्लोक 2

सिद्धाः प्रसाधयामि मन्त्रपदानि सिद्धाय योगीयै नमोऽस्तुते
Siddhah Prasadhyami Mantrapadani Siddhaya Yogiyai Namo-stute.

श्लोक 3

नीलकण्ठाय नमोऽस्तुते
Neelakanthaya Namo-stute.

श्लोक 4

वराहमुखाय नमोऽस्तुते
Varahamukhaya Namo-stute.

श्लोक 5

महासिंहमुखाय नमोऽस्तुते
Mahasinghamukhaya Namo-stute.

श्लोक 6

सिद्धाय विद्याधराय नमोऽस्तुते
Siddhaya Vidyadharaya Namo-stute.

श्लोक 7

पद्महस्ताय नमोऽस्तुते
Padmahastaya Namo-stute.

श्लोक 8

चक्रहस्ताय नमोऽस्तुते
Chakrahastaya Namo-stute.

श्लोक 9

मृगस्कन्दरोपणाय नमोऽस्तुते
Mrigaskandaropanaya Namo-stute.

श्लोक 10

महालकुटीधराय नमोऽस्तुते
Mahalakuteedharaya Namo-stute.

श्लोक 11

नमो रत्नत्रयाय नम आर्यलोकितेश्वराय बोधिसत्त्वय महासत्त्वय महाकारुणिकाय
Namo Ratnatrayaya. Nama Aaryalokiteshvaraya Bodhisattvaya Mahasattvaya Mahakarunikaya.

श्लोक 12

सिद्धयन्तु मे मन्त्रपदानि नमोऽस्तुते स्वाहा
Siddhyantu Me Mantrapadani Namo-stute Swaha.

श्लोक 13

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह महायान बौद्ध परंपरा की धारणी है, यानी लंबा मंत्र-रूप पाठ, जो बोधिसत्त्व अवलोकितेश्वर (लोकेश्वर) के नीलकण्ठ ('नीले कंठ वाले') रूप से जुड़ा है। पूर्व एशिया में इसे महाकरुणा धारणी कहा जाता है; चीनी संग्रह में यह भगवद्धर्म के अनुवाद (लगभग 650 ई., ताइशो सं. 1060) में सबसे प्रसिद्ध है, जबकि वज्रबोधि का ताइशो सं. 1061 सिद्धम् लिपि में संस्कृत रूप सुरक्षित रखता है। तिब्बती और चीनी साधना में इसका पाठ कर्म-शुद्धि, बाधा-निवारण और करुणा-विकास के लिए होता है। परंपराओं में पाठ-भेद हैं, इसलिए गुरु द्वारा दिया गया रूप ही अपनाएँ।

क्या आप जानते हैं?

मूल और महत्व

यह धारणी (मंत्र) महायान बौद्ध परंपरा में अवलोकितेश्वर (करुणा के बोधिसत्त्व) से जुड़ी है। इसे 'नीलकण्ठ धारणी' के नाम से भी जाना जाता है, जो तिब्बती और चीनी बौद्ध धर्म में अत्यंत प्रसिद्ध है। इस मंत्र का उद्देश्य करुणा जागृत करना और संसार के कष्टों से मुक्ति दिलाना है।

संरचना और विशेषता

इस मंत्र की शुरुआत रत्नत्रय (बुद्ध, धर्म, संघ) को नमस्कार से होती है, फिर अवलोकितेश्वर को 'महाकारुणिक' (अपार करुणा वाले) कहा गया है। इसमें अनेक बीज मंत्र जैसे 'ह्रीम्' और शक्तिपूर्ण शब्दांश हैं, जो ध्यान और साधना में उपयोग होते हैं।

विभिन्न रूपों का वर्णन

मंत्र में अवलोकितेश्वर के विभिन्न रूपों की स्तुति है—नीलकण्ठ (नीले गले वाले), वराहमुख (सूअर के मुख वाले), महासिंहमुख (बड़े शेर के मुख वाले), पद्महस्त (कमल हाथ वाले), चक्रहस्त (चक्र हाथ वाले) आदि। ये सभी रूप बोधिसत्त्व की करुणा के विविध आयामों को दर्शाते हैं।

सिद्धि और आशीर्वाद

अंत में 'सिद्धयन्तु मे मन्त्रपदानि' कहकर मंत्र की सिद्धि की कामना की गई है। यह मंत्र साधक को आध्यात्मिक उन्नति, रक्षा और आंतरिक शांति प्रदान करने के लिए प्रसिद्ध है।

पाठ की विविधता

चीनी, तिब्बती, जापानी और वियतनामी परंपराओं में इस धारणी के उच्चारण और पाठ-भेद मिलते हैं। इसमें 'स्वाहा' जैसे मंत्रांत हैं, जो भारतीय मंत्र-परंपरा की साझी शब्दावली दर्शाते हैं; साधक प्रायः अपने गुरु से मिला पाठ ही अपनाते हैं।

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