ॐ मणि पद्मे हूँ
करुणा का पवित्र मंत्र
यह छह अक्षरों वाला मंत्र तिब्बती बौद्ध परंपरा में अवलोकितेश्वर (करुणा के बोधिसत्व) का मूल मंत्र है। इसे जपने से करुणा और शांति की भावना जागृत होती है।
श्लोक
कमल के हृदय में विराजमान रत्न के समान परम पवित्र चेतना को नमन। यह करुणा और ज्ञान के मिलन का दिव्य मंत्र है, जो भक्त के मन को शुद्ध करता है, उसमें करुणा जगाता है तथा उसे निर्मल, पवित्र और मुक्त बनाता है।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह मंत्र तिब्बती बौद्ध धर्म का सबसे प्रसिद्ध मंत्र है, जिसे 'मणि मंत्र' भी कहा जाता है। इसे प्रार्थना चक्रों (मणि चक्र) पर लिखा जाता है और भक्त इसे जपते हैं। इसका उपयोग ध्यान और साधना में किया जाता है, और इसे सभी प्राणियों के कल्याण के लिए जपा जाता है।
क्या आप जानते हैं?
अर्थ
यह मंत्र 'ओम मणि पद्मे हूँ' है, जिसका अर्थ है 'कमल में मणि' – यह करुणा और ज्ञान के मिलन का प्रतीक है।
मूल
छह अक्षरों का यह मंत्र महायान बौद्ध धर्म का अत्यंत प्रसिद्ध मंत्र है, विशेषकर तिब्बती बौद्ध परंपरा में इसका विशेष महत्व है।
गुण
माना जाता है कि इस मंत्र के नियमित जप से मन शुद्ध होता है, नकारात्मक कर्मों का क्षय होता है और करुणा व ज्ञान में वृद्धि होती है।
प्रचलन
तिब्बत, नेपाल, भूटान, मंगोलिया आदि क्षेत्रों में इसे प्रार्थना चक्रों (मणि चक्र) और झंडियों पर उकेरा जाता है तथा लाखों लोग प्रतिदिन इसका जाप करते हैं।
Avalokiteshvara
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